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हाईब्रिड कारें

डीजल, पेट्रोल की आसमान छूती कीमतें और जल्दी ही इनके खत्म हो जाने की आशंका ने पूरी दुनिया को इसका विकल्प खोजने के लिए मजबूर कर दिया है। हाईब्रिड कारें, बसें, ऐसे ही खोजे गए विकल्पों में से हैं जिनका जलवा धीरे-धीरे दुनिया के कई हिस्सों में दिखने लगा है।

जून, 2008 में हिन्दुस्तान भी पहली हाईब्रिड कार से रूबरू हो चुका है। देश की एक प्रमुख कार निर्माता कंपनी होंडा ने सिविक कार का मॉडल पिछले महीने राजधानी दिल्ली में लॉन्च किया। हालांकि होंडा हिन्दुस्तान में कारोबार जरूर करती है, लेकिन वह हिन्दुस्तानी कंपनी नहीं है। इसलिए यह कहना शायद सही नहीं होगा कि हिन्दुस्तान ने अपनी पहली हाईब्रिड कार बना ली है। हां, यह एक-डेढ़ साल बाद हम जरूर कह सकते हैं, जब टाटा और महिन्द्रा एण्ड महिन्द्रा जैसी भारतीय कंपनियां अपने हाईब्रिड मॉडल बाजार में पेश करेंगी। हाईब्रिड कारों के क्या फायदे हैं और दुनिया इस कदर उनको लेकर रोमांचित क्यों है? इस सब पर विस्तार से बात करने से पहले आइए यह जान लें कि आखिर हाईब्रिड कारें हैं क्या?

सीधे और सटीक शब्दों में हाईब्रिड कारें, उन कारों को कहते हैं जिनमें पेट्रोल और इलेक्ट्रिक दोनों ही तरह के इंजनों का इस्तेमाल किया जाता है। ध्यान दें, सिर्फ कारें ही हाईब्रिड नहीं होतीं, अपितु बस, ट्रक और दूसरे कारोबारी वाहन भी हाईब्रिड तकनीक में मौजूद हैं। दरअसल, हाईब्रिड एक तकनीक है। देश पहली हाईब्रिड कार से रूबरू होने के बाद अब बहुत ही जल्द हाईब्रिड बसों से भी रूबरू होने वाला है। माना जा रहा है कि दिल्ली में होने वाले कॉमनवेल्थ गेम्स के पहले 1000 हाईब्रिड बसें राजधानी की सड़कों पर उतर चुकी होंगी। अब आइए इस बात पर गौर करते हैं कि हाईब्रिड तकनीक को लेकर आखिर दुनिया इस कदर रोमांचित क्यों है? वास्तव में हाईब्रिड कारों के दो बड़े फायदे हैं- एक तो यह प्रदूषण कम करती हैं और दूसरी यह तेल भी कम पीती करती हैं।

वास्तव में पेट्रोल या डीजल से चलने वाली गाड़ियों में एक ईंधन का टैंक होता है। इसी टैंक से ईंधन यानी पेट्रोल या डीजल, इंजन तक पहुंचता है। फिर उस ईंधन को कंबन्शन तकनीक के जरिए जलाया जाता है, जिससे ऊर्जा पैदा होती है। इसी ऊर्जा से कार के पहिये घूमते हैं। इस पूरी तकनीक में खामी यह है कि इससे बड़ी तादाद में प्रदूषण फैलता है तथा ऊर्जा पैदा करने के लिए तेल का भी ज्यादा दहन होता है। जबकि दूसरी तरफ हाईब्रिड कार में इलेक्ट्रिक और पेट्रोल, दोनों ही तरह के इंजन होने के कारण सेल्फ मारते ही दोनों ही इंजन काम करने लगते हैं। पेट्रोल इंजन और इलेक्ट्रिक मोटर जब एक साथ काम करना शुरू करते हैं तो इनकी मिलीजुली ताकत से कार आगे बढ़ने लगती है। यह पैरेलल हाईब्रिड तकनीक में होता है। कारें सबसे ज्यादा पेट्रोल का इस्तेमाल स्टार्ट होने के समय ही करती हैं लेकिन जब हाईब्रिड तकनीक से कारों को स्टार्ट किया जाता है तो कम पेट्रोल या डीजल खर्च होता है। हाईब्रिड तकनीक का दूसरा प्रकार होता है- सीरिज हाईब्रिड। इसमें कार या पेट्रोल इंजन पहले गाड़ी में लगी इलेक्ट्रिक बैटरी को चार्ज करता है, इसके बाद कार या बस या दूसरा वाहन चलता है।

हाईब्रिड तकनीक के बहुत फायदे हैं यानी सड़कों में दौड़ने वाली हाईब्रिड कारों और दूसरे वाहनों से बहुत फायदे होते हैं। ये कम से कम ईंधन खर्च करती हैं, बहुत कम प्रदूषण पैदा करती हैं, पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुंचातीं आदि। कुल मिलाकर इस तकनीक के वाहनों का सबसे बड़ा फायदा, इनका फ्यूल एफिशिएंट होना है। इसीलिए आजकल पूरी दुनिया में इनके लिए दीवानगी बढ़ रही है। हर किसी को तेल की बढ़ती कीमतें परेशान कर रही हैं और यह चिंता भी सताए जा रही है कि बहुत ही जल्द तेल खत्म हो जाएगा। इस कारण होनोलुलू से लेकर हैदराबाद तक, हर जगह कारों के शौकीन हाईब्रिड कारों की तरफ उम्मीद भरी निगाहों से देख रहे हैं। यह महज संयोग नहीं है कि होंडा की हाईब्रिड कार होंडा सिविक की पूरी दुनिया में बेहद मांग है। लगभग 8 साल पहले विकसित हुई इस कार ने अमेरिका, यूरोप में धूम मचा रखी है। अब तक इसके 3 लाख से ज्यादा नग बिक चुके हैं और माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में इसकी मांग और ज्यादा बढ़ेगी। हिन्दुस्तान में ही इस कार के लॉन्च के समय कंपनी ने उम्मीद जताई कि उसे यहां उम्मीद से कहीं ज्यादा रिस्पांस मिलेगा।

एक तरफ यह कार जहां वातावरण को प्रदूषण से बचाती है, वहीं बहुत अच्छा माइलेज भी देती है। हाईब्रिड कारें दूसरी आम कारों के मुकाबले लगभग 50 फीसदी कम तेल खर्च करती हैं।

यही कारण है कि अब भारत में भी, जो कि आने वाले सालों में शायद सबसे खतरनाक तरीके से तेल संकट में फंस सकता है, हाईब्रिड कारों को लेकर काफी उम्मीद की नजरों से देखा जा रहा है। माना जा रहा है कि टाटा और महिन्द्रा की हाईब्रिड कारें सन् 2010 में बाजार में होंगी। लेकिन किसी भी तकनीक के साथ यह सबसे बड़ी समस्या होती है कि अगर उसकी कई खूबियां हैं तो कुछ खामियां भी होती हैं, हाईब्रिड तकनीक के साथ भी यह किस्सा जुड़ा है। हाईब्रिड कारें जहां एक तरफ इतनी उम्मीदें जगाती हैं, वहीं उनकी तमाम खामियां भी हैं, जो विशेषज्ञों को निराश करती हैं। सबसे पहली और बड़ी खामी तो यही है कि ये कारें महंगी बहुत हैं।

होंडा सिविक का पेट्रोल इंजन मॉडल जहां बाजार में 10 से 11 लाख रुपये में उपलब्ध है, वहीं होंडा सिविक हाईब्रिड मॉडल 22 लाख रुपये का है यानी पूरे दो गुनी कीमत। यही नहीं चूंकि अभी यह कार विदेश से ही आएगी, इसलिए इसके ऊपर टैक्स और ड्यूटी जो लगेगी, वह अलग होगी। कुल मिलाकर यह बहुत महंगी कार होगी। इस तकनीक के साथ दूसरी बड़ी समस्या यह है कि हाईब्रिड कारें जब खराब होंगी तो इन्हें आज की पेट्रोल-डीजल कारों की तरह किसी भी वर्कशॉप में सही नहीं करवाया जा सकता। यह अपने विशेष वर्कशॉप में ही सही होंगी और इनके कलपुर्जे भी महंगे होंगे। इसीलिए आम मिडिल क्लास तो क्या आम अपर मिडिल क्लास व्यक्ति भी इस कार को खरीदने के पहले अपने बजट को लेकर कई बार सोचेगा। इन कारों के बारे में विशेषज्ञों को एक और बड़ी खामी यह नजर आती है कि इनका पिकअप दूसरी कारों के मुकाबले काफी कम होगा यानी ये पैर रखते ही रफ्तार का रोमांच नहीं देंगी, जिसके लोग आदी हो चुके हैं।

फिर भी यह तो कहा ही जा सकता है कि हाईब्रिड कारों का मौजूदा कारों के मुकाबले भविष्य कहीं ज्यादा बेहतर है, क्योंकि ये आने वाले कल की कारें हैं। इसलिए अगर कुछ महीनों में ही देश के बड़े महानगरों में हाईब्रिड कारें सड़कों पर अपना जलवा बिखेरने लगे तो इसमें किसी को आश्‍चर्य नहीं होगा। आखिर नयी तकनीक, पुरानी तकनीक से ज्यादा आकर्षक होती ही है।

 

 

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