राजनीति की बिसात पर मोहरा बना सिंगूर

टाटा की लखटकिया कार “नैनो’ का भविष्य अधर में लटक गया है। एक तो किसी भी कीमत पर यह अपनी पूर्व घोषणा के समय पर बाजार में लांच होने की स्थिति में नहीं है। दूसरे अगर भविष्य में कभी यह लॉंच होगी भी तो इसका श्रेय लगता है प. बंगाल के हिस्से में न जाकर किसी अन्य राज्य के खाते में जाएगा। टाटा मोटर्स के सिंगूर स्थित इस कारखाने में प्रबंधन ने एक लंबे समय से तालाबंदी की घोषणा कर रखी है और कारखाने में इस महत्वाकांक्षी कार के उत्पादन का काम ठप्प पड़ा है। गौरतलब है कि “नैनो’ दुनिया की सबसे कम कीमत की कार होने के दावे के साथ इस साल अक्तूबर के महीने में, बकौल टाटा मोटर्स के प्रबंध निर्देशक रतन टाटा, आटो मोबाइल की दुनिया में अपना ाांतिकारी कदम रखने वाली थी। लेकिन मौजूदा समय में इसकी संभावना को ग्रहण जैसा लग गया है।

इस महत्वाकांक्षी योजना को एक गंभीर असंभावना की वर्चस्ववादी राजनीति ने अनिश्र्चितता के दायरे में कैद कर दिया है। मुख्यमंत्री बुद्घदेव भट्टाचार्य और तृणमूल कांग्रेस नेत्री ममता बनर्जी का राजनीतिक अहं एक-दूसरे को राजनीतिक तौर पर पराजित करने की दिशा में इस कदर हठधर्मी हो गया है कि दोनों ने मिल कर पिछले दिनों राज्यपाल गोपालकृष्ण गांधी द्वारा कराये गये समझौते की भी धज्जियॉं बिखेर दी हैं। इसे मजाक ही कहा जाएगा कि राज्यपाल की अध्यक्षता में हुए समझौते को तोड़ने का आरोप मुख्यमंत्री की ओर से तृणमूल नेत्री ममता बनर्जी के सर डाला जा रहा है और ममता बनर्जी इसके लिए अंतिम रूप से जवाब देह बुद्घदेव भट्टाचार्य को बता रही हैं। कारखाना बन्द पड़ा है और स्थानीय कर्मचारी इसके जल्द खुलने की भगवान से प्रार्थना कर रहे हैं ताकि उनकी रो़जी-रोटी का जुगाड़ संभव हो तथा प्रबंधन मन ही मन यह सोच रहा है कि कहॉं आकर फंस गये? वहीं बुद्घदेव और ममता के नेतृत्व में माकपा और तृणमूल के लोग एक-दूसरे को राजनीतिक शह देने की कवायद में मशगूल हैं।

सारा मामला राज्यपाल की पंचायत के बाद 300 एकड़ और 70 एकड़ की भूलभुल्लैया में अटक गया है। ममता कहती हैं कि राज्यपाल ने जो समझौते का मसविदा पढ़ा था उसमें किसानों की 300 एकड़ ़जमीन की वापसी की बात थी। बुद्घदेव उन्हें गलत ठहराते हुए कहते हैं कि वापसी की बात सिर्फ 70 एकड़ की बाबत हुई थी। बुद्घदेव ने उन किसानों के लिए एक आकर्षक पैकेज की भी घोषणा की है, जिनकी ़जमीन इस परियोजना के लिए अधिग्रहीत की गई है। पैकेज में जमीन के लिये भुगतान किये गये मूल्य का 10 प्रतिशत अतिरिक्त रूप से जोड़ने के अलावा पढ़े-लिखे लोगों को नौकरी तथा प्रशिक्षण भी देने की बात है। लेकिन ममता ने अपनी ओर से इस पैकेज को मुकम्मल तौर पर इन्कार कर दिया है। अब वे आरोप लगा रही हैं कि सरकार ने राज्यपाल की अध्यक्षता में हुए समझौते को अमान्य कर दिया है और यह संविधान का अपमान है। इसके चलते वे केन्द्र सरकार से प. बंगाल सरकार के खिलाफ संविधान की धारा 355 के तहत कार्यवाही भी चाहती हैं। मतलब यह कि दोनों ही पक्षों ने मसले और मुद्दे की व्याख्या अपनी-अपनी राजनीतिक ़जरूरतों के हिसाब से की है, कोई भी पक्ष इसके सार्वजनिक प्रभाव को रेखांकित करने के लिए तैयार नहीं है।

यह तो तय है कि टाटा की लखटकिया कार, आज नहीं तो कल मार्केट में आएगी ही आएगी। इस परियोजना को पाने के लिए बहुत से राज्य लालायित हैं और वे टाटा को अपने यहॉं इस कारखाने को स्थानांतरित करने का आमंत्रण दे रहे हैं। इस परियोजना को पाने के लिए ये राज्य सरकारें ़जरूरत के मुताबिक जमीन मुहैया कराने के अलावा अन्य बहुत सी सुविधायें देने को तैयार हैं। इस हालत में अगर निकट भविष्य में प. बंगाल के राजनीतिक हालात बदस्तूर बने रहते हैं तो टाटा के लिए यह म़जबूरी होगी कि वे अपनी परियोजना को कहीं अन्यत्र स्थानांतरित करें। अतः नैनो पर लगा हुआ ग्रहण इष्टकाल बीतने पर स्वतः ही समाप्त हो जाएगा। लेकिन पश्र्चिम बंगाल का औद्योगिक भविष्य निश्र्चितरूप से अभिशप्त हो जाएगा। टाटा के जाने के बाद कोई भी औद्योगिक घराना अथवा कोई भी राष्टीय-अन्तर्राष्टीय कंपनी प. बंगाल में पूंजी निवेश करने के बारे में शायद ही निर्णय ले सके। इस बात को समझते बुद्घदेव भी हैं और ममता भी। लेकिन दोनों की राजनीतिक मजबूरियॉं दोनों का रास्ता रोक कर खड़ी हैं। मजबूरी यह है कि इस परियोजना और प्रदेश के भविष्य के आकलन के पहले उनको अपना और अपनी पार्टी के भविष्य का आकलन करना पड़ रहा है। तीन दशकों से प. बंगाल में अपनी राजनीतिक बादशाहत कायम किये वामपंथी अपना साम्राज्य किसी कीमत पर ममता के आगे घुटना टेक कर गंवाना नहीं चाहते, तो वहीं ममता को लग रहा है कि इन्हें बेदखल करने का नायाब मौका बड़ी मुश्किल से हाथ आया है, अगर अब वे इसे अपने ह़क में नहीं भुना सकेंगी तो शायद उनके लिए अवसर राजनीतिक रूप से समाप्त हो जाएगा। इस संग्राम में कौन जीतेगा कौन हारेगा, कहना कठिन है। लेकिन प. बंगाल ़जरूर हार के कगार पर खड़ा है।

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