राष्ट्र धर्म में धर्मसापेक्षता की दखलअंदाजी

हमारे संविधान में “धर्मनिरपेक्ष’ शब्द है, जिसका अर्थ है – किसी धर्म विशेष से पक्षपात नहीं। सभी धर्मों को समान दृष्टि से देखना। लेकिन साम्प्रदायिकता के आधार पर देश में अल्पसंख्यक व बहुसंख्यकों का वर्गीकरण हुआ, फिर राजनैतिक स्तर पर अल्पसंख्यकों का तुष्टीकरण व बहुसंख्यकों का तिरस्कार, धर्मसापेक्षता को ही फलीभूत करता है। इस प्रकार राजनैतिक दल संविधान की दुहाई देते हुए आम जनता को भ्रमित करते हैं। जबकि सभी जानते हैं कि चुनाव धर्माधारित व जातिय समीकरण के आधार पर ही लड़े जाते हैं और जीते भी जाते हैं।

राष्ट्र धर्म में किसी धर्म विशेष का जिा भी नहीं होना चाहिए, बल्कि राष्ट्रहित में एक सर्वमान्य राष्ट्रधर्म की स्थापना हो, जो राष्टीय संस्कृति के अनुरूप हो। सभी को समान अधिकार व अवसर प्राप्त हों। सभी का विकास हो।

परन्तु आज सांप्रदायिक तथा जातिय आधार पर प्राथमिकताएँ देकर राष्ट्र धर्म की अवहेलना करना कहॉं की नैतिकता है? इसीलिए एक राष्ट्र का एक राष्ट्र धर्म हो। कोई किस धर्म, संप्रदाय को मानता है- वह उसका निजी मामला है। उसे राष्टीयता प्रदान कर संविधान तथा जनता को नहीं उलझाना चाहिए।

कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक, गुजरात से लेकर असम तक केवल एक राष्ट्र धर्म हो, समान नागरिकता हो। सभी को समान अवसर मिलें और सभी प्रगति करें, तभी हम वास्तविक राष्ट्र धर्म को निभा पायेंगे। इसलिए समान आचार संहिता लागू करना अनिवार्य है। राजनेताओं को जनसेवा करनी होगी। केवल सत्ता सुन्दरी के आगोश में राष्ट्र का अहित करना, नेताओं के राष्ट्र धर्म पर प्रश्र्न्नचिह्न लगाता है। देश में विसंगतियॉं पैदा होने के पहले ही हम संभल जायें तथा देश को मजबूत तथा समृद्घ करने में जुट जायें। सच्चे राष्ट्र धर्म को स्थापित करने पर ही हम विश्र्व का नेतृत्व कर पायेंगे।

 

– पूनम जोधपुरी (हैदराबाद)

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