लड़खड़ाती अमेरिकी अर्थव्यवस्था का वैश्र्विक संकट

अमेरिकी अर्थव्यवस्था एक गंभीर संकट से गुजर रही है। हाल ही में 15 सितम्बर को अमेरिका की चौथी सबसे बड़ी इनवेस्ट कंपनी लीमेन ब्रदर्स का दिवाला पिट गया। उसका दिवालिया होना अमेरिका के वित्तीय इतिहास का एक काला अध्याय माना जा रहा है। 158 साल पुरानी यह कंपनी विश्र्वयुद्घ से लेकर मंदी के कई भयंकर तूफानों का अडिग होकर मुकाबला करती रही है लेकिन बाजार में 60 अरब डॉलर की राशि फॅंस जाने के संकट को नहीं झेल पाई और उसे अपने को दिवालिया करार देने का आवेदन अमेरिका के वित्तीय प्रबंधन के सामने करना पड़ा। इतना ही नहीं इसके ठीक दूसरे दिन अमेरिका के वित्तीय प्रबंधन को एक और झटका तब झेलना पड़ा जब दुनिया की सबसे बड़ी ब्रोकरेज फर्म मेरिल लिंच ने अपने आपको बैंक ऑफ अमेरिका के हवाले कर दिया। बैंक ऑफ अमेरिका ने इस कंपनी के शेयरों को 29 डॉलर प्रति शेयर के हिसाब से खरीद लिया। लीमेन बदर्स और मेरिल लिंच के बाद अभी कई बैंकिंग कंपनियॉं और वित्तीय संस्थान अपना अस्तित्व बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। अथिक मंदी का अगला शिकार मार्गन स्टेनली इंश्योरेंस क्षेत्र की सबसे बड़ी कंपनी अमेरिका इंटरनेशनल ग्रुप (एआईजी) और वाशिंगटन म्युचुअल हो सकती हैं।

वित्तीय संकट से जूझ रही और दिवालियापन के कगार पर खड़ी इन कंपनियों के घाटे की मार दुनिया के लगभग सारे देशों के बाजारों को झेलनी पड़ रही है। खासकर विकास शील देशों के बाजारों पर इसका काफी नकारात्मक प्रभाव देखने को मिल रहा है। इसके चलते भारत में भी शेयर बाजार में मंदी का व्यापक असर देखने को मिला। ़गौरतलब है कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था पिछले दो वर्षों से सब-प्राइम संकट के कारण मंदी की गिरफ्त में आ गई है। पिछले दो सालों से अमेरिकी बैंकों ने अधिक ब्याज के लालच के चलते कम साख वाली हाउसिंग कंपनियों और उपभोक्ताओं को साढ़े चार करोड़ अरब डॉलर का जो़िखम भरा कर्ज बॉंट दिया। इन हाउसिंग कंपनियों द्वारा बनाये गये मकान बिके नहीं। कीमतें गिराने के बावजूद इन्हें बा़जार में ग्राहक नहीं मिल पा रहे हैं। व्यक्तिगत ऋणों की अदायगी भी बहुत कम मात्रा में हो रही है। इस तरह अमेरिका में जो वित्तीय संकट देखने में आ रहा है उसका एक मात्र कारण वितरित किये गये ऋण हैं, जिनका ब्याज तो ब्याज मूलधन भी इन बैंकों के खाते में जमा नहीं हो सका।

इस मंदी के पीछे कुछ और कारण भी रहे हैं। अमेरिका में 2002 में डॉट कॉम कंपनियों के शेयर टूटने से अर्थव्यवस्था को जो झटका लगा, उसका असर अब भी बना हुआ है। इसके अलावा पिछले 6 से 7 वर्षों में अमेरिका की कई कंपनियों ने बड़ी संख्या में अमेरिका के बाहर उत्पादन शुरू किया है। उनका कार्य आउटसोर्सिंग से हो रहा है। इस व्यवस्था ने अमेरिकनों की ाय शक्ति घटा दी है। मंदी के इसी ाम में छह माह पहले सब प्राइम संकट का पहला शिकार जानी-मानी फर्म वीयर स्टर्न्स बनी थी। उसके बाद से ही वैश्र्विंक वित्तीय बा़जार में एक तरह का भूचाल सा आ गया है। इससे भारत सहित कई विकास शील देशों के सामने भी वित्तीय तथा निर्यात और रोजगार संबंधी संकट खड़ा हुआ है। अमेरिकी संकट से भारत में सुरक्षित निवेश के लिए डॉलर की मांग बढ़ गई है। पिछले 17 सितम्बर को इसी के चलते दस साल की अवधि में रुपये में सबसे बड़ी गिरावट देखी गई। भारतीय कंपनियों में विदेशी निवेशकों की अच्छी-खासी हिस्सेदारी है। ऐसे में अमेरिका में हुई किसी भी बड़ी वित्तीय घटना का फंड-प्रवाह पर प्रभाव पड़ना अवश्यंभावी है। अमेरिकी कंपनियों के खस्ताहाल होने का अब सीधा असर उन भारतीय कंपनियों पर पड़ना लाजमी है जो इक्वीटी के जरिये धन उगाहने में लगी हैं।

भले ही एक नई उम्मीद के तहत अमेरिका का फेडरल रिजर्व बैंक इस बिगड़ती स्थिति को संभालने के लिए ब्याज दरों में कटौती सहित अन्य वित्तीय उपाय करे, लेकिन अमेरिका में जो वित्तीय संकट का तूफान आया है वह निकट भविष्य में इन प्रयासों से रोका जा सकेगा, इसमें भारी संदेह है। इससे अमेरिका का बजट घाटा 600 से 700 अरब डॉलर तक जाने की बात आर्थिक विशेषज्ञ कह रहे हैं। भारत की आन्तरिक अर्थव्यवस्था के संतोषप्रद होने, विदेशी व्यापार के हमारी अर्थव्यवस्था में भागीदारी कम होने तथा हमारे विकास की चाबी अभी भी घरेलू खपत और निवेश के हाथ में होने से हमें अमेरिकी संकट का असर बहुत कम भुगतना पड़ सकता है। लेकिन हमारे शेयर बा़जार में जो गिरावट और अस्थिरता देखने को मिल रही है उसे देखते हुए निवेशकों को बहुत सोच-समझ कर निवेश करना होगा। हमें यह अतिरिक्त प्रयास करना होगा कि हम इस अमेरिकी मंदी के दौर में, जिसने वैश्र्विक अर्थव्यवस्था को डॉंवाडोल कर दिया है, देश में ही उपभोक्ताओं की मांग शक्तिशाली बनावें। इसके साथ ही गुणवत्ता पूर्ण निर्यात को भी संभावनाओं से जोड़ें। वास्तव में यह एशियायी पूंजी के साथ-साथ भारतीय पूंजी के लिए भी नींद से जागने का समय है। हमें अपने आई टी उद्योग को भी अमेरिकी निर्भरता से बचाना होगा और अमेरिकी बैंकों पर भारतीय पूंजी की निर्भरता कम करने के कदम भी उठाने होंगे। यह सच है कि भारतीय अर्थ व्यवस्था अभी अमेरिका पर इस कदर आश्रित नहीं है कि उसे जुकाम होने पर हमें छींक आने लगे। फिर भी अपनी अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए एहतियाती प्रबंध तो करने ही पड़ेंगे।

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