विकास की कड़ी बन सकते हैं स्वयंसेवी संगठन

देश की प्रसिद्घ पर्यावरण पत्रिका “डाउन टू अर्थ’ के 30 अप्रैल, 2008 के अंक में एक कार्टून प्रकाशित हुआ है, इस कार्टून में एक सरकारी कर्मचारी अपने सीने पर एन.जी.ओ. का टैग लगाये हुए प्रदर्शित है तथा वह कह रहा है कि वास्तव में मैं सरकारी कर्मचारी हूँ परंतु जनता इस टैग के बिना मुझे सुनना नहीं चाहती है। वास्तव में यह कार्टून आज एन.जी.ओ. की बढ़ती विश्र्वसनीयता को अच्छी तरह से प्रदर्शित कर रहा है। एन.जी.ओ. यानी स्वयंसेवी संगठनों की विकास में बढ़ती भागीदारी तथा जनमानस में बढ़ता विश्र्वास इस बात को सिद्घ करता है कि इस 21वीं सदी में सर्वांगीण विकास की कवायद में एन.जी.ओ. की भूमिका दिनोंदिन महत्वपूर्ण होगी। आज स्वयंसेवी संगठनों द्वारा किये जा रहे जनहितैषी कार्यों को सभी स्वीकार कर रहे हैं। देश के युवा नेता कांग्रेस महासचिव श्री राहुल गांधी अपनी यात्राओं में स्वयंसेवी संगठनों को महत्व देते हैं। चाहे उनकी मध्यप्रदेश के आदिवासी जिले झाबुआ की यात्रा हो या फिर किसानों के दर्द से कराहते महाराष्ट के विदर्भ क्षेत्र की यात्रा। इन जगहों पर श्री राहुल गांधी ने जनता के दुःख-दर्द और विकास का आंकलन यहॉं कार्य कर रहे स्वयंसेवी संगठनों के माध्यम से जानने-समझने का प्रयास किया है। श्री राहुल गांधी द्वारा एन.जी.ओ. के माध्यम से जनमानस में अंदर तक पैठ बनाने का अच्छा प्रयास भी है। जहॉं आज स्थानीय नेता और सरकारी कर्मचारी सिर्फ शोषक की भूमिका में ज्यादा नजर आ रहे हैं वहीं स्वयंसेवी संगठनों ने अपने निस्वार्थ सेवा के कार्यों से जनमानस को जीता है। स्वयंसेवी संगठनों के कार्यकर्ता प्राकृतिक आपदाओं, महामारी या विकास की अंधी दौड़ से उत्पन्न हादसों में स्थानीय लोगों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर लड़ते हैं, जनता के अधिकारों की बात हो या फिर सरकारी दमन के विरोध की बात हो, सभी जगह जनता के साथ स्वयंसेवी संगठन आगे खड़े हो जाते हैं। वास्तव में बिना किसी राजनीतिक आकांक्षा के स्वयंसेवी संगठन सच्चे नेतृत्वकर्ता के रूप में हमारे सामने हैं।

जहॉं तक देश में अभी तक एन.जी.ओ. द्वारा किए गए कार्यों की बात है, तो देश की दूसरी आजादी यानी कि सूचना का अधिकार स्वयंसेवी संगठनों की लड़ाई का ही प्रतिफल है। बड़े बांधों के विरोध की बात हो या फिर सबको रोटी और रोजगार के हक की लड़ाई की बात हो, इन सब में स्वयंसेवी संगठनों की उत्कृष्ट भूमिका से हम सभी वाकिफ हैं। आज देश की राजधानी दिल्ली हो या फिर देश का कोई दूरस्थ अंचल और दुर्गम क्षेत्र, सभी जगह एन.जी.ओ. विकास के नये प्रतिमान स्थापित कर रहे हैं। देश की वर्तमान राजनैतिक और सामाजिक स्थिति में एन.जी.ओ. की भूमिका लगातार बढ़ रही है। हम विकास की बात करते हैं तो विकास के जरिए देश के हर नागरिक को शिक्षा, रोटी और रोजगार की व्यवस्था होनी ही चाहिए, परंतु वर्तमान में जारी विकास प्रिाया में देश का बड़ा वर्ग रोजी-रोटी और शिक्षा जैसे मौलिक अधिकार से काफी दूर है। सरकारी प्रयासों का असर आम आदमी तक अभी भी अपेक्षित स्तर तक नहीं हुआ है। सरकार द्वारा उपलब्ध कराये जा रहे संसाधनों को सरकारी अमला बीच में ही गायब कर देता है। सरकारी पैसे की बंदरबांट के आंकड़े बढ़ते ही जा रहे हैं। सारा तंत्र कमीशनखोरी में लिप्त है। कागजी घोड़ों का बाजार बढ़ रहा है। ऐसे में किसी ऐसी एजेंसी की ़जरूरत महसूस की जा रही है जो सरकारी योजनाओं और राशि का अधिकतम लाभ देश के नागरिकों को दिला सके, वास्तव में इसके लिए स्वयंसेवी संगठन सरकार और जनता के बीच विकास की कड़ी बन सकते हैं। देश में महिलायें विकास से काफी दूर हैं। उनमें से अधिकांश आर्थिक रूप से स्वावलंबी नहीं हैं जो उनके शोषण का भी कारण है। ऐसे में स्वयंसेवी संगठन स्वयं सहायता समूहों के जरिए महिलाओं के साथ-साथ दलितों और पिछड़े लोगों को भी विकास के मार्ग से जोड़ने में सहायक हो सकते हैं। आज माइाो फाइनेंस का समय है, आम आदमी और किसानों की वित्तीय समस्या को हल करने के लिए माइाोफाइऩेंस का काम स्वयंसेवी संगठन ही सुचारू रूप से कर सकते हैं। माइाो इंश्योरेंस जो मजदूरों और गरीब लोगों को भी जीवन की सुरक्षा उपलब्ध कराने में सक्षम है, इसे भी एन.जी.ओ. के जरिए ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुँचाया जा सकता है। बैंकिंग सुविधाओं की बात करें तो देश का बड़ा वर्ग इनसे अछूता है। किसानों, मजदूरों और छोटे व्यापारियों की पहुंच बैंकों के कार्यालयों तक नहीं हो पाई है और बैंकों को इतनी फुरसत नहीं है कि वह इस वर्ग तक पहुँचने का प्रयास करे। ऐसे में इन वंचित वर्गों और बैंक के बीच सेतु का काम स्वयंसेवी संगठन ही कर सकते हैं। देश में विभिन्न स्थानों पर ऐसे प्रयास कुछ बैंकों ने किए हैं। सरकारी क्षेत्र के सबसे बड़े बैंक स्टेट बैंक ऑफ इंडिया ने कुछ प्रदेशों में एन.जी.ओ. को बिजनेस फेसीलेटर नियुक्त कर बैंकिंग सुविधाओं को जन-जन तक पहुँचाने का प्रयास किया है, परंतु बैंक का यह ाांतिकारी कदम बैंक के कर्मचारियों को ही रास नहीं आ रहा है। वो हतप्रभ है कि ग्राहक और उनके बीच ये एन.जी.ओ. नामक कौन-सी बला आ गई जो उनके एकाधिकार को तोड़ रही है। वास्तव में कई जगहों पर बैंक कर्मचारियों द्वारा इन एन.जी.ओ. के कार्यकर्ताओं के साथ असहयोग और दुर्व्यवहार की शिकायतें मिल रही हैं। स्टेट बैंक ऑफ इंडिया का जन-जन तक बैंकिंग की बात पहुँचाने के लिए एन.जी.ओ. का रास्ता एक अच्छा प्रयास बन सकता है, बशर्ते इसके अधिकारी और कर्मचारी एन.जी.ओ. को सहयोग करें। एन.जी.ओ. सरकारी योजनाओं के िायान्वयन के साथ-साथ उनकी मानीटरिंग भी अच्छी तरह से कर सकते हैं। यूपीए सरकार की महत्वाकांक्षी राष्टीय रोजगार गारंटी योजना में किये जा रहे घपलों का उजागर एन.जी.ओ. के माध्यम से ही हुआ है। जन आंदोलनों की बात हो या जनशिक्षण की, सभी कार्यों में एन.जी.ओ. आगे हैं। दूरस्थ अंचलों तक उच्च शिक्षा की अलख जगाने इंदिरा गांधी राष्टीय मुक्त विश्र्वविद्यालय ने भी एन.जी.ओ. का सहारा लेने का फैसला किया है, विभिन्न एन.जी.ओ. द्वारा जगह-जगह इसके अध्ययन केंद्र खोले जा रहे हैं। बालिका शिक्षा की बात हो या फिर विकलांग शिक्षा की बात हो, सभी जगह एन.जी.ओ. के प्रयास सर्वोपरि रहे हैं। शिक्षा के क्षेत्र में एन.जी.ओ. की भागीदारी और ब़ढ़ाने का प्रयास होना चाहिए। हम पर्यावरण प्रदूषण, जल समस्या तथा विस्थापन की समस्याओं से जूझ रहे हैं। इनसे जनशिक्षण के जरिए आसानी से छुटकारा पाया जा सकता है और यह काम एन.जी.ओ. के माध्यम से आसानी से पूर्ण किया जा सकता है। वास्तव में आज जब देश विकास की नई ऊँचाईयों को छूने को प्रयासरत है तब एन.जी.ओ. इस कार्य में अच्छे साथी सिद्घ हो सकते हैं। ़जरूरत इस बात की है कि जड़ हो चुका सरकारी तंत्र इनकी अहमियत समझे और एन.जी.ओ. के साथ कंधे से कंधा मिलाने को तैयार हो जाये। आज जब देश पूंजीवाद की ओर बढ़ रहा है तथा पूंजीपतियों के इशारों पर जन हितैषी एवं पर्यावरणीय मुद्दों को दरकिनार कर सिर्फ विकास का खांचा खींचा जा रहा है, ऐसे में भी स्वयंसेवी संगठनों की भूमिका और भी ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि वो सतत् और सर्वांगीण विकास के मार्ग के राही सिद्घ हो सकते हैं।

 

– डॉ. सुनील शर्मा

 

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