विश्वकर्मा ने की थी दाऊ जी मंदिर की रचना

पौराणिक संदर्भों के अनुसार यह माना जाता है कि भादो मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी को ब्रज के बलदेव जी का जन्म हुआ था। ब्रज के श्रीबलदेव ग्राम में स्थित दाऊ जी के मंदिर में इस अवसर पर विशेष कार्याम आयोजित किया जाता है। कहते हैं कि इस मंदिर की स्थापना कृष्ण के प्रपौत्र बानाथ जी ने की थी और इसे देव-शिल्पी विश्र्वकर्मा जी ने निर्मित कराया था। कालाम में मंदिर कई बार जीर्ण-शीर्ण अवस्था तक पहुँचा और कई बार इसका जीर्णोद्घार हुआ।

वर्तमान मंदिर का निर्माण 800 वर्ष पूर्व कल्याण देव ने कराया था। कहते हैं कि कल्याण देव को स्वप्न में यह प्रेरणा हुई थी कि निकट के ताल क्षीर-सागर (संकर्षण कुंड) में दाऊ जी का विग्रह है। कल्याण देव ने उस विग्रह को निकाल कर एक कच्चे मंदिर में स्थापित किया। बलदेव जी के चमत्कारों की अनेक गाथाएँ हैं। कहते हैं कि धर्मान्ध औरंगजेब जब कई मंदिरों को ध्वस्त करता हुआ दाऊ जी के मंदिर पहुँचा तो असंख्य मधुमक्खियों की सेना उसकी सेना पर टूट पड़ीं। उसके सैनिक भाग खड़े हुए, जिसके चलते औरंगजेब को इस मंदिर को ध्वस्त करने का विचार त्याग देना पड़ा। इस चमत्कार से प्रभावित होकर औरंगजेब ने पॉंच गॉंव इस मंदिर की सेवा में लगा दिये। बाद में ग्वालियर के सिंधिया राजा ने भी दो गॉंव अपनी ओर से इस मंदिर को अर्पित कर दिये तथा सोने-चॉंदी की मनो श्रृंगार सामग्री अर्पित की।

आज भी दाऊ जी की सेवा-पूजा का प्रबंध इन्हीं सात गॉंवों की आमदनी से किया जाता है। यहॉं वर्ष में दो बार 15-15 दिन का मेला लगता है। भाद्र शुक्ल षष्ठी तथा मार्गशीर्ष पूर्णिमा को। वर्तमान में पूर्व मंदिर का भग्नावशेष रूप ही शेष है। नया मंदिर काफी आकर्षक है। यहॉं दाऊ जी को माखन-मिस्त्री का भोग लगाया जाता है, जिसे स्थानीय भाषा में हांडा कहा जाता है। इसकी बड़ी महिमा है। भांग की ठण्डाई भी दाऊजी को प्रिय है। दाऊ जी के मंदिर में 12 दरवाजे हैं, जिसमें 4 मुख्य-द्वार हैं। बलदाऊ जी का विग्रह 8 फुट ऊँचा और 3 फीट चौड़ा है। यह विग्रह श्याम वर्ण का है।

बलदेव जी को, क्योंकि शेषावतार माना जाता है, इस कारण मुख्य विग्रह के पीछे सात फनों से युक्त शेषनाग की मूर्ति है। बलदेव छठ पर श्री बलदेव जी एवं देवी रेवती जी का विशेष श्रृंगार किया जाता है तथा मल्लविद्या, रास, नौटंकी आदि के विशेष प्रदर्शन होते हैं।

यह स्थान मथुरा से 22 कि. मी. एवं वृंदावन से लगभग 60 कि.मी. दूर है। आदि वराह पुराण में इस संबंध में एक प्रार्थना मंत्र आता है-

रेवती रमणायैव गोपानां वरदायिने।

अन्योन्यसन्मुखा लोकप्रीयते च नमोअस्तुते।।

– निर्विकल्प

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