वैशाख की चौथ

वैशाख वदी चोथ को वैशाखी चोथ आती है, जो चारबडी चोथ में से एक होती है।इस दिन सभी सुहागन औरते वृत रखतीहैं रात को चन्द्रमाजी को अरग देकर खाना खाती हैं,इस दिन अच्छी रसाई बनाते हैं शाम को चौथ विनायक जी कीपूजा करते है, कहानी कहतेहैं। पूजा में पाटे पर चोथ विनायक जी माड लेते हैं अन्यथा मुर्ति रख लेते हैं, पाँच गुड की पिन्डी लेते है उस पर टिकी लगाते हैं, पाटे पर पाँच-पाँच टिकी कुकुं, मेहन्दी व काजल की लगाते है पूजा में कुंकु,चावल, मोली, मेहन्दी काजल गुड, अगर बती फूल, आखा (कटोरी भरकर चावल) दक्षिणा पानी कालोटा लेते हैं अच्छे से चौथ विनायक जी की पूजा करते हैं, लोटे को टीका करके मोली बान्धते हैं पूजा करने वालियों के टीका मोली बान्धतेहै कहानी कहते हैं।

चंद्रोदय होने पर अरग देते है वोही पानी से जो पूजा मे लेते हैं,अरग देकर कुंकु चावल चढाते हैं चार परिक्रमा करते है। यह मंत्र बोलते हैं।

सोना को सांकलो गल मोतियां रो हार
वैसाख की चोथ ने अरग देता.
जीया म्हाराबीर भरतार

यह मंत्र चार बार बोलते है चंद्रमाजी को हाथ जोडकर सभी बडो को प्रमाण करते है सासुजी को पगे लागनी देते है।

चौथ का उद्यापन

चोथ के उद्यापन में तैरह औरत + 1 ब्राह्माणी जी को अच्छी रसोई बनाकर खाना खिलातेहैं। यथा शक्ति रुपिये या बर्तन या ब्लाऊझ पीस कुछ भी देते हैं। साखिये के साख भरवाते हैं।

चौथ की कहानी

एक साहुकार के एक बेटो थो बेटे रा ब्याव गांव मे ही हुयो रोज बहु काम सलटा कर पीहर जाती जब भोजाइयां पुछती बाइजी कांई करयाया, तो बा केवंती घरका धंधा कर आया, बासी खुशी खाय आया, एक दिन भोजाइया आपका ननदोईजी न बुलाकर ओलभो दियो कि म्हारी बाइजी ने बासी खुशी क्युं खिलावो वो आपरे घर जाकर माँ ने कियो मा तेतीस तरकारी बतीस भोजन बना ले माँ तेतीस तरकारी बतीस भोजन बना लिया बोल्यो तीन थालियाँ पुरसले तीन थालियाँ पुरसी आपरी थाली लुगाई कानी सिरका दी, लुगाई री थाली खुद ले ली। काम सलटा कर बहु पीहर गई बिको आदमी लारे-लारे गयो भोजाइयां पुछी तो बा बो ही जावाब दिया बिरे आदमी ने भोत रीस आई घर आकर लुगाई ने कियो तने चोखी तरह जीमावे तो भी तु म्हा सगलारी बुराईयां क्युं करे। बा बोली म्हे बुराई कोनी करुन साची बात करुं हुँ। थे कमायो नी थारो बाप कमायोनी दादा परदादा री कमाई तो बासी खुशी हुवे आ बात बिरे कलेजे में लागगी, सुबह उठर मां ने बोल्यो माँ मे कमावण ने जाउं माँ-बाप बोल्या बेटा आपारे तो इतो इसी धन पडयो है कि सात पीडी खावेती भी कोनी खुटे परबोतो जिद कर लियो, जावण लाग्यो जणा माँ ने बोल्यो माँ में कमावण ने जाउं माँ-बाप बोल्या बेटा आंपारे तो इसी इतो धन पडयो है कि सात पीडी खाने तो भी कोनी खुटे, पर बो तो जिद कर लियो, जावण लाग्यो जणा माँ ने बोल्यो माँ घर में अग्नि मत बुझाइजे चुल्हे की निन्दे तो दीयेरी मत निन्दाइजे दिये रीी षनिन्दे तो चुल्हे री मत निन्दाइजे घर के बारे जावण मत दिये पराई सीख लागण मत दिजे। आ बात केयकर चल्यो गयो। एक दिन दोनु अग्नि बुझ गी बा पाडोसन रे घर गई पाडोसन बोली बाई अबार तो मे चोथ री कहानी केवां बीच में कोनी उठां बां बोली चोथ रो बरत करण सुं काई हुवे अन्न हुवे धनहुवे बारा बरस रो बिछडयोडो धणी मिल जावे बा बोली इसी बात है तो म्हे भी करुं म्हारे भी बारा बरस हुआ धणी ने गयां ने। कियां करे। म्हने कियां ठा पडसी की चोथ कद है पाडोसन बोली एक महीने में उन्नतीस निासुं आवे एक महिने में तीस दिना सुं आवे तुं तीस कांकरी गिणर राख दिजे रोज एक-एक सिरकाती जाजे दो आना रो गुड दो आना रा आखा लार व्रत कर लिजो बा इयान ही व्रत करना शुरु कर दिया सासु चार टाइम खावण ने देती पेली टाइम रो ओटाणे में गाड देती दुसरी टाइम पाडेने दे देती। तिसरी टाइम रो ब्राह्मणी ने दे देती चोथी टाइम रो चंद्रमाजी न अरग देर जीम लेती। दो आना रो गुड आखा महिने रे महिने बनियेरी दुकानसुं ले आती करत-करता बारा बरस हुग्या चोथ बिनायक जी सोच्यो आप इने इरे धणी सुं नहीं मिलावां तो कलजुग में आपांन कुण पुछसी चोथ विनायक जी साहुकार र बेटे रे सपने गया साहुकार रा बेटा सुतो है कि जागे बो बोल्यो ना सुतो ना जागु चिन्ता भारियो हुं थारे घरबार है थारी घरवाली याद करे थारे घर जा लो बोल्यो म्हारे सो मण सूत उलझोडो पडियो है किया जाऊं चोथ बिनायक जी बोल्या सुबह न्हा घोरक दिया कर बिनायक जी चौथ माता को नाम लेकरबैठ जा! जे देणिया दे जाई लेणिया ले जाई वो सुबह न्हा धोकर दीयो करकें बैठ गयो सिज्यां तक सारो हीसाब किताब सलट गयो चोथ विनायक कियो रास्ते में चारधात है दो साण्ड लडता आवेला ए दो लाडु दोना न एक एक दे दिजे, खून-रस्सी री नदी अवेली ओ चिटियो एक बार अठीने घुमाइजे एक बार अढीने घुमाइजे रास्तो मिल जासी सांप बलण वास्ते जावे बिने छिछकारी जे मत, सागी मोडे घर में मत बडीजे। वो चाल्यो रास्ते मे दो साण्ड लडता आ रिया था बो दोना न एक-एक लाडु दे दियो आगे गयो खून रस्सी री नदी आई चिटियो घुमायो रास्तो मिल गया आगे एक सांप बलण ने जा रियो थो बिने छिछकार दियो सांप कियो सो बरसपेट घिसं घिस काडया, अब और सो में किया काडु सो मे थने खाऊँ बो बोल्यो भाई मे तो भलाई करी कोई भलाई करता बुराई आवे काई तो केवे सदाई आवे तो केवे चालो पूझा गाय न पुछयो, डोकरी ने पुछयो सगला हां भरी कियो भाई तुं मने खा लिजे परन्तु बारा-बार चोइस बरसा सुं धरे जा रियो हुं एक बार घरका सुं मिललुं पछे खा लिजे, सांप कियो तुं तो मांचे चझर सुं जाई म्हारे मांचे नही चढण रे प्रण लियोडो है तो केवे म्हारी लुगाई री चोटी लटकादेयु, आगे चाल्यो घरे आयो माँ मोडो खोल्यो तो केवे माँ लारलो मोडो खोल माँ लारलो मोडो खोल्यो जियान ही बेटो घर में बडियो आगलो मोडो पड गयो बो सोच्यो तीन धात तो टलगी पर चोथी तो सागे ही है कोई सुं भी बोल्यो कोनी बो सोच्यो आज म्हारो बेरी आ रियो बिरो सत्कार करुं माँ ने कियो माँ सोतुं पेडियां सिणगार दिजे। एक में दुध, दही, फूल, अन्तर माटी, घी, राख माँ सोच्यो आज आज तो कर दुं घणा बरसा सुं आयो रोज ए टस पस मारुं तो कोनी दूवे। माँ सातुं पडियां सिणगार दी बो जाकर सुग्यो बो सोच्यो थोडी देर वास्ते मैं क्युं बतलाउ लुगाी सोची इता दिना सुं आया है पेली म्हे क्युं बतलाऊं आधी रात हूई सर्प देवता आया पेली पेडी पग धरियो र्फूील बिछावण वाली थारो चुडो चुन्दड अमर रिज्यो जाया जिवता रिज्यो खांवतो तो कोनी वचनारो बान्ध्यो खांउ सातुं पेडिया चढता गयो आर्शिवाद देतो गयो, चोथ विनायक जी आपस में बतलाया कि आज इरो सवाग आपा नहीं राखां तो कलयुग में आपांने कुण मानी चोथ माता ढाल वनिया विनायक जी तलवार चादणो कठसुं लाव चन्द्रमा जी खने गया, चन्द्रमा कियो थारी पूजा करे थांरो व्रत करे, म्हे क्युं चान्दणो करुं कियो थाने अरग देकर जीमे सो चान्णो तो थाने करनो पडसी चन्द्रमा जी चांदणो करयो सांप रो छिपलो छिपलो कर दियो थोडे सो जीव पूंछ में रेय गयो पूँछ जूते मैं चली गई कि बदलो तो मे इयान ही ले लेसुं बहु किडी नगरो सींचती किडिया बोली इतोसवाग तो आपा ही राख देवां किडियां पूंछ न घसीट कर लेगी थोथी करदी गांव में बेन रेवंती सुबह दौडी-दौडी आई, माँ-माँ भाई आयो है माँ कियो बाई आयो तो है बोल्यो न कोई चाल्यो बेन बोली म्हे उठाकर आऊं, आंझ बेन गई देखे तो लोही रा नाला भेवे बिन चिल्लाई माँ-माँ भाई ने तो कोई मार गयो घर मे रोवो कुको मच गयो, आवाज सुण र धणी लुगाई री आंख खुली, उपर सुं हेलो मार्यो, माँ-माँ मै कोनी मरियो म्हारो बेरी मरियो है म्हाने गाजा बाजां सुं नीचे बुलावो, बेटो बाप ने पुछयो बापुजी म्हारे जाणे रे बाद थे कि धरम पुन्य करियो काई-बाप कियो नहीं भाई माँ ने पूछयो पालने में सुती भानजी ने पुछयो भानजी बोली में तो करियो ही कोनी करुं तो म्हारो करियोडो थंरे आडो भी कोनी आवे लुगाई नस हिलाई बाइजी बारा
बरस चौथ तो म्हे करी, सासु केवे पापणी क्युं झुठ बोले चार टेम देती चार टेम खाती तुं कटे सुं चोथ करी, बहु बोली सासुजी थे देता जरुर हा, मैं पेली टेम रो ओटाने में बूर देती ओटाणो खोद रे देख्यो तो सोनेरो चक्कर ही चक्कर हुयोडा पडिया है दूजी हेम रो पाडे ने देती पाडे ने पुछियो तो हड-हड हंसियो तो हीरा मोती झडिया तीसरी टेम रो ब्राह्मणी ने देती ब्राह्मणी ने पुछायो तो कियो हां सेठाणी महिने मे एक दिन थारी बहु मने देती चौथो अरग देकर जीम लेती, महिने महिने दुकान सुं दो आना रा गुड आखा लाती, सुसरोजी ने केय दियो हीसाब करदेसी। सारी बाता साची निकरी सासु बहुरे पगे लागी बेवे बहु केवे सासुजी उलटी गंगा नहीं म्हे लागुं थारे पगा, थे लगो चौथ विनायकजी र परां। हे चोथ माता, विनायकजी महाराज जिसो बहुरो सवाग राखियो बिसो सबरो राखिया, कहत सुणत हुंकारा भरत आपणे सारे परिवारो राखिया म्हारोभी राखिया।

छीक की कहानी

एकसेठ हो, परदेश सुं धरे जारियो थो धोरे उपर सोयो हे धारे रा धणी थारो ही सरणो धोरे रो धणी सांप हो रात भर बिरी रक्षा करी सुबह खाण कमाण न जावण लाग्यो तो सांपणी कियो, म्हारे आडी कार कडार जावो, सांप सलोटिया आवे, धिगां मस्ती करे मने सुवावे कोनी सांप कार कडा र चालियो गयो सांप गयो सांपणी कार उपर पाटो रख दियो सांप संलेटिया न बुलार मजा मस्ती करण लागगी सेठ सुतो-सुतो देख बिन अचम्यो आ रियो थो देखो लुगाइयां री किसी बेगम जात हूवे सांप ने तो इयां केवे लारे से इयां करे, बिने आई रीस सात जुती री सांपणी नेदेकर आ गयो सांपणी तो अन्न-अन्न भेर सुयगी सांप आयो बारेसुं केवे सुती क्युं है, सापणी बोली थे रातभर सेठ री रक्षा करी बो मने सात जुतीरी मार र गयो है थे बिने जार डसो तो ही म्हे अन्नपाणी लेवुं, सांप लुगाई रे कियां कियां गयो जाकर पलिन्डे मेलुक र बेठगो, कि पानी भरण वास्ते आई जना खा लेसुं मांथाली पुरसी बेटो बोल्यो पाणी भर कर लियाउं इते म्हे ही बीरी लुगाई ने छींक आई बोली बेठ जाओ दुसरी बार भी इयान ही हूयो बो बोल्यो ए लुगाइयां रा टस पस म्हे कोनी मानु आ तो बेगम जात है, एक तो निजारो काल देख्यो पाछो आर बतांऊ मां बोली बेटा मुंडे आयोडी बात नहीं राखणी पेली बात केर जा बेटो बोल्यो माँ काल म्हे आ रियो थो, म्हे घोरा पर सुतो सारी रात सर्प देवता म्हारी रक्षा करी सुबह सर्प देवता जाण लाग्यो तो सर्पणी केवे म्हारे आडी कार कडार जावो सांप सलोटिया आवे मने सुवाने कोनी माँ सांप देवता तो कार कडार गया बा तो कार पर तो पाटो राख लियो सारासांप सलोटिया न बुलार धिगां मस्ती करण लागगी माँ ए मने तो आई रीस सात जुती री मार र आयगो, सर्प देवता सुणता हुवो तो भले ही खा लिज्यो आ बात सुणता ही सर्प देवता हड-हड निकल्या, माफी मांगी मने तो अबार हत्या लाग जाती इके वास्ते लुगाई री आधी बात माननी आधी नहीं माननी केणे रो मतलब जि की बात समझदारी री हूवे बा माननी खराब नहीं माननी। छिकंत खाज्यो छिकंत पिज्यो छिकत पर घर मत जाज्यो हे छिकं मता सेठ री रक्षा करी जियां सबरी करिज्यो ।
विनायक जी की कहानी

एक मीन्डको थी मीन्डकी रोजीना बिनायक जी की कहानी केती मीन्डके ने सुहातो कोनी, एक दिन मिन्डको बोल्यो तुं रोज परपुरुष को नाम लेवे अबकी लेवेगी तो मोगरी से सिर फोड गेरुगो बिन्दायक जी गुस्सा होगया राजा की बान्दी आई दोनवो ने पात में घाल कर लेयगी ओर चुल्हा पर चढा दिया भन्डरे के न लागे तप गणो मिन्डकी न लागे तप थोडो दोनुं जणा सीजण लाग गा मिन्डको बोल्यो मिन्डकी बोत कष्ट पांवा थारा बिनायक जी न सुमिर नहीं तो आंपा दोनुं मर जावांगा, मिन्डकी सात दफा सटक बिनायक सटक विनायक कियो, दो सान्ड लडता आया पाते कसींग की मारी पातो फूट गयो मीन्डके मिन्डकीरो रे कष्ट काटयो बेयां सबको काटिया। बाने कष्ट मे गेरिया बीआ किने ही मत गेरिया।

आडी वाडी कन्या वाडी, वाडी किनी किरतारी, भरतार री, सातवार री, सोलह तिथियाँ री, सुरज भगवानरी चन्द्रया जी री विनायक जी री बाडी पूज्याँ काई दुवे अन्न हुवे धन हूवे से जे श्रृंगार हु हस्ते हाथी दुवे घुमता घोडा हूवे आस मात आस दे घिलोडी में घी दे, तिलोडी में तेल दे, पुनच्या सुदो माणख दे, चिडो, चिडो ए चीडियां वन में जाय न घर करजो स्त्री खान्डो, बान्डो जि को भी बरत करे चोथ माता विनायक जी रे आगे साख भरजो आडी वाडी की कहानी, विनायकजी की कहानी, प्रत्येक त्यौहार पर कहते है।

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