शरद पुर्णिमा

sharad-poornima-raas-leelaआसोज सुदी पुर्णिमा को हम शरद पुर्णिमा मनाते हैं, रात को मतिरा व खीर चन्द्रमा जी के आगे रखते हैं रात को 12 बजे भोग लगाकर प्रसाद लेते है, चन्द्रमा जी के प्रकाश में सुई पिरोने से आँखों की ज्योति बढती हैं हम वो भी करते हैं।

शरद पुर्णिमा की कहानी

एक साहुकार क दो बेटी थी। दोनुँ बहना पुर्णिमा का व्रत करती। बडी बहन तो पुरा व्रत करती, छोटोडी अधुरा व्रत करती। अधुरा व्रत कर न स, जका टाबर होताँ ही मर जाता। एक दिन पण्डिताँ न बुला कर पुछ्यो कि मेरा टावर होता ही मर जावे, सो के बातहै।पण्डित बोल्या कि तूँ पुर्णिमा के अधुरा व्रत करती, जी के स तेरा टावर जी व कोनी। ओरुँ पूरा व्रत करसी, जद तेरा टाबर जीसी। छोटी बहन ओरुँ पूरा व्रत कन्या। थोडा दिन बाद लडको होयो, पण वो भी मरगो। लडका न पीठा पर सुवा कर ऊपर स कपडो उढा दियो और आपकी बहन न बुला कर बोई पीडो बैठ न दे दियो, वा जैयाँ ही बैठ न लागी कि ऊँको घाघरो छुताँ ही लडको जीगयो औररो न लागो। बजी बहन बोली कि तुँ मेरयो के कलंक लगा व थी, गर बैठ जाती तो लडको मर जातो। छोटी बहन बोली कि बाई यो तो तेरा हीभाग स जियो आपाँ दोनु बहना पुर्णिमा को व्रत करती, जीको तुं तो पूरा व्रत करती म अधुरा करती, जी कक दोष स मेरा टाबर मर जाता। तो लडको तो तेरा भाग सही जीयो ह। सारगाँव म ढढिोरो पिटवा दियो कि सब कोई पुर्णिमा को व्रत करियो, पूरा व्रत करियो। हे पुर्णिमा माता जैंया छोटी बहन को बेटो जीवायो, बीको सत राख्यो जीसो सबको रखियो। कहताँ, सुनतां को, हुकारा भरता आपणे सारे परिवार को रखियो म्हारो भी रखियो।

बिनायकजी की कहानी

दो देवरानी जेठानी थी। देवरानी क घन थो, जेठानी गरीब थी। जेठानी गणेश जी की भोत अराधना कर्या करती। बा आपनी देवरानी क चून पीस न जाती। जि क कपड स चून छानती, वो आप क धरां लिपाती और आप क धणी न घोलकर प्या देती एक दिन देवरानी का टावर देख लिया औरआपकी माँ न बोल्या किमाँ ताई आपनो चुन को कपडो ले जाकर तुजी न घोल कर पिला द व। देवरानी बात सुनकर मोत खिजी और जेठानी न बोली कि म्हार घरा सजावो जना चून छान न को कपडो धरकर और हाथ घो कर आया कर। आ बैया ही करी, घरां गई तो दणी बोल्यो ति चूना घोल कर दे। जेठानी बोलि कि आज बा चूना छा नन को कपडो राख लियो। जद ऊँको धणी गुस्सा आकर ऊँन पाटा समार नलाग्यो। वा गणेशजी-गणेशजी करती सोगी। गणेशजी आया और पूछयो कि क्यूँ सुती ह। बा बोली कि मेरी देवरानी केघर सेचून छा नन का कपडो ल्याकर, मेरे धणी ने घोल कर पिलाती, आज बा कपडो राखलियो, म पिला न कौनी सकी, सो मेरो धणी मन मार्यो। गणेशजीबोल्या कि घर- घर स तिलकुट्टो खा कर आयो हूँ निमटन की मन मह, सो कठ जाउँ बा बोली कि महाराज, धणी जगां पडी ह चाहे जठ निमट ल्यो। गणेशजी निमट कर बोल्या कि निमट तो लियो अब पूछूं कठ। जद बा गुस्सा म बोली कि मेर सीर क पूँछ ल्यो। गणेश सिर क पूँछ कर चला गया। थोडी देर म वा उठ कर देखतो सारो घर हीरा स जगमगा र यो ह, सारो सिर भी जगमगा वहै। धन न बटोर न लागी तो देवरानी क जान म देर होगी। देवरानी टावरां न भेजी कि देख कर आओ आज ताई आई क्यूँ कोनी। टाबर आकर देख्या और माँ न बोल्या कि ताई क तो मोत धन हो रयो ह। देवरानी भागी-भागी आई और पूछी कि तेर इतनो धन कैयां होगो। जेठानी सारी बात बता दी। इतनी सुन देवरानी घराँ आई और आप क धनी नबोली कि पाटा-ही पाटा स मारो, जेठानी कोधनी ऊँन मार्यो तो ऊँक भोत धन होगा। धणी बोल्यो कि तूँ धन की भूखी क्यूँ मार खा वहै, पर बा मानी कोनी धणी खूब मारी। बा आपको सारो मकान खाली कर क गणेशजी को नाम लेकर सोगी। गणेशजी आया और बोल्या किमकठ निमटूँ जद बा बोली महाराज, बिंक तो छोटासो मकान थो, मेर तो धणोई बडो मकान ह, थारी इच्छा हो व जठ ही निमटल्यो। गणेशजी सारा मकान म निपट लिया। फेर पूछ्यापूछूँ कठ। जद बा बोली कि आओ मेर सिर क पूछयो। ऊँ क सिर क पूँछ कर गणेशजी अन्तरध्यान होगा। थोडी देर मे उठ करदेख, तो सारे घर में कुडो सडह। जना देवरानी बोली हे महाराज, थे मेर स कपट कर्या, जेठानी न तो धन दियो, मन कुडो दियो। गणेशजी आया और बोल्या कि तूँ तोधन की भूखी मारखाी, वा धर्म की भूखी। देवरानी बोली कि थे थारो बो सब समेटो मन तो धन कोनी चाहिये। गणेशजी बोल्या कि तेर धन मस आधो जेठानी न दे, तब समेटुँगा। देवरानी आधो धन दे ई गणेशजी आपकी माया समेटी। हे गणेशजी महाराज, देवरानी न दियो जिसो कोई न मत देइयो, जेठानी न दियो जिसो सब न देईयो, कहताँ न, सुणताँ न, हूँकारा कर भरताँ न, अपना सारा परिवार न देईयो।

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