श्रृंगवेरपुर : जहाँ राम ने केवट से नाव मांगी थी

श्रृंगवेरपुर उत्तर-प्रदेश के जनपद इलाहाबाद की तहसील सोराँव में, इलाहाबाद शहर से तैंतीस किलोमीटर दूर इलाहाबाद-लखनऊ मार्ग पर मुख्य रोड से तीन किलोमीटर अंदर गंगानदी के किनारे स्थित है। राजस्व अभिलेखों में इसका नाम सिगरौर है। यहाँ ऋषि श्रृंगी (श्रृंगी) का आश्रम था (श्रृंगवेरपुर श्रृंगी ऋष्याक्षम, अध्यात्म रामायण टीका 5/7)। यहाँ ऋषि श्रृंगी एवं माँ शांता का मंदिर है। यहीं निषादराज गुह का किला भग्नावशेष के रूप में विद्यमान है। यहीं राम ने लक्ष्मण और सीता सहित अयोध्या से चौदह वर्ष के लिए वनवास पर जाते समय गंगा नदी पार करने हेतु केवट से नाव की मांग की थी।

महर्षि कश्यप के पुत्र विभाण्डक ऋषि यहीं पतित पावनी गंगा के किनारे रहकर तपस्या करते थे। उनके हवन आदि करने के कारण यहाँ बने कुण्ड को ‘विभाण्डक कुण्ड’ कहा जाता है। आज भी गंगा के किनारे वह स्थान विभाण्डक कुण्ड के नाम से प्रसिद्ध है। उस स्थान पर अथाह जल बताया जाता है। महाभारत के वनपर्व को 113-125 वें श्‍लोक में इसी विभाण्डक कुण्ड को ‘महाहृद’ कहा गया है, जिसमें स्नान करना अतिशय पुण्यदायक माना जाता है। वाल्मीकि रामायण में महर्षि वाल्मीकि श्रृंगवेरपुर में राम, लक्ष्मण व सीता के अवस्थान के बारे में कहते हैं।

अग्निपुराण में तीर्थ महात्म्य प्रकरण में कहा गया है- मंदाकिनी चित्रकूटं श्रृंगवेरपुरं परम्। गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरित मानस के अयोध्याकाण्ड में वर्णित किया है कि जब भगवान् राम, लक्ष्मण व सीता श्रृंगवेरपुर में नाव से गंगा नदी को पार करने लगे तो नाव नदी के बीच में पहुँची, तब सीता ने गंगा जी से मनौती मांगी कि ‘‘जब हम चौदह वर्ष का वनवास बिताकर सकुशल लौटेंगे, तब आपकी अनेक प्रकार से पूजा करूंगी।’’

वाल्मीकि रामायण बालकाण्ड 15 सर्ग 12 और अध्यात्म रामायण 3/15 में वर्णित है कि सुमंत्र के कहने पर राजा दशरथ ने श्रृंगी ऋषि को सम्मानपूर्वक ले जाकर पुत्र प्राप्ति हेतु पुत्रेष्टि यज्ञ सम्पन्न कराया था, जिसके फल स्वरूप राजा दशरथ को राम, लक्ष्मण, भरत और शतुघ्न नामक चार पुत्रों की प्राप्ति हुई। विष्णुपुराण नागर खण्ड के अनुसार शांता राजा दशरथ की पुत्री थी, जो सुमित्रा से पैदा हुई थी। वाल्मीकि रामायण युद्धकाण्ड 125/22 में उल्लेखित है कि लंका पर विजय प्राप्त कर अयोध्या वापस लौटते समय भगवान राम ने हनुमान जी को श्रृंगवेरपुर में निषादराज गुह को अपने लौटने का शुभ समाचार देने हेतु भेजा था। हनुमान जी ने श्रृंगवेरपुर में निषादराज गुह से भेंटकर राम के सखा गुह को राम का कुशल समाचार दिया।

महाकवि कृतिवास के ‘कृत्तिवास रामायण’ में वर्णित है कि वन-गमन के समय जब राम ने श्रृंगवेरपुर को देखा तो वे बहुत हर्षित हुए। वाल्मीकि रामायण (अयोध्या काण्ड 83/99, 20) में कहा गया है कि जब भरत भगवान् राम से मिलने वन में जा रहे थे, तो वे श्रृंगवेरपुर गये थे। वहाँ गंगा की पवित्रता तथा रमणीयता से वे इतने अभिभूत हो गये थे कि उन्होंने अपने सारथी सुमंत्र से कहा कि हम यहीं पर इंगुदी वृक्ष के नीचे आज रात बितायेंगे।

उत्तर रामचरित नाटक के प्रथम अंक में वनवास से अयोध्या वापस आते वक्त राम के श्रृंगवेरपुर जाने व सीता को वन जाने के समय श्रृंगवेरपुर प्रवास के प्रसंग को बताने का वर्णन इस प्रकार है – हे सीते! श्रृंगवेरपुर में यह इंगुदी (हिंगोट) का वृक्ष है, जहाँ पहले प्रिय निषाद राज (गुह) से हमारी भेंट हुई थी।

गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरित मानस के अयोध्या काण्ड में राम के श्रृंगवेरपुर गमन, निषादराज गुह से भेंट, नाव से गंगा पार करने जैसे प्रसंगों का विस्तारपूर्वक वर्णन किया है। कम्बरामायण के अयोध्या काण्ड में वर्णन है कि श्रृंगवेरपुर में भगवान राम को गुह ने शहद और मछलियां भेंट स्वरूप दी थीं।

कोई ऐसा आर्ष ग्रंथ नहीं है, जिसमें श्रृंगवेरपुर का वर्णन प्राप्त न होता हो। वाल्मीकि रामायण, महाभारत, स्कन्द पुराण, मत्स्य पुराण, अग्नि पुराण, वाराह पुराण, विष्णु पुराण, पद्म पुराण, भागवत पुराण, अध्यात्म रामायण, उत्तर रामचरित, रामचरित मानस, भगवंत भास्कर, मनोरमा, हनुमन्नाटक, शेखर, नेपाली भानु भक्त रामायण, कृतिवास रामायण, बुंदेली रामायण, छन्द रामायण, सोरवे रामायण, गिरधर रामायण, कम्बरामायण, तेलुगु श्रीमोल्लरामायण आदि ग्रंथों में श्रृंगवेरपुर में राम के जाने, गंगा पार करने, निषादराज गुह से भेंट प्रभृति प्रसंगों की सविस्तार चर्चा हुई है। इसके अलावा आइने अकबरी, प्रयाग प्रदीप, कनिंघम की ज्योग्राफी आर्कोलॉजिकल रिपोर्ट, रामसिंह की काव्य-प्रकाश टीका, डिस्ट्रिक्ट गजेटियर ऑफ इलाहाबाद आदि ग्रंथों में श्रृंगवेरपुर का विस्तार से उल्लेख मिलता है।

प्राचीन काल में श्रृंगवेरपुर (सिगरौर) संभवतः सूर्य की पूजा का केन्द्र रहा होगा। यहां के राजघाट पर सूर्य की मूर्ति मिली है। यहाँ लगभग एक किलोमीटर का एक टीला है, जिसे ऋषि तलैया एवं सूर्याभीटा के नाम से जाना जाता है।

सोराँव तहसील जिसके अंतर्गत श्रृंगवेरपुर स्थित है, का नाम शोभिताराम का ही अपभ्रंश रूप प्रतीत होता है। आराम का अर्थ होता है बाग-बगीचा। शोभिताराम का अर्थ है बाग-बगीचे से सुशोभित प्रदेश। इस प्रकार इसका दूसरा नाम सोराभ भी है। वनगमन के समय राम यहाँ रात्रिभर के लिए सोये थे, इसलिए इसका नाम सोराभ पड़ा होगा।

श्रृंगवेरपुर धाम की परिामा पांच घाटों द्वारा की जाती है। वे हैं- गऊ घाट, मौनी घाट, श्रृंगवेरपुर घाट, रामचौरा घाट,  कुर्रई घाट (सीता कुण्ड)। श्रृंगवेरपुर से प्राप्त एक प्रतिमा में धनुर्धर राम, लक्ष्मण, हनुमान व सुग्रीव विराजमान हैं, यह प्रतिमा इलाहाबाद संग्रहालय में रखी है। श्रृंगवेरपुर में उत्खनन से पता चलता है कि यहां की सभ्यता संभवतः कुषाण कालीन थी।

श्रृंगवेरपुर में अनेक मंदिर भी हैं, जैसे- राम- लक्ष्मण-सीता मंदिर, हनुमान मंदिर, निषाद मंदिर, गंगा जी मंदिर आदि। कार्तिक पूर्णिमा को श्रृंगवेरपुर में विशाल मेला लगता है। उसी समय राष्ट्रीय रामायण मेला भी लगता है।

 

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