श्रेष्ठ चिंतन, उदात्त व्यवहार

सब कुछ ठीक चलने के बावजूद अचानक कुछ हो जाना, जिंदगी के रहस्य को उद्घाटित करता है। जिंदगी एक पहेली है, एक रहस्य है, इससे पार पाना आसान नहीं है। चूंकि इसकी अतल गहराई में दबी-छिपी अधिकांश चीजें दिखती नहीं हैं और जो दिखती हैं, उनसे किसी नतीजे पर नहीं पहुंचा जा सकता है, अतः यह एक पहेली नजर आती है। परंतु जिंदगी की इस दृश्य-अदृश्य एवं संकीर्ण-चौड़ी राह पर जो कुछ भी होता है, उसके पीछे सुनिश्र्चित कारण होता है, बिना कारण यहॉं कुछ भी घटित नहीं होता है, इसलिए हमें जो अनहोनी प्रतीत होती है, वह होती नहीं है।

प्रज्ञा प्रखर हो, विवेक दृष्टि पैनी हो, तो हम चीजों को दबी-छिपी होने के बावजूद भी ठीक-ठीक देख पाते हैं, परंतु कभी-कभी देखने के बाद भी हम परिस्थितियों के घटाटोप से उबर नहीं पाते हैं अर्थात् नियति के भोग हमें भोगने ही पड़ते हैं, किंतु इन्हें देखने से स्थिति को नियंत्रित करने या योजनाबद्घ तरीके से इनसे निपटने-जूझने का प्रयास किया जा सकता है। यही इसका लाभ है। विवेक अथवा प्रज्ञा की दृष्टि से देखने पर एकाएक घटने वाली घटनाओं को पहले से देख लिया जाता है। जैसे सावन की मूसलाधार बारिश से पूर्व घर की छत की मरम्मत कर ली जाती है। छत के ठीक होने से बारिश नहीं थमती है, पर हम इससे बच जाते हैं। ऐसे ही जिंदगी की घटनाओं को प्रत्यक्ष करने वाले इसके गहरे रहस्य से परिचित होते हैं और इनसे निपटने को तैयार रहते हैं।

सामान्यजनों को यह ज्ञान नहीं होता है, इसलिए उन्हें दुःख में दुःखी होने और सुख में सुखी होने की प्रिाया से गुजरना पड़ता है। ऐसे में एकाएक एवं औचक बदलती परिस्थितियों से घबराहट होना स्वाभाविक है, पर क्या कोई ऐसा सूत्र है, जिसके द्वारा हम जिंदगी के तमाम रहस्यों को न भेद पाने के बाद भी कुछ हद तक स्वयं को नियंत्रित कर लें, सहेज-संभाल लें। ऐसे सूत्र हैं। ये एक नहीं, अनेक हैं कि प्रखर प्रज्ञा एवं विवेक दृष्टि की कमी के बावजूद इन सूत्रों के माध्यम से हम परिस्थितियों से जूझने का साहस कर सकते हैं। जिंदगी को जीने के लिए और बेहतर ढंग से जीने के लिए ऐसे तमाम सूत्र हैं। इन सूत्रों को बताने-समझाने के लिए ऊपरी कक्षा से सतत लोग यहां आते रहते हैं और अपने अनुभवों के आधार पर दूसरों को इस क्षुरस्य धारा रूपी जिंदगी के वार टालने की सीख प्रदान करते हैं।

संत, महात्मा, फकीर ऊपरी लोक के होते हैं और लोक-शिक्षण देने इस धरती पर पधारते हैं। ये अपने लिए नहीं, बल्कि औरों के लिए यहां आते हैं और जीवन भर जीवन के सूत्रों की ही तो व्याख्या करते रहते हैं। समझदार व्यक्ति इन्हें समझता है और इनके सिखाए हुए सूत्रों पर अपने जीवन में अमल करता है।

सामान्यतः हमें खोने का डर सताता रहता है, क्योंकि हम अपरिग्रही नहीं हैं। परिग्रह में ही तो भय है, परंतु परिग्रह करते-करते एकाएक इतनी गाढ़ी कमाई की संपदा पल भर में समाप्त हो जाती है और ठीक इसके उलटा एकाएक ऐसा चमत्कार होता है कि हम करोड़पति बन जाते हैं। बात बड़ी अबूझ है। खोते हैं तो दुःखी होते हैं और पाते हैं तो फूलकर कुप्पा बन जाते हैं। ऐसे में ये लोक-शिक्षक सूत्र द्वारा बताते हैं कि जरा ठहरो, इसमें खुशी और दुःख की बात नहीं है, बल्कि बात यह है कि जो हो रहा है, वह तो होगा और उसे होने दो, वरन दूर खड़े सदैव एवं सतत श्रेष्ठ कर्म में निरत रहो। दुःख में किसी को दोष न दो और सुख में इतराओ मत। दोनों ही धूप-छॉंव के समान हैं और आते-जाते रहेंगे। तुम इनमें खो मत जाओ, बल्कि देखो इन्हें।

आप्तोपदेश यही कहता है। यह बताता है कि सदा औरों की भलाई करने एवं सेवा करने में मग्न रहो, किसी पर कटाक्ष मत करो, भावनात्मक पीड़ा मत दो और पाप के भागी मत बनो, क्योंकि ऐसा न कर सके तो तुम अपनी जिंदगी के खेत में बबूल के पेड़ बोओगे। बबूल में कॉंटा होता है तथा यह पैर में भी चुभेगा और इस राह में बढ़ने वाले राहगीरों को भी चुभेगा। यदि ऐसा कर सके तो हमारे जीवन का बगीचा सुंदर फलों वाले सदाबहार वृक्षों से हरा-भरा हो जाएगा। यदि इससे हम स्वयं संतुष्ट रहेंगे तो औरों को भी प्रसन्न कर सकेंगे। यही है अर्जन, जो आंतरिक और बाहरी, दोनों प्रकार की खुशी प्रदान करता है। सतत अर्जन की जमा पूंजी भले ही हमें तात्कालिक लाभ न दे, परंतु यह व्यर्थ नहीं होता है। इसका परिणाम सुनिश्र्चित है। एक दिन आएगा, जिस दिन हम निहाल हो पाएंगे।

सतत श्रेष्ठ करने का यह सूत्र जीवन को आमूलचल रूपांतरित करने में सक्षम एवं समर्थ है। हम जिंदगी की तमाम ऊँचाई-निचाई एवं रहस्य से अनभिज्ञ होने के बावजूद इस सूत्र का पालन करके जिंदगी की बागडोर थाम सकते हैं। यह जरा भी अतिशयोक्ति एवं अतिरंजित नहीं है, पर हां इसके लिए हर परिस्थिति में श्रेष्ठ करते रहने का साहस संजोना जरूर पड़ेगा, क्योंकि जब हम किसी का भला करते हैं तो वह व्यक्ति स्वयं हमारा विरोधी बनकर खड़ा हो जाता है। ऐसे में भला करना कितना दुष्कर होता है, यह अनुभवी ही समझेंगे। फिर भी भला करना एक साहस का काम है और ऐसा करना चाहिए। अनुभवी बताते हैं कि इससे आंतरिक शक्ति का इतना विकास हो जाता है कि यह पूंजी हजारों हाथों से लुटाने के बावजूद भी बनी रहती है।

अतः जीवन में यह सूत्र कि हर परिस्थिति में अच्छा कर्म करना चाहिए और किसी का बुरा नहीं करना चाहिए, को यदि अपना लिया जाए तो जीवन में स्वयं ही विवेक फूट पड़ता है। इस अभ्यास को बढ़ाकर सारे कर्म को निष्काम कर्म की ओर ले जाना चाहिए। यदि जीवन में निष्काम कर्म सध जाये तो हम अपने जीवन को बड़ी ही खूबसूरती से जी सकते हैं। ऐसी स्थिति में हम जीवन की परिधि से केंद्र की ओर अग्रसर होते हैं और जीवन की अनगिनत समस्याएँ एवं गुत्थियां सुलझाने लगते हैं, क्योंकि भ्रम ही है, जो हमें इन गुत्थियों में बेहद उलझाए रखता है। विवेक के प्रकाश से भ्रम के काले बादल छंटने लगते हैं और यह विवेक हमें श्रेष्ठ कर्म से, निष्काम कर्म से, प्रभु के स्मरण से और तपस्या से प्राप्त होता है।

विवेक दृष्टि पैदा होते ही हम अपने जीवन के केंद्र में खड़े होते हैं और तब अबूझ पहेलियों को बूझने लगते हैं। हालांकि, यह स्थिति साधन एवं साध्य का परिणाम है, परंतु हम इस स्थिति तक पहुंच सकते हैं और जीवन की अनहोनी पहेली से परिचित होकर इससे निकल भी सकते हैं। इसके लिए आवश्यक है, सतत श्रेष्ठ चिंतन, शुभकर्म एवं उदात्त व्यवहार। यही वह कारण है, जिसकी परिणति एक पहेली बनती है। अतः हमें आत्म-कल्याण एवं परमार्थ कार्य में सतत निरत रहना चाहिए।

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