संजय कुंदन की कविता

ऐसा क्या न कहें या ऐसा क्या न करें

इस बात की पूरी गुंजाइश है

कि कल रात सबने एक ही किताब पढ़ी हो

सबने आईने के सामने

एक ही काल्पनिक प्रश्र्न्न के

एक ही उच्चार को दोहराया हो

 

संभव है सबने सुबह-सुबह

एक ही मंदिर में

एक ही देवता के सामने हाथ जोड़े हों

इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता

कि सबके पिता की पेंशन बराबर हो

यह भी हो सकता है

यह उनका पच्चीसवॉं साक्षात्कार हो

वो पॉंचों जो अजनबी थे एक दूसरे के लिए

एक-दूसरे को प्रतिद्वंद्वी की तरह देख रहे थे

अब से थोड़ी ही देर बाद

एक छोटे कमरे में बैठे कुछ लोग

उनमें से एक को सफल घोषित करने वाला था

अब से थोड़ी ही देर बाद

यह तय हो जाना था

कि उनमें से कोई एक ऐसा है

जो थोड़ा अलग है

जो थोड़ा बेहतर है

वो पांचों जो बिल्कुल

एक-दूसरे की तरह लगते थे

एक-दूसरे को देखते हुए सोच रहे थे

कि साक्षात्कार में ऐसा क्या कहें या क्या करें

या ऐसा क्या न कहें या ऐसा क्या न करें

कि चारों से अलग ऩजर आएँ।

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