सहज कविता का धरातल

पुस्तक : हादसों का शहर

कवि : वीरेन्द्र सिंह गूम्बर

प्रकाशक : जनता प्रकाशन, नई दिल्ली

मूल्य : एक सौ रुपया मात्र।

वीरेन्द्र सिंह गूम्बर कवि भी हैं और कहानीकार भी हैं। “हादसों का शहर’ उनकी काव्य-कृति है, जिसकी पृष्ठभूमि में भारत की राजधानी दिल्ली है। महानगर के जीवन का सबसे बड़ा यथार्थ अगर कुछ दिखाई देता है तो वह हादसा है। सभ्यता एक नये कोण पर खड़ी है। उसने विभिन्न क्षेत्रों में प्रतियोगिताओं की आपाधापी पैदा कर रखी है। इस आपाधापी ने शहरी जीवन शैली को तो बदला ही है, एक ऐसी मानसिकता को भी जन्म दिया है जो सबको रौंद कर आगे बढ़ जाने को लालायित है। इस परिस्थिति में आदमी का सहज स्वाभाविक सरोकार भी बदल गया है और उसे एक त्रासद कुंठा का शिकार बना दिया गया है। इसी कुंठा के गर्भ से ाूरता और अपराध का जन्म हुआ है, इसी गर्भ से हादसा भी जन्म ले रहा है। मूल्यों की बात तो अलग रख दी जाय, संवेदना की धरती भी वंध्या हो गई है। गूंबर ने अपनी कविताओं को इसी पृष्ठभूमि पर उभारा है और दिल्ली- जिसे देश की राजधानी होने का गौरव प्राप्त है, वह उन्हें हादसों का शहर दिखाई देती है। सही मायने में कवि की संवेदना ने इस यथार्थ को पकड़ा है कि शहर उन अमानवीय और ाूरतम परिस्थितियों की गोद में सो रहा है जहॉं मासूम बच्चों की हड्डियॉं और उनकी चीखें उसकी बुनियाद में दफन हैं। कवि का कथन है- “हादसों का शहर विनम्र श्रद्घांजलि है उन रूहों को- जो असमय ही विकृत (निठारी कांड) प्रवृत्तियों के वहशीपन का शिकार हुई।’ लेकिन इन हादसों के बीच झूलती जिन्दगी के संवेदनात्मक और सकारात्मक पहलू से भी कवि अपने को अलग नहीं रख पाता और जहॉं कहीं भी इस अंधेरे में चमकती हुई कोई रोशनी, भले ही वह टिमटिमाते जुगनुओं की ही क्यों न हो, उसे मिल जाती है तो वह उसका खुले मन से स्वागत करता है।

इस अर्थ में वीरेन्द्र सिंह गूम्बर अपने को सरोकारों का कवि सिद्घ करते हैं। ऐसे सरोकार, जो अपना सरोकार होने का अर्थ बड़ी तेजी से खोते जा रहे हैं। हादसों का सबसे खतरनाक पहलू भी यही है कि महानगरीय सभ्यता ने सामाजिकता के सभी आयामों को खो दिया है, और सरोकार तो विकसित ही होते हैं सामाजिकता की बुनियाद पर। अतः शहर अब एक अनियंत्रित भीड़ का अजायबघर बन कर रह गया है, जहॉं शोर-गुल और आपाधापी के सिवा कुछ है ही नहीं। इस त्रासदी की मनोवैज्ञानिकता को गूम्बर ने बखूबी समझा है और इसकी अभिव्यक्ति के लिए उन्होंने कविता में बड़ी कुशलतापूर्वक कहानी तत्व का भी प्रयोग किया है। इस दृष्टि से संकलन की बहुत-सी कविताएँ, कविता होते हुए भी लघकुथा-सी लगती हैं।

वैसे गूम्बर के पास भाषा है, एक मजबूत और तराशी हुई भाषा। एक ऐसी भाषा- जो शब्दों और उनके घेरे में बंधे अर्थों को नाकाफी सिद्घ कर देती हैं और कहे को कम तथा अनकहे को ज्यादा उभारती है। साथ ही एक ऐसी भाषा, जो आपके सामने तस्वीर भर पेश करती है और सोचने-समझने की जिम्मेदारी आप पर डाल देती है। इन कविताओं को पढ़ते हुए पाठक को यह समझ में आना लाजमी है कि कविता के माध्यम से कवि को प्रक्षेपित नहीं किया गया है। कवि अपने को बचाता है और कैनवास पर सिर्फ तस्वीर टॉंग देता है, बाकी का काम पाठक के हवाले। यह तटस्थ रचनाधर्मिता गूम्बर के काव्य में महत्वपूर्ण आयाम बन कर उभरी है। अलावा इसके, उन्होंने रोजमर्रा की जिन्दगी से प्रतीकों को उठाया है जिनके जरिये वे अपने कथ्य का संप्रेषण बहुत आसानी से कर लेते हैं। हिन्दी की काव्य-धारा में इसे एक विशिष्ट प्रयोग माना जाएगा, क्योंकि कविता की नई धारा का कवि स्व़यं तो अपने कथ्य को लेकर उलझा हुआ है, बड़े जटिल प्रतीकों के जरिये अपने पाठक को भी उलझाने का काम करता है।

“हादसों का शहर’ में संग्रहीत वीरेन्द्र सिंह गूम्बर की कविताओं की समीक्षा बहुत दार्शनिक स्तर पर न भी की जाय, तो भी इस विषय में समीक्षक को यह तो कहना ही पड़ेगा कि ये कवितायें सहज भाव-बोध की कवितायें हैं और बहुत साफ-सुथरी हैं। कविता का यह पक्ष अत्यंत प्रभावशाली होकर उभरा है। उनकी कवितायें न सैद्घांतिक हैं और न दार्शनिक, लेकिन जीवन के यथार्थ-बोध से उनका जुड़ाव उन्हें दार्शनिक बनाने से परहेज नहीं करता। कविताओं की खूबी यही है कि वह जीवन के साथ-साथ चलती हैं, जिससे कल्पनाशीलता अपनी अनावश्यक उड़ान को नियंत्रित रखने में कामयाब हुई है। अनुभवों और अऩुभूतियों को वैचारिक धरातल तो दिया ही गया है, उसकी संवेदनात्मक शक्ति की भी उपेक्षा नहीं की गई है।

कवि विसंगतियों और विद्रूपताओं को उभारने वाली परिस्थितियों से आहत अवश्य दिखाई देता है, लेकिन नकारात्मकता उसकी कविता को आाांत नहीं करती है। वह जीवन की जिजीविषा को केन्द्र में रखता है और उसकी दृष्टि सकारात्मक स्थितियों को वरीयता देती है। सामाजिक परिवर्तनों की अन्तर्धारा उसे भी उद्वेलित करती है और टूटते संबंधों की कचोट उसे भी पीड़ा देती है, लेकिन इस पीड़ा को वह घुटन, अवसाद और संत्रास के रूप में नहीं प्रस्तुत करता। इन स्थितियों में भी वह सकारात्मक पक्ष को ही उभारने की चेष्टा करता है। संबंध अगर नये अर्थों की खोज में हैं तो उन सरोकारों को पहचान देने के लिए कवि भी नये शब्दों की खोज करता है। इस दृष्टि से वीरेन्द्र सिंह गूम्बर नवीनता के प्रति अटूट आस्था से बंधे तो दिखाई देते हैं लेकिन पुरातन का विछोह भी कहीं न कहीं उनके मर्म को स्पर्श कर उसे करुणा-विगलित कर देता है। प्रस्तुत हैं उनकी कविताओं के कुछ अंश-

  1. कहीं रोटियों के

अस्तित्व को ़खतरा था।

तो कहीं,

रोटियॉं सेंकी जा रही थीं।

  1. इस समय में

जहॉं हम जी रहे हैं

शब्द कुछ ठहरे हुए हैं।

  1. तुम्हारा आत्मविश्वास

मेरे अशांत मन के

सरोवर में

झिलमिलाने लगता है

  1. नई पीढ़ी

शेयर बा़जार के ग्राफ की तरह

ऊँचाईयों को छूकर

पटखनी खा जाती।

  1. व़जूद तलाशती स्त्री को

नये बा़जार में उतारा

बेहतरीन उत्पाद की शक्ल में

बिकाऊ बना कर।

  1. मॉंगना ह़क नहीं उसका

फितरत बन चुकी है

वह जान गया है

काली कमाई करने वाले

भूखा नहीं मरने देंगे उसे।

– रामजी सिंह “उदयन’

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