साइलेंट किलर

भले हम दुनिया में तेजी से उभरती आर्थिक महाशक्ति हों, भले भारत की आर्थिक विकास दर चीन के बाद दुनिया में सबसे ज्यादा हो, लेकिन यह हैरान और शर्मसार कर देने वाली बात है कि दुनिया में 6 साल से कम उम्र के जितने भी बच्चे रक्ताल्पता के शिकार हैं, उनमें 75 फीसदी सिर्फ हिंदुस्तान के हैं और दूसरा हैरान करने वाला आंकड़ा यह है कि डायरिया के शिकार हिंदुस्तानी बच्चों में से सिर्फ 34 फीसदी को ही ओआरएस घोल मिल पाता है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि भारत के भविष्य का “साइलेंट किलर’ कौन है।

दुनिया में जहां मां द्वारा दूध पिलाये जाने का चलन बढ़ रहा है, वहीं तमाम विज्ञापनों और अभियानों के बावजूद हिंदुस्तान में घट रहा है। महज 45.8 फीसदी बच्चों को ही पैदा होने के बाद छह महीने तक नियमित रूप से मां का दूध मिल पा रहा है। हैरान करने वाली एक बात और है कि शहरों में जहां महिलाओं द्वारा बच्चों को अपना दूध पिलाने का चलन बढ़ रहा है, वहीं हाल के सालों में गांवों में तेजी से घट रहा है। अगर 50 फीसदी से ऊपर रहने के बाद पिछले कुछ सालों में पैदा होने के छह महीने तक मां का दूध पीने वाले बच्चों का प्रतिशत गिरकर 45 रह गया है, तो इसमें सबसे बड़ा योगदान गांव की महिलाओं में बच्चों को दूध पिलाने के प्रति बढ़ती उदासीनता है। हालांकि पिछले कुछ सालों में प्रचार के कारण बच्चा पैदा होने के एक घंटे के अंदर उसे दूध पिलाने वाली मांओं का प्रतिशत 35 हो गया है, जबकि पहले इससे यह कम था। लेकिन विशेषज्ञों को अभी भी इस बात की चिंता सता रही है कि बच्चा पैदा होने के एक घंटे के अंदर आमतौर पर वही महिलाएं दूध पिलाती हैं जिनके पास बच्चों को और कुछ देने का कोई जरिया नहीं होता।

पिछले एक दशक के अंदर भारत की आर्थिक तस्वीर में बहुत बड़ा फेरबदल हुआ है। पहले के मुकाबले अब यह तस्वीर कहीं ज्यादा चमकदार भी है। पहले के मुकाबले अब न सिर्फ बाजारों, सड़कों, दफ्तरों बल्कि लोगों के घरों में भी आर्थिक विकास के चिन्ह ज्यादा दिखायी पड़ रहे हैं। लेकिन हैरानी की बात यह है कि अभी भी पैदा होने वाले तीन में से एक बच्चा अंडरवेट है यानी उसका जितना वजन होना चाहिए उतना नहीं है और अगर क्लीनिकली आधार पर देखें, तो ज्यादातर बच्चे समय से पहले पैदा हो रहे हैं। यह भी जच्चा-बच्चा के कमजोर विकास का नतीजा है। बच्चों की इस दुर्दशा में चाहे हरियाणा जैसा संपन्न राज्य हो अथवा छत्तीसगढ़ जैसा विपन्न, दोनों में कोई खास फर्क नहीं है। छत्तीसगढ़ में जहां 52 फीसदी बच्चे कुपोषण और पैदा होने के समय अंडरवेट का शिकार हैं, वहीं हरियाणा में यह 45 फीसदी के आसपास है। यानी कोई बहुत बड़ा फर्क नहीं है। गुजरात जोकि देश का सबसे संपन्न राज्य है वहां इस तरह के पैदा होने वाले बच्चों की तादाद 47.4 फीसदी है। उत्तर प्रदेश से भी .1 फीसदी ज्यादा। क्योंकि उत्तर प्रदेश में ऐसे बच्चों का प्रतिशत 47.3 है।

आखिर इसका क्या मतलब है? क्या इसका मतलब यह नहीं है कि हमारे संपन्न से संपन्न राज्यों का पारंपरिक समाज स्त्रियों के स्वास्थ्य के प्रति वैसा ही रवैया रखता है, जैसा समाज के गरीब तबकों का होता है यानी औरतों के स्वास्थ्य की हालत चिंताजनक है फिर चाहे वह गरीब प्रांतों की औरतें हों या अमीर प्रांतों की। कहने का मतलब यह कि यह समस्या आर्थिक से कहीं ज्यादा सामाजिक और सामंती बोध का नतीजा है।

देश का सबसे ज्यादा पढ़ा-लिखा और जेंडर सेक्स के मामले में उदाहरण पेश करने वाला राज्य केरल है। लेकिन केरल में औरतें भले ज्यादा हों मगर औरतों का स्वास्थ्य भी बेहतर हो, यह जरूरी नहीं है। यही वजह है कि केरल में जितने बच्चे पैदा होते हैं उनमें दो-तिहाई कम वेट और अविकास के शिकार होते हैं। चिंताजनक बात यह है कि केरल में भी अंडरवेट बच्चों की तादाद में बढ़ोत्तरी हो रही है। आन्ध्र प्रदेश में भी पिछले कुछ सालों में अंडरवेट पैदा होने वाले बच्चों की तादाद में 4 फीसदी का इजाफा हुआ है। जबकि आन्ध्र प्रदेश में पिछले एक दशक में औसतन लोगों की आय में 10 फीसदी का इजाफा हुआ है और मध्यवर्ग में यह इजाफा 50 से 200 फीसदी तक का हुआ है। लेकिन हैरानी की बात यही है कि तमाम आर्थिक विकास के बावजूद महिलाओं की सामाजिक स्थिति बेहतर नहीं होने से जच्चा और बच्चा के स्वास्थ्य का बुरा हाल है। इससे एक नई बहस भी शुरू हो गयी है कि क्या वास्तव में समृद्घि तमाम सामाजिक समस्याओं का हल है? पहले भावनात्मक समस्याओं के बारे में कहा जाता था कि वे समाज के चलन को प्रभावित नहीं कर पातीं। यही कारण है कि पंजाब जैसे समृद्घ राज्य में भी कन्या भ्रूण की सबसे ज्यादा हत्या होती है।

लेकिन यह तो विशुद्घ रूप से भौतिक समस्या है, स्वास्थ्य से जुड़ी समस्या। मगर इसमें भी जबरदस्त ढंग से महिलाएं और बच्चे उपेक्षित हैं। इससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि जब तक समाज के बुनियादी चरित्र में बराबरी और लोकतांत्रिक भावना का समावेश नहीं होता, तब तक विकास भी वंचितों की समस्या का हल नहीं कर सकती। देश में खून की कमी वाले बच्चों की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है। इससे साफ पता चलता है कि तथ्यात्मक रूप में भले देश में लोगों की आय बढ़ गयी हो लेकिन बढ़ती महंगाई के कारण लोगों के खानपान पर इसका काफी बुरा असर पड़ा है। निम्न और गरीब तबके की खुराक में लगातार कमी आने के साथ-साथ पौष्टिकता से रहित होती जा रही है। लोगों की तनख्वाह भले बढ़ रही हो लेकिन यह विकास के लिए नई किस्म की समस्या है।

मजे की बात यह है कि बच्चों और स्त्रियों के बिगड़ते स्वास्थ्य की स्थिति में चाहे वह वामपंथी नीतियों से शासित राज्य हों या दक्षिणपंथी, दोनों में कोई खास फर्क नजर नहीं आता। जैसे गुजरात की हालत है उसी तरह बल्कि उससे भी कहीं ज्यादा खराब हालत पश्र्चिम बंगाल में बच्चों की है। पिछले कुछ सालों में पश्र्चिम बंगाल में कुपोषित बच्चों की तादाद बढ़ी है। पहले जहां महज सरकारी आंकड़ों के मुताबिक कुपोषित बच्चों की संख्या 13 फीसदी थी वहीं अब इनकी संख्या बढ़कर 19 फीसदी हो गयी है। यह बेहद चिंताजनक तथ्य इसलिए भी है क्योंकि बच्चे किसी भी राजनीतिक पार्टी के एजेंडे में नहीं हैं। बच्चे किसी बड़े सामाजिक, वैचारिक आंदोलन का आधार नहीं हैं। शायद इसलिए क्योंकि बच्चे वोट बैंक नहीं हैं। वरना बच्चों की इस बुरी हालत पर कोई न कोई राजनीतिक दल तो ध्यान देता ही। हैरानी की बात यही है कि चाहे मध्य प्रदेश हो या महाराष्ट, पंजाब हो या हिमाचल, कोई भी राज्य इस मामले में अपवाद के तौर पर भी उदाहरण प्रस्तुत करने की स्थिति में नहीं है। क्या बच्चों के इतने खराब स्वास्थ्य, उनकी इतनी दुर्दशा के बीच हम यह उम्मीद कर सकते हैं कि भविष्य का भारत स्वस्थ और समृद्घ भारत होगा?

– वीना सुखीजा

 

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