सामरिक संतुलनों की शिकार तिब्बत समस्या

तिब्बत की आजादी का सवाल फिर उभर कर अंतर्राष्टीय फलक पर आ गया है। तिब्बत के स्वतंत्रता प्रेमी प्रदर्शनकारियों पर चीन का दमनकारी रवैया पूरे विश्र्व में तूल पकड़ गया और कई जगह ओलम्पिक मशाल भी प्रभावित हुई। लेकिन विश्र्व समुदाय के ढुलमुल रवैये के कारण ही यह समस्या अभी भी बनी हुई है। तिब्बत उस महान परंपरा का वारिस है जिसने दुनिया के सामने शांति, अहिंसा, करुणा, भाईचारा, विश्र्व बंधुत्व, वसुधैव कुटुम्बकम् का आदर्श प्रस्तुत किया। लेकिन वही तिब्बत साम्यवादी व्यवस्था का शिकार होकर पिछले 59 वर्षों से जुल्म, अन्याय व शोषण को सहन करता आ रहा है। जिस साम्यवाद ने शोषण व अन्याय के खिलाफ आवाज उठायी उसी साम्यवादी चीनी व्यवस्था ने तिब्बतवासियों पर दमनात्मक कार्रवाई अब तक बंद नहीं की है।

तिब्बत समस्या को सामरिक परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो यह स्पष्ट हो जाता है कि सामरिक संतुलनों को बनाने व बिगाड़ने की नीतियों के कारण तिब्बत समस्या उत्पन्न हुई और अभी तक सुलझ नहीं सकी है। जिस समय भारत स्वाधीन हुआ उस समय पूरा विश्र्व सामरिक रूप से दो महाशक्तियों में बंटा हुआ था और इन दोनों के मध्य शीत युद्घ चल रहा था। भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित नेहरू अपनी अंतर्राष्टीय छवि को बेहतर बनाने के उद्देश्य से एक नई तीसरी शक्ति को तैयार करने का सपना देखने लगे। गुट निरपेक्षता, तटस्थता व पंचशील जैसे सिद्घांत इसी सपने से निकले थे। पंडित नेहरू ने पंचशील के आदर्श को साकार करने के लिए चीन को अपना सहभागी बनाया, लेकिन चीन नया सामरिक संतुलन बनाने के बजाय अपनी विस्तारवादी नीति के तहत अपने कदम बढ़ा रहा था। नेहरू इस नीति को समझ न सके और ब्रिटिश विरासत में तिब्बत में सेना रखने के जो अधिकार मिले थे, उन्हें 1954 के पंचशील समझौते में छोड़ दिया गया। यदि ये अधिकार भारत के पास होते तो तिब्बत पर चीनियों का कब्जा न हो पाता।

सन् 1959 में बादुंग सम्मेलन में नेहरू जी ने चीनी प्रधानमंत्री के साथ एक संधि पर हस्ताक्षर किये जिसका आशय यह था कि दोनों देश एक-दूसरे के मामले में कोई हस्तक्षेप नहीं करेंगे। अब तक चीन पूरा तिब्बत हड़प चुका था। दलाई लामा भागकर भारत आए और नेहरू जी से मदद मांगी, लेकिन उन्हें निराशा हाथ लगी और उन्हें 17 सूत्रीय समझौते के आधार पर काम करने को कहा गया। दलाई लामा एवं उनकी धर्मसंसद इस समझौते के खिलाफ थी। उस समय भारत ने इस समझौते के खिलाफ आवाज उठायी होती और गुट निरपेक्ष देशों को चीन के खिलाफ खड़ा किया होता तो तिब्बत समस्या का हल तभी निकल आता। लेकिन चीन से मधुर संबंधों की लालसा के कारण ऐसा न हो सका।

चीन के साथ संतुलन बनाए रखने के प्रयास में भारत ने तीसरी गलती भी की। अमेरिका के विरुद्घ और अपने पक्ष में चीन को खड़ा देखने की लालसा में हमने संयुक्त राष्ट सुरक्षा परिषद में अपनी सीट खोई। विदित हो कि पचास के दशक में सुरक्षा परिषद में एक सीट खाली थी जिसके लिए भारत को प्रस्ताव मिला लेकिन चीन के साथ एक जुटता बनाए रखने के लिए भारत ने इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया। उस समय चीन संयुक्त राष्ट संघ का सदस्य भी नहीं था और अमेरिका, ब्रिटेन व ाांस जैसे देश चीन को देखना भी पसंद नहीं करते थे। आज वही चीन भारत को सुरक्षा परिषद में सीट दिए जाने का विरोध करता है।

तिब्बत पर आधिपत्य जमाने के बाद चीन ने भारत के अक्साई चीन क्षेत्र पर अधिकार कर लिया। अब उसका अगला निशाना भारत था। इसीलिए उसने पूरे तिब्बत में सड़कों का जाल बिछा दिया। इसके बाद तिब्बत में 15 डिवीजन सेना तैनात कर दी। चीन मैकमोहन रेखा को मान्यता नहीं देता और भारत के अनेक क्षेत्रों पर अपना दावा जताता है। भारत-चीन सीमा विवाद भी अब तक नहीं सुलझ सका है।

साठ के दशक में तिब्बत समस्या पर एक ठोस पहल अमेरिका द्वारा की गई क्योंकि उस समय वह साम्यवाद का विरोधी था लेकिन 70 के दशक में यह जोश ठंडा पड़ गया। इस दौरान रूस के विरोध में नया सामरिक संतुलन अमेरिका व चीन का बना। खासतौर पर किसिंजर व निक्सन नीति के तहत जब अमेरिका व चीन रूस विरोधी गठबंधन में सम्मिलित हुए तो तिब्बत के प्रश्र्न्न को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। यह वह दौर था जब सारे संसार के कम्युनिस्ट, वामपंथी और गैर वामपंथी दल तीसरी पहचान बनाने के लिए एकत्र हो रहे थे। दूसरी तरफ चीन दुनिया के समस्त दलों से नाता तोड़कर रीगन की रिपब्लिकन, मार्ग्रेट थैचर की कंजरवेटिव और पश्र्चिम जर्मनी की िाश्र्चियन डेमोोटिक पार्टी से मधुर संबंध स्थापित कर रहा था। इस दौर में तिब्बत समस्या को पिछवाड़े रख दिया गया।

अस्सी के दशक में पूरा विश्र्व जनमत तिब्बत के पक्ष में हो गया। 14 अक्तूबर, 1987 को पश्र्चिम जर्मनी के िाश्र्चियन डेमोोट, लिबरल्स व ग्रीन पार्टी ने प्रस्ताव पेश कर संसद से आग्रह किया कि तिब्बत की बिगड़ती स्थिति पर चीन से अत्याचार बंद करनेे को कहे तथा तिब्बत के राजनीतिक बंदियों को रिहा करके दलाई लामा से बात करे। 12 अप्रैल, 1987 को इतालवी संसद की विदेश विभाग की समिति ने प्रस्ताव पारित कर अपनी सरकार पर दबाव डाला कि वह तिब्बत में मानवाधिकार हनन, पर्यावरण के विनाश एवं तिब्बत समस्या को हल करने हेतु चीन पर दबाव डाले। उस दौरान अमेरिका भी पीछे नहीं रहा था। संयुक्त राज्य अमेरिका की संसद कांग्रेस ने यह घोषणा की कि तिब्बत चीन द्वारा कब्जाया हुआ देश है जिसके सही प्रतिनिधि दलाई लामा व वहां की निर्वासित सरकार है। इस आशय के प्रस्ताव पर पूर्व राष्टपति जॉर्ज बुश द्वारा 28 अक्तूबर, 1991 को हस्ताक्षर किए गए।

इन देशों की तरह तिब्बत के मानवाधिकारों के लिए यूरोपीय देशों की संसद में साझा प्रस्ताव पारित हुए। इस तरह 80 के दशक में सारा संसार तिब्बत के पक्ष में हो गया था। इसी दशक में चीनी सरकार द्वारा थ्यानमन चौक पर की गई बर्बरता सभी के रोंगटे खड़ी कर गई। शायद यही वजह रही कि तिब्बत के मसले पर सफलता नहीं मिली। एक बार फिर तिब्बत पूरे विश्र्व में चर्चा का विषय बना हुआ है। तिब्बत के मामले में भारत को अपनी नीति स्पष्ट करनी होगी। चीन के साथ भारत का सीमा विवाद अभी सुलझा नहीं है। चीन वादों व समझौतों का पालन कभी नहीं करता, यह तथ्य भारत जान चुका है। जब तिब्बत आजाद होगा तो भारत की सीमाएं चीन से नहीं मिलेंगी और यही स्थिति भारत के लिए बेहतर होगी।

 

– डॉ. एल. एस. यादव

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