साहसी बकरी

एक सदाबहार मनमोहक जंगल था। उसके एक तरफ ऊँचा पर्वत था, जिससे एक सुंदर-सा झरना निकलता था, जो आगे चलकर एक पहाड़ी नदी में बदल गया था। उस जंगल में ऊँचे-ऊँचे विशाल वृक्ष थे। जंगल के बीच में हरी-भरी घास का एक बहुत बड़ा मैदान था। उस जंगल में एक ओर जहॉं हिरण, नीलगाय, जिर्राफ और पहाड़ी बकरियॉं रहती थीं, जिनका भोजन घास-फूस था तो दूसरी ओर मांसाहारी शेर, चीते, भेड़िये, जंगली कुत्ते एवं सियार भी रहते थे। दोनों प्रकार के जानवरों के बीच हमेशा तनाव बना रहता था। एक ओर वे मांसाहारी जानवर उन अहिंसक जानवरों का शिकार करने का मौका तलाशते रहते थे तो दूसरी ओर शाकाहारी जानवर उनसे अपनी सुरक्षा के लिए चिंतित रहते थे।

अहिंसक जानवरों के मुखिया थे बूढ़े हाथी दादा। उन्होंने एक दिन हिंसक जानवरों से बचाव के लिए हिरणों, नीलगायों और बकरियों की एक सभा बुलाई और सुरक्षा के कुछ सूत्र बताए। उनका मूलमंत्र था कि जहां भी जाओ, झुंड बनाकर जाओ और संकट के समय सब एक साथ मिलकर आामणकारी पर टूट पड़ो। हाथी दादा के बतलाए इस मूलमंत्र पर अमल करके सभी सौम्य प्राणी सुखपूर्वक रहने लगे।

उसी जंगल में एक बकरे का परिवार भी रहता था। पति-पत्नी और उनके तीन प्यारे-प्यारे मेमने थे। पति-पत्नी दिनभर घास चरते और पास में ही उनके तीनों बच्चे दौड़ लगा-लगाकर खेला करते थे।

एक दिन की बात है। बरसात के दिन थे। बकरी तो अपने तीनों मेमनों के साथ झुंड में वापस लौट गई परन्तु न जाने कैसे उसका पति बकरा उससे बिछुड़ गया। अकेले बकरे को पाकर दो सियारों ने उसे घेरकर उसका काम तमाम कर दिया। बूंदा-बांदी हो रही थी। हवा बहुत तेज थी। पेड़ों के पत्ते तेज हवा में कांप रहे थे। बकरी चिंतित थी कि अभी तक बच्चों के पिता लौटे क्यों नहीं? इसी तरह प्रतीक्षा करते-करते सारी रात गुजर गई, लेकिन बकरा घर न लौटा। लौटता भी कैसे? वो तो उन दुष्ट सियारों का ग्रास बन चुका था।

सुबह भूरी नीलगाय ने आकर बकरी को बताया कि उसके बच्चों के पिता अब नहीं रहे। यह हृदयविदारक समाचार सुनकर बकरी को गहरा सदमा लगा कि उसका संरक्षक प्राणप्रिय पति अब नहीं रहा। परन्तु वह एक बहुत ही साहसी बकरी थी। उसने हिम्मत से काम लिया। जब बच्चों ने उससे पूछा कि पापा कहॉं चले गए, कब वापस लौटेंगे तो बकरी ने बच्चों से कहा, “”तुम्हारे पापा यहॉं से सैकड़ों मील दूर, दूसरे जंगल में चले गए हैं। जब तुम लोग सयाने हो जाओगे, तभी वो वहॉं से लौटेंगे।”

इस झूठे आश्र्वासन से उसके बच्चे शांत हो गए और अपनी दिनचर्या में मग्न हो गए। उन्होंने अब घास चरना सीख लिया था। अकेली बकरी को अब माता एवं पिता दोनों की ही भूमिका निभानी पड़ रही थी। उसने अपने बच्चों को निडरता एवं होशियारी के गुर सिखाने शुरू कर दिए थे।

उधर जिन सियारों ने उसके पति को मारा था, उन्हें बकरी के मांस का स्वाद कुछ ज्यादा ही भा गया था। वे हमेशा इस बकरी और इसके बच्चों का शिकार करने की ताक में रहते थे। हाथी दादा के जासूसों ने उन्हें उन सियारों की नीयत के बारे में आगाह कर दिया था। इसलिए हाथी दादा ने बकरी को सतर्क रहने की सलाह दी। बकरी ने नदी से थोड़ा-सा बालू निकालकर अपने पास रख लिया। उसने बच्चों को ऐसी टेनिंग दी कि वे बालू को अपने मुंह में भरकर फूंक मारने की कला में दक्ष हो गए।

एक दिन अमावस्या की काली रात थी। चारों ओर गहरा सन्नाटा पसरा था। जंगली कुत्तों और सियारों के स्वर बीच-बीच में गूंजकर वातावरण को और भी डरावना बना रहे थे। पूस की उस ठिठुरती रात में बकरी अपने बच्चों को सीने से चिपकाए बहुत सतर्क होकर विश्राम कर रही थी। तभी उसे आभास हुआ कि दरवाजे पर दो सियार घात लगाए आामण की मुद्रा में खड़े हैं। बकरी ने फौरन अपने तीनों बच्चों को जगाया और खुद भी उन सियारों से निपटने को तैयार हो गई।

सियारों ने ज्यों ही बकरी की झोंपड़ी के अंदर प्रवेश किया, उसके बच्चों ने अपने मुंह में बालू भरकर उनकी ओर एक ़जोर की फूंक मारी। बालू सीधा सियारों की आँखों में समा गया और उन्हें कुछ भी दिखाई नहीं दिया। बकरी तो पहले से सतर्क थी ही। उसने अपने नुकीले सींगों से आामण कर उन दोनों सियारों को मौत के घाट उतार दिया। इस प्रकार उस साहसी बकरी ने अपनी हिम्मत और सूझबूझ से काम लेकर अपने बच्चों और अपनी रक्षा की तथा अपने पति के हत्यारे सियारों से बदला भी ले लिया। सुबह जब यह समाचार जंगल में फैला तो अहिंसक जानवरों के मुखिया हाथी दादा खुद उसके पास आए और उसे शाबाशी देकर उसका सम्मान किया।

– रंजन कुमार शर्मा

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