सेवन्ती के फूल

sevanti-ke-phoolआइये! ऊष्माहीन शांत स्वागत था।

नमस्कार। प्रशांत ने विनम्र अभिवादन किया।

दादाजी, प्रणाम। पंखुरी ने भी पिता का मनोभाव ताड़ उन्हें हाथ जोड़कर नमन किया।

इधर आपका नामपट देखा… आप गुरु जी रहे हैं। आपसे मिलने की इच्छा हुई तो चला आया।

अब तक प्रशांत गुरु जी के तख्त के पास ही रखी लकड़ी की एक पुराने ढंग की खाली कुर्सी पर आराम से बैठ चुके थे। पंखुरी ने कोने में रखा स्टूल उठा लिया।

… इसी कॉलोनी की एकदम शुरूआत में जो मिल्क बूथ है, उसी की दायीं तरफ थोड़ा हटकर हमारा घर है। प्रशांत को किसी तरह बात आगे बढ़ानी थी।… आपने शायद आते-जाते कभी मेरा घर देखा होगा, एकदम सफेद पुती कोठी है। काफी बड़े हिस्से में हमने बगीचा लगा रखा है। अभी पंद्रह-बीस दिन पहले तक वहां सेवन्ती खूब खिली थी, खूब बड़े-बड़े फूल झूम रहे थे। अब बहार उतार पर है। बड़ा दुःख होता है, जब बाहर के कुछ दुष्ट लोग हमारी आंख बचाकर अच्छे-अच्छे फूलों की चोरी कर लेते हैं – खासतौर से सवेरे घूमने निकलने वाले। … कैसे लोग हैं, उन्हें क्यारियों में खिले फूल ही नहीं सुहाते। इधर मैं देखा, आपके यहां भी कुछ पौधे लगे हैं। मैं समझता हूं कि आपको भी फूलों का बहुत शौक है। ऐसे लोग जो पेड़-पौधों, फूलों से प्यार करते हैं, मुझे बहुत अच्छे लगते हैं। प्रशांत कहते जा रहे थे।

फिर, कुछ देर दोनों के बीच निःशब्दता का खालीपन बना रहा। मास्टर साहब तख्त पर पालथी मारे, गर्दन झुकाये चिंतक की मुद्रा में बैठे हुए थे। उनकी प्रत्यक्ष प्रतििाया-शून्यता और मौन से प्रशांत क्षणभर के लिए विभ्रमित थे कि वे उनकी बात सुन भी रहे हैं या नहीं।

कुछ खास तो हमारे यहां नहीं है, भाई। आखिर मास्टर साहब चुप्पी तोड़ते हुए बोले। दो-चार गेंदे के पौधे अपने आप उग आये हैं। यहां की मिट्टी अच्छी नहीं है। अपने आराध्य श्री गोपाल कृष्ण की पूजा के लिए अलबत्ता मुझे कुछ फूल लगाने हैं। सवेरे डेढ़-दो घंटे का समय पूजा-पाठ में अच्छा बीत जाता है। रिटायर्ड हुए अठारह साल हो गये हैं। घर में केवल मैं हूं और मेरी धर्मपत्नी। उसे मोतियाबिंद खूब बढ़ा हुआ है, ऑपरेशन करवाना है। उधर गठिया की वजह से मैं कुछ खास करने से लाचार रहता हूं। हां, सवेरे-सवेरे जरूर धीरे-धीरे, जैसे भी हो, एक-डेढ़ कि.मी. घूम आने का मैंने नियम बना रखा है। उसी दौरान इधर-उधर बंगलों से कुछ फूल चुन लेता हूं अपने गोपाल कृष्ण के लिए। …

कहते-कहते मास्टर साहब की नजरें नीची हो गयी थीं। कदाचित् उनकी आंखों में प्रशांत की सफेद कोठी, उसमें लगी विस्तृत बगिया, सुनहरे पीले सेवन्ती के फूलों से लदी क्यारियों के मोहक दृश्य उतर आये थे।

गुरुजी, मैं आपके लिए कुछ पौधे लाया हूं, आपको अच्छे लगेंगे। प्रशांत उठकर फाटक पर निकल आये और हरिराम को आवाज देकर भीतर आ जाने का इशारा किया।

हरिराम प्रशांत का माली है। घर से चलने के पहले उन्होंने एक ठेली पर छः गमले रखवाकर उसे मास्टर साहब का ठिकाना बताकर रवाना कर दिया था और कह दिया था कि वह वहां उनकी प्रतीक्षा करेगा। इन गमलों में प्रशान्त ने दस दिन पहले हरिराम से अगले महीनों में खिलने वाले सुंदर फूलों की पौध लगवा दी थी।

हरिराम ने ठेली से गमले उतार दिये और मास्टर साहब के आंगन में करीने से सजा दिये। आंगन में लगे हैंडपंप से पानी खींचकर उसने पौधों पर थोड़ा सिंचन कर उन्हें और तरोताजा कर दिया। मास्टर साहब दरवाजे पर अवाक् खड़े यह अप्रत्याशित, अकल्पनीय कार्रवाई अचंभित हो देख रहे थे। पंखुरी भी चकित थी। उस दिन प्रशांत वस्तुतः क्या करने जा रहे हैं, यह उन्होंने किसी को भी नहीं बताया था, न पंखुरी को और न ही हरिराम को। हरिराम को तो बस सीमित हिदायत ही दी थी।

गुरु जी, मेरा यही माली कल शाम फिर आयेगा और आपके यहां की इन क्यारियों को भली-भांति संभाल देगा। मैं कुछ बारह मासी और कुछ मौसमी पौधे और भेज दूंगा, जो वह रौंप देगा। इससे आपको अपने ठाकुर जी के लिए पूरे समय सुंदर फूल मिलते रहेंगे। हरिराम आगे भी आपके यहां आता रहेगा। अब आप मुझे आज्ञा दें, मैं फिर आऊंगा। आपको तकलीफ दी, क्षमा चाहता हूं। नमस्कार।

मास्टर साहब कुछ नहीं बोले। उन्होंने प्रशांत के नमस्कार का उत्तर मात्र बुदबुदाते स्वर में दे दिया। सड़क पर आगे बढ़ते हुए प्रशांत ने पीछे मुड़कर देखा, मास्टर साहब अब भी द्वार पर खड़े उन्हें देखे जा रहे थे।

पापा, आपने फूल चुराने वाले को इतने सारे गमले और पौधे क्यों दे दिये? रास्ते में पंखुरी का प्रश्र्न्न था।

बेटी, उन्हें फूलों की जरूरत होती थी। उसे पूरा करने का इंतजाम करने की हमने कोशिश की है। यदि हम उनसे झगड़ते तो उनकी फूलों की जरूरत थोड़े ही खत्म हो जाती। वे और कहीं से फूल तोड़ने लगते।

मगर पापा, आप ऐसे कितने लोगों को गमले देंगे?

नहीं पंखू, सबको नहीं। तुम जानती हो न, ये गुरु जी रहे हैं और आज भी समाज में यानी सबके बीच इसी रूप में जाने-पहचाने जाते हैं। उन्हें आज भी अपने आचरण से लोगों का मूक मार्गदर्शन करते रहना होता है। जो खुद भटक जाये, वह दूसरों को कैसे और क्या रास्ता दिखा पायेगा?

प्रशांत को लगा नन्हीं पंखुरी उनकी बात को काफी कुछ समझ रही है।

लगभग एक महीने बाद प्रशांत फिर मास्टर साहब के घर गये। अब उनके गमलों में कुछ फूल खिल आये थे। क्यारियां नयी आशा का संकेत दे रही थीं। अमरूद और सीताफल के बाल वृक्ष भी बेतरतीब नहीं थे।

गुरुजी, आप मेरे बुजुर्ग हैं, मेरे पूज्य हैं। मैं आपसे कुछ विनम्र निवेदन करना चाहता हूं। आप अन्यथा न समझते हुए मेरी धृष्टता क्षमा करेंगे। यदि मैं कहूं कि…

प्रिय बेटे, तुम आगे कुछ और न कहो तो अच्छा होगा। गुरु जी ने स्नेह से भीगे शब्दों से प्रशांत की बात बीच में ही काटते हुए कहा, मैं तुम्हें उसी दिन समझ गया था, जब तुम पौधे लेकर हमारे घर आये थे। तुम्हें एक बात स्पष्ट कर दूं। अब मैं किसी के बगीचे के फूल नहीं तोड़ता। मैंने प्रातः भ्रमण पर जाने वाले अपने उन साथियों से भी, जो कभी-कभी मेरे जैसा गलत काम कर जाते, ऐसा न करने का वचन ले लिया है। मैं तो जीवनभर बच्चों को चोरी न करने का पाठ पढ़ाता रहा हूं। मैं वह कृत्य कर रहा था, जो कम से कम मुझे तो नहीं करना चाहिए था। सक्सेना जी, मैं अपने बचाव में कुछ नहीं कहूंगा। यह तो मेरे आराध्य श्री गोपाल कृष्ण की कृपा है कि उन्होंने आपके माध्यम से मुझे चेता दिया। … बेटे, तुम्हारे प्रति मेरा आशीर्वाद सदा रहेगा।

गुरु जी के अंतःकरण से निकले निश्छल शब्द उनके मोटे चश्मे के पीछे छलछला आये आंसुओं से सिक्त थे। प्रशांत अब उनके प्रति श्रद्घावान थे। उन्हें लगा, यदि उनकी सेवन्ती के फूल न खिले होते तो उन्हें एक गुरु की वास्तविक गुरुता, महानता और उनके निर्मल मन का परिचय न मिलता। प्रशांत को लगा कैसे सारा वातावरण एक अनचीन्ही भीनी-भीनी खुशबू से मंद-मंद भरता जा रहा है।

 

– दुर्गा शंकर भट्ट

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