स्वच्छता वर्ष में भारत की भागीदारी

दुनिया भर में कम से कम 120 करोड़ लोग शौचालय सुविधा से वंचित हैं। इसमें सर्वाधिक संख्या भारत के लोगों की है। विश्र्व स्वास्थ्य संगठन और यूनिसेफ द्वारा संयुक्त रूप से किए गए अध्ययन रिपोर्ट में बताया गया है कि शौचालय का उपयोग न करने वाले लोगों के देशों की सूची में यह देश पहले नंबर पर है। निश्र्चित है कि इस तरह की रिपोर्ट इस देश के लिए एक चुनौती है। सवाल है कि महाशक्ति बनने की राह पर चल रहा भारत इस तरह के मामले में अपनी छवि कैसे सुधारेगा? इसके लिए कौन से कदम उठाए जाएंगे?

भारत में करीब 66 करोड़ लोग ऐसे हैं जिनके लिए शौचालय की कोई सुविधा नहीं है और उन्हें खुले में मलत्याग के लिए जाना पड़ता है। इस तरह भारत के आधे लोगों के पास शौचालय की सुविधा नहीं है। ऐसे में सवाल यह भी है कि इस बड़ी आबादी को शौचालय की सुविधा किस तरह से मुहैया कराई जा सकती है। हालांकि भारत जैसी स्थिति और भी देशों में है। गौरतलब है कि इस रिपोर्ट के अनुसार भारत के बाद इंडोनेशिया में लगभग छह करोड़ साठ लाख लोग शौचालय की सुविधा से वंचित हैं, इथोपिया में यह संख्या पॉंच करोड़ बीस लाख है और पाकिस्तान में पॉंच करोड़ लोगों को शौचघर नसीब नहीं है। इसी तरह नाइजीरिया में भी दो करोड़ और ब्राजील तथा बांग्लादेश में एक करोड़ अस्सी लाख लोग खुली जगहों में शौच जाने के लिए बाध्य हैं। प्रश्न है कि इन सबके लिए क्या संयुक्त राष्ट स्वच्छता अभियान के लिए और सहयोग नहीं दे सकता? यह ऐसा मुद्दा है जो हर किसी से जुड़ा है लेकिन इस तरफ ध्यान किसका है? जहॉं कहीं गंदगी नजर आती है लोग एक-दूसरे को कोसते हुए आगे निकल जाते हैं। देश के हजारों-लाखों की भीड़ वाले स्वयंसेवी संगठन भी इस दिशा में गिने-चुने ही हैं। उन्हें भी आगे आने और इस दिशा में चलाए जा रहे भारत सरकार के कार्यामों में सहयोग करना होगा ताकि उसका लाभ इनसे वंचित लोगों तक पहुँच सके और भारत की छवि में सुधार हो सके।

राष्टसंघ की ओर से वर्ष 2008 को अंतर्राष्टीय स्वच्छता वर्ष घोषित किया गया है और इसी कड़ी में जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि यह तथ्य स्वच्छता के लिहाज से सबसे जोखिम भरा है। गंदगी और मल से पटे स्थान बच्चों के स्वास्थ्य के लिए बेहद हानिकारक होते हैं क्योंकि इनसे तुरंत दस्त फैलता है। गौरतलब यह भी है कि पॉंच वर्ष से कम आयु के बच्चों में मृत्यु का यह सबसे बड़ा कारण है। यूनिसेफ के कार्यकारी निदेशक एन. एम. वेनेमैन ने भी माना है कि स्थिति यदि ऐसी ही रही तो दुनिया अपने सहस्त्राब्दि वर्ष के स्वच्छता के लक्ष्य से 70 करोड़ लोगों की संख्या से पिछड़ जाएगी। ऐसे में क्या उपाय किये जा सकते हैं, उन सब पर गौर किए जाने की ़जरूरत है।

ऐसा नहीं है कि खुले में शौच जाने की हमारे देश में शुरू से ही परंपरा रही है। ााचीन काल में भी शौचालयों का उल्लेख मिलता है। इसका इतिहास हड़प्पा और मोहनजोदड़ो की संस्कृतियों जितना पुराना है। मुगलकाल में अकबर के राजभवन के अलावा राजस्थान के गोलकुंडा में भी इसके अवशेष प्राप्त हुए हैं और आज के जमाने में इसका महत्व कितना है, सभी जानते हैं। ासिद्घ गायिका जेनिफर लोपेज को उनके पूर्व प्रेमी एफ्लेक ने उनके जन्मदिन पर महंगा शौचालय उपहार में दिया था। थाइलैंड में हाथियों के लिए विशिष्ट शौचालय बने हैं। पेरिस में घरेलू कुत्ते, बिल्लियों के लिए भी शौचालय बनाए गए हैं। यह तो विश्र्व के तमाम उदाहरण भर हैं। भारत सरकार जानवरों के लिए न सही, आम लोगों के लिए ही कुछ सुविधाएं मुहैया करा दे तो उसका नाम उल्लेखनीय हो जाएगा।

यह ़जरूर है कि भारत में इस दिशा में काम करने वाले गिने-चुने संस्थानों में सुलभ इंटरनेशनल का नाम आता है। इसने देशभर में सुलभ शौचालय कॉम्पलेक्स बनाए हैं लेकिन इसकी ़जरूरत वहॉं भी है जहॉं लोग खुले में सड़कों के किनारे, रेल “पटरियों पर’ मलत्याग के लिए जाते हैं। क्या यह संस्थान उन क्षेत्रों को चिह्नित कर इस दिशा में काम करेगा? सुलभ इंटरनेशनल के संस्थापक बिंदेश्र्वरी पाठक का कहना है कि इस विषय पर काम करना तो दूर, कोई बात भी नहीं करना चाहता और इस काम में लगे लोगों को हीन ऩजर से देखा जाता है। शौचालय की सुविधा से वंचित लोगों की संख्या भारत में सर्वाधिक है। ़जाहिर है, भारत को स्वच्छता की दिशा में काफी प्रयास करने की ़जरूरत है तभी सहस्त्राब्दी लक्ष्य को पाया जा सकता है और वंचितों के आंकड़ों में कमी आ सकती है।

केवल भारत में ही नहीं एशियाई, आीकी और लातिन अमेरिकी देशों में भी स्वच्छता सुविधाओं का अभाव है। लेकिन भारत में स्थिति बदतर ही कही जाएगी। भारत में आने वाले सैलानियों को शौचालय की कमी का अंदाजा रेलवे स्टेशनों और रेल-पटरियों के आस-पास के नजारों से मिल जाता है। गांवों में लोग खुली जगहों, जंगलों और खेतों का उपयोग करते हैं। शौचालय नहीं होने से सबसे अधिक परेशानी महिलाओं को होती है। उन्हें सूर्योदय के पहले या सूर्योदय के बाद का इंतजार करना पड़ता है। आखिर 21वीं सदी में यह त्रासदी नहीं तो और क्या है?

संयुक्त राष्ट का प्रयास है कि वह कम कीमत के शौचालय उपलब्ध कराए जिससे इस दिशा में कुछ सहायता मिल सके। निःसंदेह दुनियाभर की गरीब आबादी के समक्ष शुद्घ पेयजल और स्वच्छता के हिसाब से शौचालय का निर्माण आज एक बड़ी चुनौती है और इस पर गंभीर प्रयास किए जाने की ़जरूरत है तभी सफलता मिल सकती है और लक्ष्यों को हासिल किया जा सकता है।

इस रिपोर्ट के अनुसार बुरकिनो फासो, नामीबिया, घाना, मलावी, उगांडा, माली, ब्रुनेई, कैमरून, जांबिया जैसे देशों में स्थिति में अभी और सुधार की गुंजाइश है। हालांकि इस दिशा में किये गए प्रयास सकारात्मक रहे हैं और पूरे दक्षिण-पूर्व एशिया में स्वच्छता सुविधाओं में वृद्घि दर्ज की गई है। 1990 में जहॉं आधी आबादी को यह सुविधा मयस्सर थी वह अब बढ़ कर 2006 में 67 प्रतिशत पर पहुँच गया है। पूर्वी एशिया के देशों में भी अपेक्षाकृत सुधार हुआ है और यह 2006 में 65 प्रतिशत पर पहुँच गया है।

पश्र्चिमी एशिया के कुछ देशों ने वाकई इस दिशा में उल्लेखनीय कार्य किए हैं। उन्होंने स्वच्छता सेवाओं में 84 प्रतिशत तक का सुधार किया है लेकिन नाइजीरिया, चाड और घाना ने 10 प्रतिशत से भी कम सुधार किए हैं। जिन देशों में अभी ते़जी से सुधार की दरकार है उनमें म्यांमार, अरब रिपब्लिक, वियतनाम, ग्वातेमाला, फिलीपींस, अंगोला, पाकिस्तान और मैक्सिको जैसे गरीब देश शामिल हैं। भारत की स्थिति में अभी और सुधार की दरकार है तभी वह एशिया के इस आंकड़े को संतुलित करने में अपनी भागीदारी निभा सकेगा।

 

– मिथिलेश कुमार

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