हमेशा के लिए लुप्त हो सकते हैं

ग्लोबल वार्मिंग और मानवीय हस्तक्षेप बढ़ने से गंगा, गंगाधर (बाबा बर्फानी) और ग्लेशियर पर खतरा मंडरा रहा है। कहीं ऐसा न हो कि हालात और बदतर हो जाएं और आने वाले वर्षों में हम बाबा बर्फानी यानी बाबा अमरनाथ के दर्शन से वंचित हो जाएं। यही नहीं मोक्षदायिनी और मुक्तिदायिनी सदानीरा गंगा भी अन्य नदियों की तरह सीजनल हो जाए। सदानीरा कहलाने वाली गंगा के आधार गोमुख ग्लेशियर का आस्तत्व खतरे में है। हिमाच्छादित क्षेत्रों में बढ़ी हलचल और ग्लोबल वार्मिंग इसके कारण हैं। गंभीर पहलू यह है कि गोमुख ग्लेशियर से बर्फ पिघलने की दर पिछले करीब पंद्रह वर्षों में जहां सर्वाधिक आंकी गई है, वहीं हजारों-लाखों वर्षों से जमी बर्फ की परत भी ग्लोबल वार्मिंग से पिघलने लगी है।

गंगोत्री ग्लेशियर सिस्टम की ऊपरी परत में ग्रेवासिस और निचली परत में स्नो डैम्स बढ़ने से ग्लेशियर लेक आउटब्रस्ट फ्लड (ग्लोफ) की चुनौती भी मुंह बाए खड़ी है। विज्ञानियों की मानें तो अगले 25 वर्ष में क्षेत्र का पूरा ग्लेशियर सिस्टम गड़बड़ा सकता है, जिसका नतीजा गंगा की धारा को बड़े पैमाने पर नुकसान पहुंचाएगा। विज्ञानी चिंतित हैं। इसकी वजह गोमुख समेत ग्लेशियर सिस्टम पर मंडरा रहा खतरा है। दरअसल, सिस्टम में गोमुख के अलावा चतुरंगी, रक्तवर्ण, मेरू और स्वछंद सरीखे आठ बड़े ग्लेशियर शामिल हैं। इनमें गोमुख ग्लेशियर की भागीरथी बेसिन ही नहीं, बल्कि विश्र्व के सबसे बड़े ग्लेशियरों में गिनती की जाती है। 556 किलोमीटर लंबे गंगोत्री ग्लेशियर सिस्टम में गोमु ग्लेशियर का हिस्सा करीब 30 किलोमीटर है। इसकी ऊपरी सतह पर ग्रेवासिस यानी दरारें अथवा टूटन लगातार बढ़ रही है। ऐसा ग्लेशियर पर स्नोलाइन से नीचे अधिक मात्रा में बर्फ पिघलने और डेबरीज कहलाने वाले चट्टानी पत्थरों तथा अन्य अवशेषों के ढेर में बढ़ोत्तरी से हो रहा है। ग्लोबल वार्मिंग से बर्फ पिघलने की दर बढ़ी है।

ग्लेशियर पर सात किलोमीटर लंबी दरारें

रक्तवन और ग्लेशियर का संगम बर्फविहीन होने और यहां से गोमुख तक सात किलोमीटर हिस्से में ग्लेशियर के सिकुड़ने की गति बढ़ने से गंगा भागीरथी का आस्तत्व खतरे में आ गया है। उद्गम स्थल से पीछे की ओर ग्लेशियरविहीन होने का परिणाम है कि अपने उद्गम गोमुख से ही भागीरथी का पानी मटमैला आ रहा है।

भारतीय भू-गर्भ सर्वेक्षण विभाग, जेएनयू और रिमोट सेंसिग एप्लीकेशन सेंटर के अध्ययनों का निष्कर्ष बताता है कि 32 किलोमीटर लंबा और चार किलोमीटर चौड़ा गंगोत्री हिमनद अब सिकुड़ कर 27 किलोमीटर लंबा और 2.5 किलोमीटर चौड़ा रह गया है। 12,770 फीट की ऊंचाई पर स्थित इस ग्लेशियर का गोमुख वाला हिस्सा प्रतिवर्ष 19 मीटर की दर से पीछे खिसक रहा है। ग्लोबल वार्मिंग से यहां की वनस्पति समाप्त होने और हर साल पर्यटकों की भीड़ द्वारा रौंदे जाने से इनके सिकुड़ने की गति में तेजी आई है। रक्तवन और चतुरंगी ग्लेशियर के संगम से भागीरथी ग्लेशियर के अंदर सुरंगनुमा पथ पर बह रही है। यहां से गोमुख तक सात किलोमीटर हिस्से में ग्लेशियर पर दरारें उभर आई हैं। कई बार हिमखंड दरकने से भागीरथी का प्रवाह-पथ अवरुद्घ होकर संगम पर झील भी बन चुकी है।

तबाही मच सकती है

उत्तराखंड में ग्लेशियरों के टूटने से तो लोगों की जान जा ही रही है, ग्लेशियर निर्मित बर्फ की झीलें और तबाही ला सकती हैं। इस खतरे के बाबत ग्लेशियर पर अध्ययन कर चुकी एक्सपर्ट कमेटी ने चेताया है। उत्तराखंड में 75 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को खुद में समाए कुल 127 झीलें मौजूद हैं। जाहिर है, तथ्य संवदेनशील है।

तकरीबन छः माह पहले दिसंबर, 2007 में एक्सपर्ट कमेटी ने अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपी है। उसने कई ब्रेन स्टार्मिंग सेशन और स्पॉट एनालिसिस के आधार पर आने वाले खतरों से आगाह किया है। खासतौर पर हाइडो पावर प्रोजेक्ट्स पर तो खतरा मंडरा ही रहा है। उत्तराखंड में 1280 मेगावॉट इंस्टाल्ड जेनरेशन कैपेसिटी के कुल 12 हाइडो पावर प्रोजेक्ट्स चल रहे हैं। 4134 मेगावॉट इंस्टाल्ड जेनरेशन कैपेसिटी के सात हाइडल प्रोजेक्ट्स हैं, जो पूरे होने की प्रिाया में हैं। इसके अलावा 1961 मेगावॉट इंस्टाल्ड कैपेसिटी के 11 प्रोजेक्ट्स ऐसे हैं, जिन पर इंवेस्टीगेशन चल रहा है।

ऐसे में अगर ग्लेशियर निर्मित बर्फ की झील फटती है तो उनसे निकला जमा पानी हजार क्यूबिक मीटर प्रति सेकंड की दर से खतरनाक बाढ़ की लहरों के रूप में डाउन स्टीम की तरफ बहेगा। इससे भू-स्खलन के साथ ही बांधों को नुकसान पहुंचने की आशंका है। इंस्टाल्ड पावर जेनरेशन कैपेसिटी के कम होने के साथ ही टरबाइन के डैमेज होने की भी आशंका है। कमेटी के चेयरमैन डॉक्टर बी.आर. अरोड़ा थे, जबकि कमेटी में सदस्यों के तौर पर डॉक्टर एच.सी. खंडूरी, डॉ. किरीट कुमार, डॉ. डी. के. पॉल, डॉ. पी. सोनी, डॉ. राजेंद्र डोभाल, डॉ. प्रताप सिंह, डॉ. प्रदीप मूल, वी. हरि प्रसाद, पी.एस. फलणिकर, डॉ. जी. पी. जुयाल, कर्नल एम.एम. मसूर और डॉ. पीयूष रौतेला शामिल रहे।

बर्फानी बाबा हो सकते हैं लुप्त

ग्लोबल वार्मिंग का खतरा अब पवित्र अमरनाथ गुफा में प्रतिवर्ष बनने वाले शिवलिंग पर भी मंडरा रहा है। विज्ञानियों का तर्क है कि जब लाखों वर्ष पुराने गंगोत्री ग्लेशियर सिस्टम तक की प्राकृतिक संरचना बड़े पैमाने पर प्रभावित हो रही है तो साल-दर-साल महज अंशकालिक अवधि के लिए बनने वाले बर्फ के इस शिवलिंग को लुप्तप्रायः होने से आखिर कब तक बचाया जा सकेगा? वह भी तब, जबकि इस क्षेत्र में पर्यावरणीय खतरों के साथ मानवीय हलचल की शक्ल में चुनौतियां लगातार बढ़ रही हों।

आई.आई.टी. रुड़की में कार्यरत वरिष्ठ विज्ञानी डॉ. आर. अनबालागन ने बताया कि गोमुख सहित भागीरथी बेसिन के अधिकांश बड़े ग्लेशियर ग्लोबल वार्मिंग की चुनौती से जूझ रहे हैं। अमरनाथ गुफा में प्रतिवर्ष बनने वाले शिवलिंग के लिए यह खतरा और भी अधिक है।

ग्लेशियरों की संरचना लाखों वर्षों पुरानी है, जबकि ऐसे खंड शीतकाल में अल्पावधि के लिए खास प्राकृतिक प्रिाया से बनते हैं। स्पष्ट किया गया है कि अमरनाथ गुफा में जिस स्थान पर बर्फ का शिवलिंग तैयार होता है, उसके ऊपरी हिस्से में पहाड़ की अंदरूनी परत से पानी चू कर नीचे आ रहा है। सदियों से गोल स्थान पर तेज हवा के साथ आ रहा यही पानी निचले हिस्से में पहुंच कर अत्यंत कम तापमान के कारण गोलाकार शिवलिंग का आकार लेता है, जिसे यात्राकाल में यहां बड़ी तादाद में पहुंचने वाले श्रद्घालु पूजते हैं।

ऐसे हिमाच्छादित स्थलों पर सर्दियों में स्नोलाइन से नीचे और गर्मियों में इससे ऊपर बर्फ पड़ती है, लेकिन ग्लोबल वार्मिंग से यह चा गड़बड़ा रहा है। मानवीय हलचल भी बढ़ी है। नतीजतन, शिवलिंग पहले की तुलना में कम अवधि में ही पिघलने लगा है।

मुश्किलें और भी

गंगाधर (अमरनाथ): आस्था का सागर ही परेशानी पैदा कर रहा है। भक्तों की लगातार बढ़ती भीड़ ने भगवान को मुश्किल में डाल दिया है। भक्तों का सैलाब उमड़ रहा है। कई तीर्थस्थलों के आसपास सारी व्यवस्था कंप्यूटरीकृत हो गई है। भगवान के धाम ऑनलाइन हो गए हैं।

कंधे पर लैपटॉप और हाथ में मोबाइल लिए भक्त, भगवान के दर्शनों के लिए पहुंच रहे हैं। अमरनाथ गुफा में यही नजारा मुश्किलें खड़ी कर रहा है। भक्तों की सांसें ही बाबा बर्फानी को पिघला रही हैं।

गंगाः सदियों से भारतीय संस्कृति को जीवन देने वाली मोक्षदायिनी गंगा भी खतरे में है। गोमुख ग्लेशियर से प्रवाहित गंगा सर्वाधिक प्रदूषण और इंसानी उदासीनता के कारण खतरे में है। एक ओर उस पर चल रही जल विद्युत परियोजनाओं का विरोध हो रहा है, तो दूसरी ओर वैज्ञानिक उसके समाप्त होने की आशंका जता रहे हैं।

ग्लेशियरः गोमुख ग्लेशियर के बारे में वैज्ञानिकों का मत है कि आने वाले 50 साल में वह समाप्त भी हो सकता है। लगातार उसमें पानी कम हो रहा है। गंगा की उत्पत्ति इसी ग्लेशियर से मानी गई है। यदि यही ग्लेशियर नहीं रहेगा तो गंगाजल आचमन के लिए भी उपलब्ध नहीं होगा। इसे ग्लोबल वार्मिंग से जोड़कर देखा जा रहा है।

यह हैं परेशानियां

ग्रेवासिसः डेबरीज यानी चट्टानी पत्थरों के समूह और बर्फ के ढेर के अलावा मानवीय हलचल बढ़ने से ग्लेशियर की ऊपरी परत बुरी तरह प्रभावित हो रही है। इसी से इनमें दरारें यानी ग्रेवासिस की शक्ल में सामने आती हैं, जो लगातार बढ़ रही हैं।

स्नो डैम्सः यह वह खतरा है, जिससे गोमुख और गंगोत्री सिस्टम के ग्लेशियर सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। ग्लेशियरों की निचली परत में बर्फ पिघलने से बने जल-प्रवाह वाले दायरे में ये बनते हैं और अक्सर पानी का प्रवाह रोक देते हैं। डैम रूपी बर्फ पिघलने पर ये पानी तेजी से आगे जाता है, जो पहले ग्लेशियर क्षेत्र में तबाही मचाता है।

ग्लोफः ग्लेशियर लेक आउटब्रस्ट फ्लड के तहत ग्लेशियर क्षेत्र में पानी रुकने से बर्फ की बड़ी झील बन जाती है। नेपाल, चीन, भूटान के बाद अब भारत की हिमालयी पर्वत श्रृंखला भी इससे जूझ रही है और इसका असर ग्लेशियरों की संरचना को भी खासा नुकसान पहुंचा रहा है। हिमालय के 880 ग्लेशियर गंगा घाटी की नदियों में बहने वाले जल के स्रोत हैं।

वैज्ञानिक जे.टी. गर्गन का अध्ययन बताता है कि 52 ग्लेशियर यमुना के जीवन स्रोत हैं, जबकि भागीरथी के 238, अलकनंदा के 368 और काली गंगा के आधार 264 ग्लेशियर हैं। भागीरथी घाटी के 206 ग्लेशियरों का भविष्य बहुत सुखद नहीं है, क्योंकि ये पांच किलोमीटर से भी कम लंबाई के हैं।

– डॉ. दुर्गाप्रसाद

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