हीन-भावना

हम सब हीन भावना से ग्रस्त हैं। मैं भी सभी के साथ हूँ और इस कारण गहरी हीन भावना से ग्रस्त हूँ। कल ही एक तबादला रोगी मिले। उन्हें हीन भावना का दौरा पड़ा हुआ था। वे आई.सी.यू. में भर्ती होकर अपनी हीन भावना को दूर करना चाहते थे। इधर एक पुलिस के मारे से मुलाकात हुई। बेचारा भयंकर हीन भावऩा से ग्रस्त था। थानेदार ने उसे इतना मारा-पीटा था कि अब थाने की ओर मुँह करके भी नहीं छींकता।

आखिर हीन भावना हमारे ऊपर इतनी हावी क्यों है? सच में जब से अमेरिका ने परमाणु बम्ब का शगूफा छोड़ा है, पूरा देश हीन भावना से ग्रस्त है। प्रधामंत्री अपना राग अलाप रहे हैं और विपक्ष अपना। दोनों हीन भावना से ग्रस्त हैं। संसद से सड़क तक- हीन भावना का बोलबाला है।

हीन भावना एक मनोवैज्ञानिक तथ्य है। हीन होना हमारी मजबूरी है। हमें अमेरिका से कुछ चाहिये, तो दीन-हीन होकर ही मिल सकता है। अमेरिका लात मारे तो भी हम खुश होकर खाते हैं। आखिर इतने बड़े देश ने हमें इस लायक समझा कि लात मारी। पुलिस वाला डांटता है तो हम खुश होते हैं। नेता-अभिनेता हमें गरियाते हैं तो हम अपनी हीन भावना से उसका आनन्द लेते हैं।

सतही पत्रकारिता में भी हीन भावना का बड़ा महत्व है। आजकल की उत्तर आधुनिक पत्रकारिता का मंजर ही कुछ और है। जब तक हो सके, हीन भावना से भरे समाचार लगाते रहो या फिर कुछ भी- जिसे देख-पढ़ कर जनता मजा ले,चटखारे ले। दिल्ली के एक चैनल ने एक महिला अध्यापिका के सेक्स रैकेट का फर्जी भण्डाफोड़ किया। परिणामस्वरूप पत्रकार जेल की हवा खाकर हीन भावना से ग्रस्त हो रहे हैं।

इधर जो लोग विश्र्व हिन्दी सम्मेलन से लौट आये हैं, अब हिन्दी दिवस की हीन भावना से ग्रस्त हो रहे हैं। वे हिन्दी को हीन भावना से बचाना चाहते हैं, मगर हिन्दी है कि मानती नहीं। कुछ लोग सेक्स वर्कर को हीन भावना से बचाने के लिए स्वयं उसी में डूब रहे हैं।

साहित्य, संस्कृति और कला के क्षेत्र में तो हमेशा से ही हीन भावऩा हावी रहती आई है। किसी भी बड़े नेता, अफसर उद्योगपति को देख कर खींसे निपोर कर साहित्यकार, कलाकार, संस्कृतिकर्मी अपनी हीन भावना को प्रदर्शित करने लग जाते हैं। वे इसे अपनी विनम्रता कहते हैं, लेकिन मनोवैज्ञानिक इसे हीन भावना, अवसाद, उदासी, अभिजात्य का आतंक आदि कहते हैं। एक मनोविश्लेषक ने साफ कहा- “हीन नहीं होंगे तो आप कुछ भी पा नहीं सकेंगे।’कुछ पाने के लिए हीन भावना ़जरूरी है, हीन भाव ़जरूरी है। हीनता, दीनता, दयनीयता, निरीहता होने पर ही आप पर कृपा हो सकती है।

हीन भावना से बचना बड़ा मुश्किल है। अमेरिका से बचो तो लादेन सब के हीन होने का टेप जारी कर देता है। नेपाल से बचो तो पाकिस्तान के नवाज शरीफ की हीनता या बांग्लादेश में लोकतंत्र की हत्या को भुगतो।

भुगतो प्यारे देशवासियों, हीन भावना को भुगतो। यही तुम्हारी नियति है।

 

– यशवन्त कोठारी

 

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