जहरीली होती नदियां

जल संपदा की दृष्टि से भारत की गिनती दुनिया के ऐसे देशों में होती है, जहॉं बड़ी तादाद में आबादी होने के बावजूद उसी अनुपात में विपुल जल के भंडार अमूल्य धरोहर के रूप में उपलब्ध हैं। जल के जिन अजस्त्र स्त्रोतों को हमारे पूर्वजों व मनीषियों ने पवित्रता और शुद्घता के पर्याय मानते हुये पूजनीय बनाकर सुरक्षित कर दिया था, आज वहीं ये जल स्त्रोत हमारे अवैज्ञानिक दृष्टिकोण, आर्थिक दोहन की उद्दाम लालसा, औद्योगिक लापरवाही, प्रशासनिक भ्रष्टाचार और राजनैतिक अदूरदर्शिता के चलते अपना अस्तित्व खो रहे हैं। गंगा और यमुना जैसी सांस्कृतिक व ऐतिहासिक महत्व की नदियों की बात तो छोड़िये, प्रादेशिक स्तर की क्षेत्रीय नदियां भी गंदे नालों में तब्दील होने लगी हैं। औद्योगिक संयंत्रों से निकले जहरीले रसायनों ने मध्यप्रदेश के मालवा क्षेत्र की नदियों के जल को प्रदूषित कर अम्लीय बना दिया है। हाल ही में चंबल नदी में नागदा क्षेत्र में स्थानीय औद्योगिक ईकाइयों द्वारा छोड़े जा रहे जहरीले अपशिष्ट की वजह से प्रदूषित हो जाने की खबर आई है। इस कारण जल-जीवों पर संकट आ गया है। वहीं छत्तीसगढ़ की नदियों को खदानों से उगल रहे मलबे लील रहे हैं। उत्तर प्रदेश की गोमती का पानी जहरीला हो जाने के कारण उसकी कोख में पल रही मछलियों की संख्या निरंतर घटती जा रही है।

भारत में औषत वर्षा का अधिकतम अनुपात उत्तर-पूर्वी चेरापूँजी में 11,400 मिमी और उसके ठीक विपरीत रेगिस्तान के अंतिम छोर जैसलमेर में न्यूनतम 210 मिमी के आसपास है। यही वर्षा जल हमारे जल भण्डार नदियों, तालाब, बांध, कुओं और नलकूपों को बारह महीने लबालब भरा रखते हैं। प्रकृति द्वारा वर्षा की यह देन हमारे लिये एक तरह से वरदान है। लेकिन हम अपने तात्कालिक लाभ के चलते इस वरदान को अभिशाप में बदलने में लगे हुये हैं। औद्योगिक क्षेत्र की अर्थ दोहन की ऐसी ही लापरवाहियों के चलते मध्यप्रदेश के मालवा क्षेत्र में लगे स्टील संयंत्र रोजाना करीब 60 टन दूषित मलबा नदियों में बहाकर उन्हें जहरीला तो बना ही रहे हैं, मनुष्य-मवेशी व अन्य जलीय जीव-जन्तुओं के लिये भी जानलेवा साबित हो रहे हैं। दरअसल इन स्टील संयंत्रों में लोहे के तार व चद्दरों को जंग से छुटकारा दिलाने के लिये 32 प्रतिशत सान्द्रता वाले हाइडोक्लोरिक अम्ल का इस्तेमाल किया जाता है। तारों और चद्दरों को तेजाब से भरी बड़ी-बड़ी हौदियों में तब तक बार-बार डुबोया जाता है जब तक ये जंग से मुक्त नहीं हो जातीं। बाद में बेकार हो चुके तेजाब को चंबल, चामला नदी से जुड़े नालों में बहा दिया जाता है। इस कारण नदियों का पानी लाल होकर प्रदूषित हो जाता है जो जीव-जन्तुओं को हानि तो पहुँचाता ही है, यदि इस जल का उपयोग सिंचाई के लिये किया जाता है तो यह जल फसलों को भी पर्याप्त नुकसान पहुँचाता है। पूरे मध्यप्रदेश में इस तरह की पंद्रह औद्योगिक इकाईयां हैं। लेकिन अकेले मालवा क्षेत्र और इंदौर के आसपास ऐसी दस इकाईयां है जो जहरीले रसायनों को अगल-बगल की नदियों में बहा रही हैं।

नियमानुसार इन दूषित रसायनों को साफ करने के लिये रिकवरी यूनिट लगाये जाने का प्रावधान उद्योगों में है, पर प्रदेश की किसी भी इकाई में टीटमेंट प्लांट नहीं लगे हैं। दरअसल एक टीटमेंट प्लांट की कीमत करीब दस करोड़ रुपये है। कोई भी उद्योगपति इतनी बड़ी धनराशि व्यर्थ खर्च कर अपने संयंत्र को प्रदूषण मुक्त रखना नहीं चाहता। कभी-कभी जनता की मांग पर प्रशासनिक दबाव ब़ढ़ने के बाद औद्योगिक इकाईयां इतना ़जरूर करती हैं कि इस अम्लीय रसायन को टैंकरों में भरवाकर दूर फिंकवा देती हैं। इसे नदियों और आम आदमियों का दुर्भाग्य ही कहिये कि इसी मालवा अंचल में चंबल, क्षिप्रा और गंभीर नदियां हैं, टैंकर चालक इस मलबे को ग्रामीणों की विद्रोही नजरों से बचाकर इन्हीं नदियों में जहॉं-तहॉं बहा आते हैं। नतीजतन औद्योगिक अभिशाप अंततः नदियों और मानव जाति को ही झेलना पड़ता है। ग्रामीण यदि कभी इन टैंकरों से रसायन नदियों में बहाते हुये चालकों को पकड़ भी लेते हैं तो पुलिस और प्रशासन न तो कोई ठोस कार्यवाही करता है और न ही इस समस्या के स्थायी समाधान की दिशा में कोई पहल की जाती है। ऐसे में अंततः ग्रामीण अभिशाप भोगने के लिये मजबूर ही बने रहते हैं।

इसी तरह गुना जिले के विजयपुर में स्थित खाद कारखाने का मलबा उसके पीछे बहने वाले नाले में बहा देने से हर साल इस नाले का पानी पीकर दर्जनों मवेशी मर जाते हैं। मलबे के कारण नाले का पानी लाल होकर जहरीला हो जाता है। सिंचाई के लिये इस्तेमाल करने पर यह पानी फसलों की जहॉं पैदावार कम करता है, वहीं इन फसलों से निकले अनाज का सेवन करने पर शरीर में बीमारियां भी घर करने लगती हैं। ग्रामीण हर साल नाले में दूषित मलबा बहाने पर रोक लगाने के लिये प्रशासन से गुहार लगाते हैं लेकिन जिले के आला प्रशासनिक अधिकारियों के कानों पर जूं तक नहीं रेंगती।

शिवपुरी जिले की जीवन-रेखा सिंध नदी के किनारे बेशकीमती इमारती पत्थर की खदानें हैं। इन खदानों से एक ओर पत्थर का दोहन करने के लिये हजारों हैक्टेयर जंगल नष्ट किये जाते हैं, वहीं दूसरी ओर पत्थर के उत्खनन के बाद जो मलबा निकलता है उसे सिंध में निःसंकोच बहा दिया जाता है। इससे एक ओर सिंध जहां उथली हो रही है वहीं प्रदूषित भी हो रही है और इसकी जल ग्रहण क्षमता भी निरंतर प्रभावित हो रही है।

छत्तीसगढ़ में कच्चे लोहे की परियोजना बेलाडिला से लौह अयस्क के अवैज्ञानिक दोहन ने शंखिनी नदी को भी पूरी तरह प्रदूषित करके रख दिया है। बेलाडिला से जो लौह तत्व अवशेष के रूप में निकलते हैं, वे किरींदल नाले के जरिये शंखिनी नदी में मिलते हैं, इस कारण नदी और नाले का पानी अम्लीय होकर लाल हो जाता है जो न तो पीने लायक रह गया है और न ही सिंचाई के लायक।

इस जल प्रदूषण से छत्तीसगढ़ के 51 गांवों के करीब 50,000 आदिवासी प्रभावित हुये हैं। लेकिन वे आदिवासी हैं इसीलिये उनकी गुहार की कहीं कोई सुनवायी नहीं है। लखनऊ की जीवनरेखा गोमती नदी के पानी में गटर का मुंह खोल दिए जाने के कारण इतना जहरीला हो गया है कि गोमती की मछलियों की संख्या लगातार घटती जा रही है। उत्तर प्रदेश के ही बलिया से लेकर पश्र्चिम बंगाल तक जाने वाली गंगा किनारे की तराई पट्टी का पानी संखिया (आर्सेनिक) की मात्रा ज्यादा होने के कारण इतना जहरीला हो गया है कि इस क्षेत्र के बहुसंख्यक लोगों के लीवर खराब होने लगे हैं व त्वचा कैंसर के रोगियों की संख्या में भी इजाफा हुआ है। ये दोनों ही बीमारियां जानलेवा हैं। विश्र्व स्वास्थ्य संगठन के मानक के अनुसार भारत, बांग्लादेश, नेपाल और चीन में पीने के पानी में .05 मिली ग्राम प्रति लीटर से अधिक संखिया पाई जाती है जो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। दुर्भाग्य से गंगा में उद्योगों के गटर खुले होने के कारण तराई पट्टी में संखिया का मानक पॉंच-सात गुना अधिक है। संखिया अत्यधिक उभयधर्मी (लवण और क्षार युक्त) तत्व है। इसका उपयोग पेंट, कपड़े की छपाई, शीशा उद्योग और कीटनाशक चूहे मारने की दवा में किया जाता है। मानव शरीर में इसकी मात्रा सीमा से अधिक पहुँचने पर रक्तवाहिनियों, दिल और दिमाग को घातक रूप से ग्रस्त करती है। संखिया से त्वचा, फेंफड़े और मूत्राशय का भी कैंसर हो सकता है। यह स्थिति गंगा नदी में अम्लीयता बढ़ने के कारण निर्मित हुई है।

उद्योगों से निकला यह रसायन ग्रामीणों में बीमारियों का कारण भी बन रहा है। पेट में कुपच, त्वचा संबंधी रोग और अल्सर जैसी बीमारियां इन उद्योग क्षेत्रों में आम-फहम हो गयी हैं। इसके बावजूद इन अभिशप्त लोगों को जहरीले पानी से अभिशाप मुक्त करने के कोई उपाय न तो प्रशासन कर रहा है और न ही प्रदूषण फैलाकर प्राकृतिक धरोहर स्वरूप नदियों के अस्तित्व को खतरा बने औद्योगिक संयंत्रों पर नियंत्रण के लिये उद्योग विभाग सार्थक कदम उठा रहा है। जो प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड प्रदूषण मुक्ति के लिये वजूद में लाये गये हैं उनके द्वारा की जाने वाली कार्यवाही इन इकाईयों के लिये मुफीद ही साबित होती हैं जबकि प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को ईमानदारी से प्रदूषण मुक्ति के अभियान को अंजाम देने के लिये सार्थक पहल करनी चाहिये। सफेद हाथी बने ये कार्यालय कागजी कार्यवाही कर जेबें भरने में लगे हैं। कुल मिलाकर स्थिति भयावह है।

 

– प्रमोद भार्गव

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