अनिल कपूर मिस्टर हीरो

Anil Kapoor Bollywood Heroअनिल कपूर के बारे में आमिर खान का कहना है कि वी मुझे बड़ा आश्र्चर्य लगता है, वे इतनी ज्यादा फिल्मों में काम करते हैं, फिर भी हमेशा विशिष्ट नजर आते हैं। उनकी फिल्में खराब हो सकती हैं, पर उनका अभिनय नहीं।’ आमिर के इस वक्तव्य में एक रोचक सच छिपा हुआ है। आमिर ने जहॉं चुनींदा फिल्मों में काम करके अपने अभिनय की श्रेष्ठता सिद्ध की है, वहीं अनिल अपनी फिल्मों के बजाय अपने रोल में ज्यादा डूबे हुए नज़र आए। अपने 27 साल के फिल्म कॅरियर में 100 से ज्यादा फिल्मों में काम कर चुके अनिल कपूर के पास मुश्किल से दस श्रेष्ठ फिल्में होंगी, पर ऐसी ढेरों साधारण फिल्मों के उदाहरण दिये जा सकते हैं, जिसे उन्होंने सिर्फ अपने शानदार अभिनय से उत्कृष्ट बनाया। उनकी पहली हिट फिल्म “वो सात दिन’ (1983) से अब तक के समय काल को देखें, तो औसतन हर साल वे कम से कम तीन फिल्मों में ज़रूर दिखाई पड़ते हैं। इस साल इसकी शुरुआत “ब्लैक एण्ड व्हाइट’ से हो चुकी है। इसके बाद “टशन’, “मैं युवराज’ आदि मिलाकर इस साल वे कम से कम चार फिल्मों में दिखाई पड़ेंगे। अनिल बताते हैं, “बॉलीवुड से मेरा रिश्ता इतना पुराना है कि यदि करेक्टर दमदार होता है, तो इनकार करना मुश्किल होता है। अब घई साहब को ही ले लीजिए। मैं हमेशा ही उनकी अंतिम पसंद बना।

अनिल के मुताबिक घई साहब की “ब्लैक एण्ड व्हाइट’ भी पहले वे नहीं करना चाहते थे, पर घई साहब की जिद थी कि वे यह फिल्म उन्हीं के साथ बनाएंगे। अनिल कहते हैं, “पर उनके साथ काम करना मेरे लिए हमेशा एक शानदार अनुभव रहा है। इस फिल्म से हट कर देखें तो अब्बास मस्तान की नयी फिल्म “रेस’ में उनके जोरदार परफारमेंस की चर्चा हो चुकी है। इसी के साथ अप्रैल में प्रदर्शित हो चुकी यशराज फिल्म्स की विक्रम आचार्य निर्देशित “टशन’ में उन्होंने खलनायक का जामा पहना है। “बेवफा’ और “वेलकम’ के बाद “टशन’ में उऩके साथ काम कर रहे अक्षय कुमार तो उनकी कार्यशैली पर मुग्ध हैं, “बिल्कुल शुद्ध व्यावसायिक फिल्मों में उनके जीवंत अभिनय से हम जैसे अभिनेता बहुत कुछ सीखते हैं।

पचास के ऊपर के हो चुके अनिल कपूर रोमांटिक रोल में मिसफिट वाली बात को कबूल करते हैं, “मगर मैं इस तरह के रोल से परहेज वाली बात को नहीं मानता हूँ। रोमांस को किसी उम्र के साथ मत जोड़िए। बस, अब अपनी हिरोइन के साथ रोमांस करने का अंदाज मुझे बदलना होगा।’ शायद यही एक वजह है कि फिल्मों के चयन और रोल के बारे में उनकी संजीदगी कई निर्देशकों को चौंकाती है। अनिल का जिक्र चलने पर बज्मी बताते हैं, “अनिल को बस एक बार अपना रोल पसंद आना चाहिए। उसके बाद उस रोल और उस फिल्म को लेकर उसकी चिंता गौर-ए- काबिल होती है। “वेलकम’ में नाना के साथ उसने जो ट्यूनिंग बनायी, वह तो सिर्फ एक छोटा सा उदाहरण है।’

अनिल मानते हैं कि इधर, अपने रोल को लेकर वह कुछ ज्यादा संजीदा हुए हैं। वे बताते हैं, “अभी किसी ने मुझसे कहा, बढ़ती उम्र के चलते करेक्टर रोल को मैं ज्यादा अहमियत दे रहा हूँ। मैंने झट उसकी बात सुधार दी, मैं करेक्टर रोल नहीं बल्कि उम्दा रोल करना चाहता हूँ। आज भी मेरा सिर्फ एक नारा है, डिफरेंट रोल। मेरा जहॉं तक अपनी मनपसंद फिल्मों का सवाल है, बाहर के निर्माताओं पर दबाव डालकर मैं ऐसी फिल्मों का निर्माण नहीं करवा सकता। इसके लिए तो मुझे ही रिस्क उठाना पड़ेगा। “गांधी माय फादर’ ने मुझे कोई आर्थिक फायदा नहीं किया है, मगर एक बेहतर फिल्म बनाने की आत्मसंतुष्टि ज़रूर दी है। स्वतंत्र रूप से निर्मित मेरी दूसरी फिल्म “शार्टकट’ भी जल्द पूरी हो जाएगी। कोशिश यही होगी कि कुछ अलग तरह की फिल्में बनाने का यह सिलसिला आगे भी जारी रहे।

वे अभी तक अपनी फिल्मों में अभिनय करते नज़र नहीं आये। अब वे पहली बार किसी विज्ञापन फिल्म में अपनी बेटी सोनम के साथ दिखाई पड़े हैं। इसकी वजह पूछने पर वे हंस पड़ते हैं।’ यह सच है कि गत वर्षों में विज्ञापन फिल्मों के ऑफर मैंने वापस किये हैं, मगर अब बहुत सारी बातें बदल चुकी हैं। मैंने सिर्फ सोनम के साथ कुछ एड फिल्मों में काम करना मंजूर किया है। चलिए यह भी ठीक है, कम से कम इसी बहाने आपके इस हीरो का चेहरा कुछ बदला हुआ नजर आएगा।

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