शिक्षण एवं शिक्षार्थी के बदलते संबंध

आज का युग प्राचीन युग से प्रायः सभी मामलों में भिन्न है। प्राचीन मान्यताएं एवं धारणाएं बदल गयी हैं। जीवन के कुछ नैतिक मूल्य भी बदले हैं और इस बुद्घि-प्रधान भौतिक युग में समाज का एक नया स्वरूप उभर कर सामने आ रहा है। ऐसी स्थिति में प्राचीन परिपाटियों को पकड़े रहना तो किसी भी […]

क्लासिक नृत्यों में है

जब सभी क्षेत्रों में पुरानी मान्यताएं लगातार ध्वस्त हो रही हों, उस जमाने में भी एक क्षेत्र ऐसा है, जहां पुरानी मान्यताएं कतई पुरानी नहीं पड़ी हैं। यह क्षेत्र है, क्लासिक डांस या शास्त्रीय नृत्य का। शास्त्रीय नृत्य आज भी उतना ही शुद्घ और उतना ही प्राचीन है, जितना एक या दो सदी पहले हुआ […]

सख्ती से निपटें अगर सिरदर्द हो रूममेट

महानगरों में ही नहीं, बल्कि छोटे शहरों में स्थित शिक्षा संस्थानों में भी पढ़ाई के लिए हॉस्टलों में या किराये का मकान लेकर अपने जैसे दूसरे छात्रों के साथ रहना पड़ता है। यंग जेनरेशन के जीवन में यह दौर काफी कठिनाई भरा होता है। अपने घर से बाहर के माहौल में दूसरों के साथ रहना, […]

भारत में उच्च शिक्षा की समस्याएँ

इक्कीसवीं सदी के शुरुआती दौर में भारत की शिक्षित युवा पीढ़ी ने सूचना और संचार तकनीक के क्षेत्र में उसे अत्यंत सम्मानपूर्ण स्थान दिलाया है। विकसित नई कार्य संस्कृति के तहत भारत की वैज्ञानिक तथा तकनीकी क्षेत्र की क्षमताओं को अन्तर्राष्टीय स्तर पर भरपूर सराहना मिल रही है। सारा विश्र्व आज भारतीयों के “ज्ञान समाज’ […]

लक्ष्य से दूर होती शिक्षा

जब भारत पराधीनता की जंजीरों में जकड़ा था, तब ब्रिटिश राजनेता विंस्टन चर्चिल ने कहा था कि किसी भी देश की सभ्यता-संस्कृति को नष्ट करना हो तो उस देश की शिक्षा प्रणाली बदल दो। ब्रिटिश सरकार ने इसी नीति पर चलते हुए भारत में दोहरी शिक्षा प्रणाली की परंपरा शुरू की और लॉर्ड मैकाले को […]

उच्च शिक्षा की चुनौतियॉं

जिस देश में प्राथमिक शिक्षा ही सामान्य जन के लिए कठिन हो, वहॉं उच्च शिक्षा विशिष्ट मामला है। शिक्षा हमारे सर्वांगीण विकास का हेतु है। उच्च शिक्षा हमें परिपूर्णता की तरफ ले जाने में मदद करती है। हमारी रुचि के क्षेत्र को वह गहराई से समझाती है। इसीलिए उच्च शिक्षा के लिए शिक्षा-प्रविधि का नवाचारी […]

मानव-निर्माण में शिक्षा और शिक्षक की भूमिका

अनादिकाल से गुरु के महत्व को स्वीकार किया गया है। भारतीय साहित्य में निर्गुण सन्तों की परम्परा में गुरु को सर्वाधिक महत्व दिया गया है। निर्गुण भक्ति धारा के लोकप्रिय कवि कबीरदास की “साखी’ के प्रथम भाग का नामकरण गुरु की महिमा के आधार पर ही है- “गुरुदेव कौ अंग।’ कबीर ने कहा- इस संसार […]

शिक्षक समाज व राष्ट्र का ज्योति-पुंज

शिक्षक समाज व राष्ट का ज्योतिपुंज है, जो स्वयं जलकर सबको प्रकाशित करता है। बालकों को सुशिक्षित संस्कारित कर शिक्षक अच्छे समाज व महान राष्ट की आधारशिला रखता है। कोई भी समाज शिक्षा के बलबूते पर ही आगे बढ़ सकता है। समाज व राष्ट के विकास के लिए शिक्षा को अपनाना होगा। शिक्षा के बिना […]

निम्नतम वर्ग और उच्चतम शिक्षा

हर सुबह आकाशवाणी का तिरुअनन्तपुरम् केन्द्र अपने दैनिक कार्याम “सुभाषितम्’ से आरंभ करता है। इसके अंतर्गत कई बुजुर्ग विद्वान किसी घटना, सूक्ति या काव्यांश के सहारे कोई विचारोत्तेजक मुद्दा प्रस्तुत करते हैं। यद्यपि यह चंद मिनट का ही कार्याम होता है, किंतु बहुत ही ज्ञानवर्द्घक एवं प्रेरणाप्रद होता है। मैं प्रायः यह प्रसारण सुना करता […]

गुरु शिक्षक बनें कर्मचारी नहीं

भारत में जहां गुरु को ईश्र्वर से अधिक श्रद्घा, सम्मान और आदर किए जाने की गौरवशाली परंपरा रही है, वहां आज गुरु या शिक्षक की स्थिति क्या है? गुरु जिसे सम्राट ही नहीं ईश्र्वर का अवतार माने जाने वाले महापुरुष तक सम्मान देते थे, आज उसे सम्मानित करने के लिए “शिक्षक-दिवस’ मनाया जाता है और […]