भ्रष्टाचार का कैंसर और बेचारा समाज

आए दिन देश के विभिन्न क्षेत्रों में रिश्र्वत लेते हुए अधिकारियों के पकड़े जाने की खबरें खूब छपती हैं। सिर्फ नाम, रिश्र्वत की रकम और जगह का फर्क होता है। जो नहीं पकड़े जाते, उन पर इन खबरों का कोई असर नहीं होता। खबर पढ़ने के बाद वे जायज, नाजायज के चक्रव्यूह में नहीं फंसते। सही-गलत, जायज-नाजायज, आत्मा के उत्थान-पतन, शर्मिंदगी का भाव, इन सबसे वे लोग काफी ऊपर उठ चुके हैं। भ्रष्टाचार नीचे से ऊपर तक व्याप्त है।

Cancer of Corruptionकुछ दिन पहले पंजाब के अठारह आईएएस अधिकारियों की सूची अखबार में छपी, जिनके विरुद्ध गंभीर भ्रष्टाचार के केस चल रहे हैं। देश का प्रशासन चलाने वाले उच्चाधिकारी भी ऐसे गंभीर दोषों के लिए सफाई ढूंढने में प्रयत्नशील हैं। दस आईपीएस अधिकारी, जिनमें तीन पुलिस महानिदेशक हैं, आपराधिक मामलों की पूछताछ को लेकर संशय के घेरे में हैं। आईएएस, आईपीएस अधिकारियों की ऐसी सूची न्यायमूर्ति एचएस भल्ला की अदालत में प्रस्तुत की गई और यह सूची अंतिम नहीं है।

कार्य और नियमों के सीधे रास्ते के बावजूद पीछे के दरवाजे से कार्य करवाने और करने का एक दलाल साम्राज्य है। लोग भी सोचने लगे हैं कि दफ्तर की मेजों के गिर्द चक्कर काटते रहने से यह आसान और सुविधाजनक है, जिसमें आप रोज-रोज की जिल्लत और तनाव से बचे रहते हैं। घर बैठे काम हो जाता है। परंतु यह सुविधा उन तमाम लोगों के रास्ते बंद कर देती है जो ज्यादा धन नहीं खर्च कर सकते। उन पर देश के आम आदमी होने का ठप्पा लगा रहता है जिसके लिए कुछ भी आसान नहीं होता। अब तो पूरे भारत में कहा जाने लगा है कि भ्रष्टाचार इतना ज्यादा बढ़ गया है कि दस प्रतिशत विकास दर को पाना लगभग असंभव हो रहा है। सीएमएस और ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल के साझे अध्ययन में साल 2005 में ग्यारह विभागों के साथ संबंधों को लेकर लोगों के अनुभव एकत्रित किये गये। बासठ प्रतिशत लोगों ने कहा कि उन्हें रिश्र्वत देकर वह खास सर्विस या सुविधा लेनी पड़ी, जिसके वे वैसे भी अधिकारी थे। अध्ययन बताता है कि छोटी-छोटी रकम के तौर पर जो रिश्र्वत दी जाती है उसकी राशि हर साल 21068 करोड़ हो जाती है। तीन चौथाई लोग महसूस करते हैं कि भ्रष्टाचार दिन-ब-दिन बढ़ रहा है।

नयी आर्थिक नीति 1992-93 में अपनायी गई थी। 93-94 में बेरोजगारी में 1.85 करोड़ की बढ़ोत्तरी हुई थी। देसी-विदेशी धनाढ्यों की मनमानी लूट और मुनाफाखोरी की वजह से ग्रामीण क्षेत्र के 1990-91 के 35 प्रतिशत गरीब 1993-94 में 42 प्रतिशत और शहरी क्षेत्र में 90-91 के तीस प्रतिशत से 93-94 में बढ़ कर 37 प्रतिशत हो गये थे। यहीं से बेरोजगारी, महंगाई और भ्रष्टाचार को फैलने-बढ़ने के ऐसे अवसर मिले कि आज तक इन पर कहीं कोई लगाम नहीं लगायी जा सकी।

कभी गांधी जी ने राजनीति को अर्थ देने की कोशिश की थी। उनकी कामना थी कि राजनीति सबसे छोटे और पिछड़े हुए आदमी का हित देखेगी।

आज राजनीति का चेहरा इतना भयभीत करने वाला है कि संसद और विधानपालिका गुंडों, हत्यारों और भ्रष्ट लोगों की शरणस्थली बनती जा रही है। दफ्तरों में बड़े साहब जब आम आदमी की शक्ल देखना पसंद नहीं करते तो भ्रष्टाचार के धन पर ऐंठते हुए वह एक साधारण व्यक्ति की शिकायत पर ध्यान कैसे दे पायेंगे? जीवन मूल्यों की स्थापना के लिए उनकी राक्षसी शक्ति न कभी सोचती है न कुछ करने को तैयार है। आत्मान्वेषण से वह कभी गुजरना ही नहीं चाहते। जो काम करवाने के लिए सरकारी भवनों के पिछले दरवाजे से दाखिल नहीं हो सकते उनके लिए आजादी का मतलब क्या है? यह सफर तो इन उम्मीदों और उत्साह से शुरू हुआ था कि अब आम और खास के बीच में कोई फर्क नहीं रहेगा। सभी को बराबर के अधिकार मिलेंगे। परंतु भ्रष्ट तंत्र तो यह सब पूरा करने में असमर्थ है। राजनीतिज्ञों और लालफीताशाही से जुड़े लोगों ने अपने लिए तो आसान और सुविधाजनक रास्ते तलाश कर लिए हैं परंतु साधारण जन के लिए वे रास्ते बंद हैं। गरीब तो गरीब, कई बार बड़े लोगों को भी इन लौह द्वारों से टकरा कर लौट जाना पड़ता है। लक्ष्मी मित्तल ने कहा है कि यदि उन्हें भारत में स्टील प्लांट खरीदना होता तो उनकी आधी जिंदगी नेताओं और बाबुओं के पीछे-पीछे ही गुजर जाती। सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि विकास के मार्ग में भ्रष्टाचार कितनी बड़ी रुकावट है। कितने ही लोग व्यवस्था की भ्रष्ट सीढ़ियों से फिसल कर नीचे आ गिरे होंगे, अंदाज लगाना मुश्किल है।

भ्रष्टाचार के कैंसर ने जीवन का कोई हिस्सा नहीं छोड़ा है। हाल ही में हॉकी की दिशा बिगाड़ने वाला “आपरेशन’ सामने आ चुका है। डॉ. अमित किडनी के कारोबार में करोड़ों रुपये के वारे-न्यारे कर चुके हैं। राजनीति की चादर पर कत्ल, अपहरण, सेक्स स्केंडल, नशाखोरी आदि के न जाने कितने धब्बे लग चुके हैं। शिक्षा, व्यापार और न्याय तक का क्षेत्र भी अछूता नहीं रहा। एक मान्य न्यायाधीश पहले ही कह चुके हैं कि बीस प्रतिशत न्याय से जुड़े लोग भ्रष्ट हो चुके हैं। यह भी कहा जा रहा है कि न्याय का इतनी देर से मिलना न्याय से इन्कार ही कहा जा सकता है।

यह जबरदस्त अंधकार की स्थिति है। ऐसी स्थिति में मामूली आदमी का जीना दुश्र्वार हो जाता है। उपभोक्तावादी बहाव ने व्यक्तिवाद को विकसित किया है, समाज के सांगठनिक चरित्र पर इससे गहरी चोट लगी है। लोग अपनी तकलीफ दूसरों पर ज़ाहिर नहीं करते, सरकारी आतंक से घबरा कर जेब खाली कर घर लौट आते हैं। दूसरी तरफ इसी बहाव में ज़रूरतें दानवीय रूप धारण कर चुकी हैं। बंगला, गाड़ी, वातानुकूलित कमरे, पॉंच सितारा होटल संस्कृति, ब्रांडेड कपड़े, जूते, मोटरबाइक और भारीभरकम बैंक बैंलेंस की जरूरतें इन हज़ारों वस्तुगत परिस्थितियों से ध्यान हटा देती हैं। बाज़ार ने मध्य वर्ग की मजबूरी का मज़ाक ही नहीं उड़ाया उसे विवश और पंगु बना दिया है। मूल्यविहीनता इस कदर हावी है कि शादी-विवाह के पहले ही पूछ लिया जाता है कि लड़के की ऊपर की कमाई कितनी है? भ्रष्टाचार के इस कैंसर से लड़ने के लिए समाज को इस वक्त एकजुटता, व्यापकता के नजरिये से सोचना होगा और हके-इंसाफ के लिए लड़ना ही होगा।

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