क्या हम पेटू हैं?

Fat Tummyखाद्यान्न संकट को लेकर आजकल बड़ी हायतौबा मची है। सारी दुनिया में रोटी को लेकर त्राहि-त्राहि मची हुयी है। कुछ अफ्रीकी देशों में तो भुखमरी के कारण अफरा-तफरी का माहौल है। जब कोई समस्या उठती है तो उसके कारण और निवारण की रस्म भी होती है। ऐसा ही खाद्यान्न को लेकर भी हो रहा है।

अपने ही देश में आरोप और प्रत्यारोपों का दौर जारी है। सरकार का कहना है कि अन्न का वैश्र्विक संकट है। वहीं उसके कुछ मंत्री इस स्थिति के लिये विपक्ष को दोषी ठहरा रहे हैं जबकि विपक्ष इस मुद्दे को सड़क पर ले आया है और संसद के अन्दर से लेकर सड़क के चौराहे तक सरकार को पानी-पी-पीकर कोस रहा है। उधर राज्य सरकारें भी केन्द्र पर तलवारें ताने हैं। सरकार की स्थिति भीगी बिल्ली जैसी हो रही है। और ऐसे में चचा बुश ने यह कहकर सबको सकते में डाल दिया है कि वर्तमान संकट भारतीयों के पेटूपने के कारण आया है। उनके मुताबिक भारतीय ज़रूरत से ज्यादा खा रहे हैं। आमदनी बढ़ने के साथ-साथ उनके पेट का आकार भी बढ़ता जा रहा है। खाने को लेकर ऐसी चिल्ल-पों मची है कि रोज नये-नये तथ्य सामने आ रहे हैं। चचा बुश द्वारा भारतीयों को पेटू कहना अपमानजनक तो कम, हास्यास्पद ज्यादा लग रहा है क्योंकि चचा बुश जिस भारत पर निशाना साथ रहे हैं, वो नेता, अफसर या कुछ धनकुबेरों का भारत है। असली भारत जो कुल आबादी का लगभग सत्तर फीसदी है, उसे तो चचा ने दूर से भी नहीं देखा होगा।

यह आरोप भारतीयों पर तब लग रहा है जब भारत में प्रति व्यक्ति अनाज की खपत लगभग चार सौ ग्राम और अमेरिका में करीब चौबीस सौ ग्राम है यानी एक अमेरिकी एक भारतीय से छह गुना ज्यादा खा रहा है, तब भी वो पेटू नहीं है जबकि भारत में तो आधी से ज्यादा आबादी को भरपेट रोटी भी नसीब नहीं है, तब भी वो पेटू है। अमेरिका में लगभग एक तिहाई लोग मोटापे से ग्रस्त हैं जिसका सीधा कारण ज़रूरत से ज्यादा खाना है और इधर भारत में करीब सत्रह प्रतिशत लोग सामान्य से ज्यादा मोटे हैं। यह आंकड़ा देहात में तो और भी कम यानी बमुश्किल चार-पॉंच फीसदी होगा क्योंकि यहॉं मेहनत ज्यादा है और रोटी कम। इस कारण असली भारत में ज्यादातर आबादी का पेट पीठ से चिपका हुआ है। फिर भी चचा ने उन्हें पेटू कहा है तो ज़रूर कुछ सोच-समझ कर कहा होगा।

दुनिया में दो तरह के लोग हैं, नम्बर एक वे, जो जीने के लिये खाते हैं और दूसरे नम्बर पर वे लोग हैं जो खाने के लिये जीते हैं। हमारी संस्कृति इसीलिये महान है क्योंकि यह खाने को सिर्फ जीने का साधन मानती है जबकि पश्र्चिमी संस्कृति भोग प्रधान होने के कारण जीने को खाने का माध्यम मानती है यानी यह उन लोगों की दुनिया है जो अपना पेट भरने को प्राथमिकता देते हैं। दुनिया जाये भाड़ में हमें क्या पड़ी, मानसिकता के कारण यह प्रकृति के संसाधनों का ज्यादा से ज्यादा दोहन करने को प्राथमिकता देती है जबकि हमारे यहॉं साल भर व्रत-उपवास के दौर चलते हैं। मुसलमानों में तो पूरे एक महीना रमजान रहता है। इस तरह ज्यादातर भारतीय तो कम से कम में काम चलाने की प्रवृत्ति रखते हैं। और अब तो फिगर को मेन्टेन करने के लिये डायटिंग के तमाम स्रोत हैं, फिर भी हम पेटू कहे जा रहे हैं तो ज़रूर इसके पीछे कुछ राज होगा।

दरअसल चचा बुश को हमारे खाने पर उतना ऐतराज नहीं जितना खाने के तरीके को लेकर है। हमारे खाने का परंपरागत ढंग उनकी आँखों में खटक रहा है। उन्हें इस बात पर हैरानी है कि एक आम भारतीय इक्कीसवीं सदी में भी दाल-रोटी से ऊपर नहीं उठ पाया। रोटी भी हम घर की बनी पसन्द करते हैं जबकि यह तरक्की के मार्ग में एक बड़ी बाधा है। अगर हम पिज्जा, बर्गर जैसे फास्ट फूड अपना लें तो इससे हर भारतीय के पेट पर अमेरिकी कंपनियों का अधिपत्य हो जायेगा। फिर अमेरिकी अर्थव्यवस्था छलांग भरने लगेगी। फिर अमेरिकनों में खुद के श्रेष्ठ होने का भाव स्थायी हो जायेगा जिसके बिना उन्हें यह जीवन ही निस्सार प्रतीत होता है। और अगर चचा का बस चले तो वे दुनिया के हर पेट पर कब्जा जमा लें। फिर खाने-पीने का झंझट ही खत्म हो जायेगा। दुनिया में जितनी भी खाद्य सामग्री है सब अमेरिकी मल्टीनेशनल कंपनियों के कब्जे में होगी। तब हर खाद्य सामग्री के रिचार्ज कूपन मिला करेंगे। जैसे ही किसी हिन्दुस्तानी को भूख लगे वो फौरन डॉलर देकर दुकान से रिचार्ज कूपन खरीद लेगा और अपना पेट रिचार्ज कर लेगा।

मान लो, कोई आदमी घर से ऑफिस के लिये निकला और रास्ते में उसकी खाद्य वैलिडिटी खत्म हो गयी तो फौरन उसके कानों में कम्प्यूटर के जरिये किसी नवयौवना की मधुर आवाज सुनायी देगी, क्षमा करें, आप और आगे नहीं जा सकते। आपकी रिचार्ज वैल्यू खत्म हो गयी है। कृपया अपना अकाउंट रिचार्ज करा लें। ऐसी व्यवस्था में नयी-नयी कंपनियों की लांचिंग के लिये फील्ड तैयार होगा। एक कम्पनी भूख एडवाइजर की हो सकती है जो पेमेण्ट लेकर यह बताया करेगी कि हमें कब, क्या और कितना खाना चाहिये। एक कंपनी ऐसी हो सकती है जो खाने के खर्च को कम करने की सलाह देगी। तब चचा बुश हमें पेटू नहीं कहेंगे क्योंकि यदि तब वे ऐसा कहेंगे तो इसमें उनकी ही किरकिरी होने का डर होगा।

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