महंगाई और मोबाइल

Buying Mobile Phonesजब कमर टूट रही हो तो यह कहना कितना हास्यास्पद लगता है कि कमर कस लो। पर अपने नेताओं ने यही रटना लगा रखी है कि कमर कस लो, कमर कस लो। अपने यहॉं एक मुहावरा है- “कमरतोड़’ और यह मुहावरा आमतौर से महंगाई के साथ ही प्रयुक्त होता है। सचमुच महंगाई कमर तोड़ रही है और जिनकी कमर टूट रही है, वे बेचारे दर्द से कराह रहे हैं। अब उनके दर्द का इन्तज़ाम करने की बजाय यह कहना कि कमर कस लो, कितना अप्रासंगिक है। कमर तो उन लोगों को कसनी चाहिये जो वस्तुओं के दाम औने-पौने ढंग से बढ़ा रहे हैं। कमर कस कर दामों को नीचे उतारने की कोशिश की जानी चाहिए। महंगाई से लोगों की सांस उखड़ रही है, कर्जा बढ़ रहा है और कमर झुक रही है। झुकती कमर की वेदना को कोई भी अर्थशास्त्री नहीं समझ सकता, नेताओं के तो बस की बात कहॉं? हॉं, उनकी कमर पर राजनीति तो हो सकती है पर मरहम लगाने वाला कोई नहीं है। जब से हमारे देश में लोकतंत्र आया है तब से प्रत्येक आदमी और औरत सिर्फ वोट बन गये हैं। वोट हथियाने के लिये उन्हें मोड़ा, तोड़ा और जोड़ा जाता है। चूल्हे की आँच और पेट की भूख से किसी नेता का कोई वास्ता नहीं है। उनके झंडों के नीचे आम आदमी की भूख की आहों पर वोटों की रोटियां सेंकी जाती हैं। पता नहीं जनता भोली है या बावली। नेताओं की मीठी बातों में आने में एक पल नहीं लगाती। दरअसल, उनकी कमर झुकने का कारण भी यही है।

कुछ जान-पहचान के नेता टाइप लोगों से बात हो रही थी तो एक ने कहा, “कहॉं है महंगाई?’ मैंने कहा, “महंगाई देखने के लिये आँख या चश्मा नहीं बल्कि दिल-दिमाग चाहिए।’ वो बोले, “मैं सच कह रहा हूँ कि महंगाई है ही नहीं।’ मैंने उनसे अनुरोध किया कि वे अपनी बात की पुष्टि करके बताएँ। उनका जवाब था, “देखो मैडम! किसी को भी देख लो- रेहड़ीवाला, सीवरवाला, दूधवाला, अखबारवाला, प्लंबर, इलेक्ट्रीशियन, गैस-कुकर मरम्मत वाला, दर्जी, नाई, माली, रिक्शावाला, कबाड़ीवाला, धोबी, कामवाली बाई, घरेलू नौकर, भिखारी, मिस्त्री-मजदूर आदि सबके पास मोबाइल है। अगर महंगाई है तो ये लोग मोबाइल कैसे खरीद सकते हैं?’ मैंने सवाल दागा, “क्या मोबाइल समृद्धि का सूचक है और भरे पेट होने का प्रमाण है? मोबाइल तो आज के युग की अनिवार्यता है। जैसे हवा, पानी, रोटी और कपड़ा जीवन की ज़रूरत बन गए हैं, वैसे ही मोबाइल हो गया है और फिर मोबाइल ने इनके कार्य को सरल कर दिया है। इसका पेट की भूख से कोई नाता नहीं है। पेट की भूख तो गेहूं- चावल व दाल-सब्जी ही मिटा सकते हैं। और इनके दाम आकाश छू रहे हैं।’ पर अपने नेताओं की आँख आकाश तक जाती ही नहीं, उनकी आँख सिर्फ वोटों के मजा-घटा को जानती है।

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एक बार की बात है कि ताऊ सुरजा अपने छोरे गैल मुरथल के ढाबे में खाना खाने चला गया। किसी ढाबे पर जाने का ये ताऊ का पहला मौका था। उनके पास एक वेटर आया अर शुरू हो गया- “मटर-पनीर, आलू-पनीर, पालक-पनीर, शाही-पनीर, कढ़ाई-पनीर, पनीर-कोफ्ता, आलू-छोले, आलू-गोभी, राजमा-चावल, कढ़ी-चावल, बैंगन का भर्ता, दही, रायता…’ वेटर ने बिना सांस लिये 25-30 सब्जियों के नाम बोल दिये अर ताऊ उसे आँखें फाड़-फाड़ कर देखता रहा। जब वेटर चुप हुआ तो ताऊ अपने छोरे से बोला, “भाई! चल यहॉं से उठ ले, घर जाकर ही रोटी खाएंगे, ये झकोई सांस लेना भूल गया तो मरेगा अर म्हारै सिर हो रैगा पक्का।’

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