अब बहुत कुछ जानना चाहती हैं कंपनियां

आपकी शैक्षणिक योग्यताएं शानदार हैं। अपने विषय पर आपकी कमांड है। शिष्ट हैं और इंटरव्यू के दौरान आपने इंटरव्यूअर पैनल को हर सवाल का संतोषजनक जवाब भी दिया है। तो क्या अब आपकी नौकरी पक्की समझी जाए? आंकलन और अनुमान का गणित कहता है कि हां। लेकिन जरूरी नहीं है कि यह हकीकत भी हो। जी हां, ऊपर बतायी गयी तमाम कसौटियों पर खरा उतरने के बावजूद भी गारंटी नहीं है कि आपको कंपनी अपने यहां नौकरी पर रखेगी। आप पूछेंगे क्यों? आखिर जब सभी जरूरतों को हम पूरा करते हों तो फिर नौकरी की गारंटी क्यों नहीं है? इसकी कई वजहें हैं। हालांकि उनमें एक वजह यह कतई नहीं है कि इंटरव्यूअर पैनल को आपकी शक्ल पसंद नहीं आयी। दरअसल आजकल कार्पोरेट जगत काफी सजग और दूसरे छोर में काफी दकियानूस हो गया है। इसलिए कोई कंपनी अपने यहां किसी कर्मचारी को रखने के पहले उसकी उन तमाम योग्यताओं और कुशलताओं को तो परखती ही है, जिसकी सामान्यतः खुले रूप में जरूरत बतायी जाती है, लेकिन पूछताछ और जानकारी जुटाने का एक पर्दे के पीछे भी अभियान जारी रहता है। अगर उसमें आप खरे नहीं उतरे तो चाहे प्रत्यक्ष तौर पर आप भले ही तमाम जरूरतें पूरी करते हों, जरूरी नहीं है कि आपको कंपनी रख ही ले।

मोहित कसबेकर के साथ ऐसा ही हुआ। मूलरूप से नागपुर के रहने वाले इस नौजवान ने दिल्ली में पढ़ाई-लिखाई की है। हमेशा अच्छे नंबरों से पास होता रहा है और अपने क्षेत्र में बेहद कुशल है। बावजूद इसके उसे कई कंपनियों में अच्छे और संतोषजनक इंटरव्यू के बाद भी नौकरी पर नहीं रखा गया। बाद में मोहित ने इस बारे में जानने की कोशिश की कि आखिर उसे सब कुछ ठीकठाक हो जाने के बावजूद भी नौकरी पर रखा क्यों नहीं जाता? तो बड़ी मुश्किल से एक जगह से उसे पता चला कि उसकी कुंडली में कुछ गड़बड़ है यानी मोहित की शैक्षणिक डिग्रियां भले शानदार हों, लेकिन उसका ज्योतिषीय भविष्य कुछ धुंधला था। यही नहीं वह पढ़ाई-लिखाई के दौरान एक सिद्घांतवादी और किसी गलत बात पर तुरंत झगड़ पाने वाला छात्र भी रहा था। इसलिए कंपनियां मोहित की तारीफ तो करतीं मगर उसे अपने यहां रखने से कतरा जातीं।

वास्तव में पिछले कुछ दिनों से एक अजीब-सा दकियानूसी टेंड चल निकला है। तमाम बौद्घिक सेवाओं को संपन्न करने वाली कंपनियां अपने यहां लोगों को रखते समय आजकल उनकी जन्मपत्री या कुंडली पर भी नजर दौड़ाती हैं तथा उनकी योग्यताओं व काम के अनुभव के आधार पर तो उनका आकलन किया ही जाता है, उनकी कुंडली या जन्मपत्री के आधार पर भी यह जानने और अनुमान लगाने की कोशिश की जाती है कि क्या यह शख्स कंपनी के लिए उपयुक्त रहेगा? जरा भी अगर जन्मपत्री या कुंडली नकारात्मक हुई तो चाहे शैक्षिक डिग्रियां कितनी ही जोरदार क्यों न हों, कई कंपनियां ऐसे लोगों को अपने यहां रखने से हिचकिचाती हैं। यह एक खतरनाक टेंड है और अंधविश्र्वास का एक नया विस्तार भी इसमें देखा जा सकता है। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि कंपनियों के पास इसको जायज ठहराने के अपने तर्क हैं।

यह तमाम प्रिाया बहुत गुप्त तरीके से संपन्न होती है। इसलिए जिसे कंपनी मौका नहीं देती वह समझ ही नहीं पाता कि इसके पीछे वजह क्या थी? और चूंकि हर कंपनी को अपने यहां किसको रखना है, किसे नहीं रखना, यह निर्णय लेने का अधिकार है, इसलिए इस बात पर कोई कानूनी कार्रवाई भी संभव नहीं है। खासतौर पर इसलिए क्योंकि न रखे जाने वाले शख्स को इसका पता ही नहीं होता कि उसे किस वजह से नहीं रखा गया।

विजुअल मीडिया में कर्मकांड के भारी एक्सपो़जर के चलते तमाम कंपनियां भी इससे प्रभावित हो गयी लगती हैं। तभी तो आजकल बड़े शहरों के तमाम ज्योतिषियों के पास गुप्त रूप से कंपनियों के यहां से जन्मपत्रियां या वो दूसरे साधन जिनसे किसी के भविष्य का आकलन किया जा सके, फीडबैक आते हैं और कंपनियां यह जानना चाहती हैं कि सम्बंधित व्यक्ति क्या उनकी कंपनी के लिए उपयुक्त रहेगा? अगर इन ज्योतिषियों ने अपने अनुमान और आकलन में किसी व्यक्ति को उस कंपनी के लिए उपयुक्त नहीं पाया तो फिर काफी मुश्किल हो जाता है, उस कंपनी के लिए ऐसे व्यक्ति को रखना। हालांकि कई बार ऐसे व्यक्ति रख भी लिये जाते हैं, लेकिन फिर भी बराबर उन पर नजर रखी जाती है कि ज्योतिषीय अनुमान सही है या गलत।

यह तो नया चलन है, लेकिन कंपनियों द्वारा अपने यहां रखे जाने वाले व्यक्तियों का अतीत, उनका आचरण और उनकी पृष्ठभूमि के बारे में पहले भी गुपचुप तरीके से जानने की कोशिशें होती रही हैं। चूंकि पहले इतने संसाधन नहीं थे, किसी के बारे में जानकारी जुटाने के इतने तरीके नहीं थे, इस वजह से पहले कंपनियां ऐसा कम कर पाती थीं। लेकिन आजकल ऐसे साधनों की भरमार है। बड़े ही नहीं बल्कि मझोले शहरों में भी आजकल हर गली-कूचे में प्राइवेट डिटेक्टिव एजेंसियां खुल गयी हैं, जो कम से कम फीस पर किसी संभावित कर्मचारी का पूरा काला-चिट्ठा पेश कर देती हैं। यही नहीं मोबाइल, इंटरनेट और कंप्यूटर नेटवर्क ने भी किसी की व्यक्तिगत जानकारी जुटाना आज पहले से कई गुना ज्यादा आसान बना दिया है। आजकल नौकरी हासिल करने के लिए इच्छुक व्यक्ति अपने विस्तृत बायोडाटा कई ऐसी वेबसाइटों को पोस्ट कर देते हैं, जहां से एम्प्लायर उनके बारे में कई सारी जानकारियां हासिल कर लेता है और कई सारी दूसरी जानकारियों को हासिल करने का आधार हासिल कर लेता है।

यही वजह है कि अब ऐसे कर्मचारियों की एक नहीं चलती, जो अपने पुराने वेतन और सुविधाओं को बढ़ा-चढ़ाकर बताते हैं। एम्प्लायी अपनी घरेलू स्थितियां यानी आर्थिक और सामाजिक पृष्ठभूमि भी अब एम्प्लायर से छिपा नहीं पाते। क्योंकि उनके पास यह सब जानने का एक तीव्र और ताकतवर तंत्र मौजूद है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि कंपनियों को यह सब कुछ इतना मालूम हो जाता है कि जब नौकरी चाहने वाला व्यक्ति इंटरव्यू के लिए आता है तब तक इंटरव्यूअर को उसके इतिहास-भूगोल का विस्तृत ब्यौरा पता चल चुका होता है।

सवाल है, आखिर कंपनियां यह सब क्यों कर रही हैं और उन्हें इसका क्या फायदा है? दरअसल इस महंगाई के दौर में किसी कर्मचारी को अपने कंपनी के अनुकूल बनाने में यानी उसे कंपनी की कार्यसंस्कृति के अनुकूल ढालने पर काफी वक्त और पैसा खर्च होता है। लेकिन हायर एंड फायर के इस युग में कर्मचारी एक झटके में नौकरी छोड़कर दूसरी जगह चले जाते हैं। इससे कंपनियों को काफी बड़ा आर्थिक झटका लगता है। इस झटके से बचने के लिए कंपनियां हर तरह के उपाय आजमाने की कोशिश करती हैं। ज्योतिषीय तरीके से कुछ खास बातों का पता लगाया जा सकता है कि संभावित कर्मचारी उनके यहां टिकेगा या नहीं, कंपनी के लिए सही रहेगा या नहीं आदि। लेकिन जासूसी के जरिए यह जानने की कोशिश की जाती है कि संभावित कर्मचारी का अतीत क्या है, पुरानी कंपनी में उसकी छवि क्या थी, अकादमिक जीवन उसका कैसा रहा है और घर की सामाजिक और आर्थिक स्थिति कैसी है। इस सबके जरिए कंपनियों को संभावित कर्मचारी को लेकर कई तरह के अनुमान लगाने आसान हो जाते हैं कि वह टिकाऊ साबित होगा या नहीं। वह विश्र्वसनीय साबित होगा या नहीं। इसीलिए वह यह तमाम कवायद करते हैं। मगर सब कुछ के बावजूद उनके यह अनुमान सिर्फ अनुमान ही होते हैं। अंतिम तौर पर कुछ भी नहीं कहा जा सकता कि कोई व्यक्ति भविष्य में किसी कंपनी के लिए एसेट साबित होगा या लायबिलिटी? इसका सिर्फ अनुमान ही लगाया जाता है और आजकल अनुमान लगाने का यह काम कंपनियां काफी निर्मम तरीके से कर रही हैं।

– विवेक कुमार

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