टिप्पणी

कितने प्यारे जूते हैं देखो किसको पड़ते हैं शैम्पो कितने बदले हैं बाल अभी तक झड़ते हैं बेगम को समझाते हैं आप भी कितने भोले हैं मैच वो देखने जाए क्यों जिसके ग्यारह बच्चे हैं जब से बजट ये आया है बटवे सूखे-सूखे हैं मोहम्मद मुमताज़ राशिद की ऐसी ग़ज़लें पढ़ते-पढ़ते हम लोटपोट हो जाते […]

मेरे खेत की माटी

अद्भुत है मनभावन है, मेरे खेत की माटी। माँ सरीखी पावन है, मेरे खेत की माटी। हल से सीना चिरवाती है, बीज बोओ फसल उगाती है। सब की भूख मिटाती है, मेरे खेत की माटी। छूकर देखो पोली है, नन्हीं बच्ची-सी भोली है। भरे मेहनत की झोली है, मेरे खेत की माटी। बरखा की प्रथम […]

सुनो-गुनो

दोस्ती वह धागा नहीं जो खींचने से टूट जाए, वह इन्सान दोस्त नहीं जो जल्दी रूठ जाए। दिल में है अपने, विद्या की तिजोरी, लाख चाहकर भी कोई, नहीं कर सकता चोरी। जो समय खोया है, फिर तुम्हें नहीं मिल सकता, यदि टूट जाए पत्ता पेड़ से तो, फिर नहीं जुड़ सकता। गाली के ज़वाब […]

मीठे बोल

दादी-दादी एक बात बतलाना, बच्चा समझकर ना बहलाना। कोयल और कौवे दोनों हैं कारे, पर कौवे क्यों लगते नहीं प्यारे। दादी बोली ज़रा ध्यान से सुन, मीठी बोली में हैं बड़े-बड़े गुन। कोयल और कौवे दोनों हैं कारे, पर कोयल सदा बोले मीठा रे। मीठा बोलकर सबको रिझाती, इसीलिए कोयल सबको भाती। कौवे मीठा कभी […]

धरती का भगवान

नदिया न पीये कभी अपना जल, वृक्ष न खाये कभी अपने फल, अपने तन का, मन का, धन का, दूजे को दे जो दान है, वह सच्चा इन्सान अरे, इस धरती का भगवान है। अगरबत्ती-सा जिसका अंग जले, और दुनिया को मीठी सुहास दे। दीपक-सा उसका जीवन है, जो दूजों को अपना प्रकाश दे। धर्म […]

लोग कहते हैं वैश्वीलकरण, उदारीकरण व निजीकरण

आज देश में महंगाई, बेरोजगारी व गरीबी बढ़ी है। महंगाई के कारण 70 प्रतिशत लोगों की दैनिक आय घटी है तथा बेरोजगारी बढ़ी है। वैश्‍वीकरण, उदारीकरण तथा निजीकरण के चलते एक ओर बाजार में चाइना आइटम भरे पड़े हैं तो दूसरी ओर देश में अधिकतर वस्तुएँ निर्यात के लिये बनायी जाती हैं। अतः भारतीय उद्योग […]

ये पति

एक सुन्दर, गोरी, कमसिन चंचल पत्नी ने अपने श्यामवर्णी पति से पूछा सुनोजी, जब मैं ना रहूँगी क्या आप पुनः ब्याह रचाओगे मेरी जगह किसी अन्य को इस घर की लक्ष्मी बनाओगे?   बात सुनकर पत्नी जी की पति जी ने विस्मय से उनको देखा देख पूरे होते अधूरे स्वप्न हृदय की उठती तरंगों को […]

वास्तविकता

हमारे बदन में तब सिहरन नहीं होती जब हम आपस में मिल बैठ कर अपने पुऱखों की जमीन बॉंटते हैं तब भी हमें सिहरन का आभास नहीं होता जब अपनी सुविधाओं के लिए हरे भरे जंगलों को निर्दयता से काटते हैं मगर जब हम इन बांटने और काटने के दूरगामी दुष्परिणामों पर एकांत में बैठकर […]

वापस – अरुण कमल

घूमते रहोगे भीड़ भरे बा़जार में एक गली से दूसरी गली एक घर से दूसरे घर बेव़क्त दरवा़जा खटखटाते कुछ देर रुक फिर बाहर भागते घूमते रहोगे बस यूं ही लगेगा भूल चुके हो लगेगा अंधेरे में सब दब चुका है पर अचानक करवट बदलते कुछ चुभेगा और फिर वो हवा कॉंख में दबाए तुम्हें […]

तुम बहुत कुछ हो

तुम कुछ नहीं हो मेरी, और बहुत कुछ हो, और सच क्या होगा? जब तुम ही एक सच हो खुशियों की कली हो या, रात चांदनी तुम हो, हार नहीं तुम गले पड़े जो, एक पुष्प गुच्छ तुम हो तुममें देखा मंदिर मस्जिद, गिरजाघर, गुरुद्वारा भी संदेश तुम्हीं हो जीवन का, तुम हो मेरी जीवनधारा, […]

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