चिरंजीवी अभिनय!

सिर्फ हिंदी फिल्मों के ही नायक-सुपरस्टार, शहंशाह और किंग के तमगों से गुलजार नहीं हैं। साउथ की फिल्मों में भी सुपरस्टार होते हैं। चिरंजीवी भी ऐसे ही एक जाने-पहचाने तेलुगू सुपरस्टार हैं, जो अब अभिनय से इतर एक नए मुकाम का दम भर रहे हैं। यह है राजनीतिक मुकाम। आंध्रप्रदेश के राजनीतिक हलकों में इन दिनों चिरंजीवी ने “प्रजाराज्यम’ शब्द को खूब गुंजायमान कर रखा है। यह उनकी राजनीतिक पार्टी का नाम है।

इस पार्टी के निर्माता-निर्देशक, नायक-खलनायक, गीतकार और संगीतकार आदि सब कुछ वही हैं। प्रजाराज्यम की पटकथा फिल्मों की तरह काल्पनिक कथाओं-उपकथाओं वाली नहीं होगी। इसमें डामा तो होगा लेकिन फिल्मी नहीं खालिस राजनीतिक। लंबे समय से चिरंजीवी के बारे में अफवाहों का बाजार गर्म था। यह उम्मीद जतायी जा रही थी कि जल्द ही वह किसी राजनीतिक पार्टी के जरिए राजनीति में उतरने वाले हैं। लेकिन 10 अगस्त को हैदराबाद के जुबली हिल्स क्षेत्र में उनकी घोषणाओं ने सभी को अचंभित- सा कर दिया। उन्होंने खुद की पार्टी कार्यालय का उद्घाटन कर कुछ के लिए खुशी तो कुछ के लिए गम का माहौल तैयार कर दिया। 26 अगस्त को तिरूपति में सैर के दौरान एक विशाल जनसभा में उन्होंने अपनी पार्टी के नाम, उद्देश्य, विचारधारा और ध्वज को सार्वजनिक किया। इस ऐलान के बाद से उनसे जुड़ी राजनीतिक अटकलों को एक तरह से विराम भी लग गया। उन्होंने खांटी फिल्मी अंदाज में अपनी पार्टी का मतलब समझाते हुए कहा कि प्रजाराज्यम का मतलब है, जनता का राज। साथ ही साथ उन्होंने यहां तक कह डाला कि वह एक संतुष्ट आंध्र प्रदेश देखना चाहते हैं। यानी वह अपनी पार्टी के जरिए संदेश के तौर पर आंध्रप्रदेश की एक खुशहाल राज्य की परिकल्पना लिए हुए हैं। चिरंजीवी के इस पार्टी ऐलान ने बहुत से राजनीतिज्ञों के माथे पर शिकन भी पैदा कर दी।

साउथ फिल्मों के इस सुपरस्टार ने 25 अगस्त 1955 को आंध्रप्रदेश के वेस्ट गोदावरी जिले के नरसापुर में जन्म लिया। चिरंजीवी को बालपन में कोनीदला शिव शंकरा वारा प्रसाद के नाम से पुकारा जाता था। इस बेहद लंबे चौड़े नाम से चिरंजीवी बनने तक का सफर व गाथा भी बड़ी दिलचस्प है। चिरंजीवी हनुमान के भक्त हैं। बचपन में एक रात जब वह सोए थे तो सपने में देखा कि हनुमान जी उन्हें चिरंजीवी नाम से संबोधित कर रहे हैं। सपने की यह बात उन्होंने अपने माता-पिता को बताई। तभी से उनका नाम बदलकर चिरंजीवी रख दिया गया। चिरंजीवी का बचपन गांव में दादा-दादी के साथ गुजरा। चिरंजीवी तीन भाइयों व दो बहनों में सबसे बड़े हैं। इन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा भी गांव के ही स्कूलों में पूरी की। चिरंजीवी पढ़ाई के दौरान ही अभिनय में हिस्सा लेने लगे थे। गणतंत्र दिवस परेड में भी स्कूली दिनों में भाग लिया था।

नरसापुर से ग्रेजुएट की तालीम लेकर चिरंजीवी अभिनय सीखने के लिए 1977 में चेन्नै आ गए। अभिनय में डिप्लोमा पूरा करने के दौरान ही उन्हें फिल्मों में खलनायक व छोटे-मोटे चरित्र अभिनेता के रोल मिलने लगे थे, लेकिन बतौर सुपरस्टार अभिनेता के रूप में चिरंजीवी फिल्म “कैदी’ से उभरे जो कि हॉलीवुड फिल्म फर्स्ट ब्लड से इंस्पायर्ड थी। और “पसीवडी प्रणाम’ फिल्म में अपने ब्रेक डांस स्टाइल के दम पर तेलुगू फिल्मों में डांस स्टाइल की धारा ही बदल कर रख दी। उनकी यह फिल्म इतनी चली कि कई रेकार्ड तोड़ दिए। अपने फिल्मी अभिनय के ही दम पर चिरंजीवी सात फिल्मफेयर अवार्ड और तीन नंदी अवार्ड से पुरस्कृत हुए। उन्हें भारत सरकार की तरफ से भी कला संवर्द्घन के लिए पद्मभूषण से नवाजा जा चुका है। चिरंजीवी के इतने गौरवपूर्ण फिल्मी सफर के जरिए उनके अभिनय की काबिलियत को लेकर कोई संदेह या उंगली नहीं उठायी जा रही है। उनका स्टारडम तो तेलुगू सिनेमा में आज भी बरकरार है।

लेकिन क्या सियासत में भी वह स्टार साबित होंगे? यहां चिरंजीवी के लिए सबसे अहम चुनौती यह होगी कि क्या वह भी अपने पूर्ववर्ती अभिनेता टर्न राजनेता एनटी रामाराव की भांति सूबे की सत्ता पर काबिज हो पाएंगे? उनके पड़ोस के राज्य में भी फिल्मी शख्सियतों का बोलबाला है। करूणानिधि सिाप्ट राइटर हैं, तो डा. जयललिता अपने जमाने की जबरदस्त अभिनेत्री तथा पूर्व मुख्यमंत्री एम.पी. रामचन्द्रन की फिल्मी जीवन की प्रिया रही हैं। जयललिता ने अपनी एआईडीएमके पार्टी को राजनीतिक बिसात पर ऐसी पार्टी बना लिया है कि वह आज न केवल करूणानिधि की डीएमके पार्टी के लिए चिरप्रतिद्वंदी पार्टी बनी हुई है बल्कि केन्द्र की सत्ता की दिशा भी बदलने का माद्दा रखती है। ऐसे में यह सोचना लाजमी है कि क्या चिरंजीवी भी अपनी पार्टी को एआईडीएमके की तरह नई ऊंचाइयां दिला पाएंगे। उन्हीं की तरह एक सशक्त नेता की छवि लोगों में कायम कर सकेंगे। तेलुगू सिनेमा में नंदमूरि तारक रामाराव यानी एन.टी. रामाराव की राजनैतिक शख्सियत अद्भुत थी। उन्होंने न केवल फिल्मों में अभिनेता, निर्देशक और फिल्म मेकर की भूमिका को बखूबी निभाया बल्कि अपनी तेलुगू देशम पार्टी के द्वारा आंध्रप्रदेश की सत्ता पर एक बार नहीं तीन-तीन बार मुख्यमंत्री पद तक अपनी पहुंच बनायी। रामाराव ने भी अपने फिल्मी अभिनय के लिए चिरंजीवी की तरह भारत सरकार से पद्मश्री पुरस्कार पाया था।

क्या चिरंजीवी की भी पहुंच जनता के बीच रामाराव की तरह बन पाएगी? जिन्हें जनता आज भी देवतुल्य समझकर पूजती है। दोनों ही सिनेमाई जगत से रहे हैं। लेकिन एनटी रामाराव का अभिनय पौराणिक पात्रों के इर्द-गिर्द घूमता रहा है, जबकि चिरंजीवी असल जिंदगी के हीरो बनकर खलनायकों से जूझते रहे हैं। लेकिन रामाराव का यही पौराणिक मुखौटा उन्हें सूबे की सत्ता तक पहुंचाने में मददगार साबित हुआ। चिरंजीवी की ही तरह दक्षिण में रजनीकांत भी राजनीत के लिए अनजाने चेहरे नहीं हैं। रजनीकांत न सिर्फ मोटी-मोटी रकम लेकर फिल्में करने के लिए मशहूर हैं। उससे कहीं ज्यादा पॉपुलर वे अपनी राजनीतिक गतिविधियों को लेकर भी रहते हैं। वह तमाम राजनीतिक िायाकलापों में मशरूफ रहते हैं। उनके स्टारडम की लोकप्रियता भी इतनी अधिक है कि लोग सिर्फ उनके नाम से ोजी हो जाते हैं।

इसी तरह नरसिंहा मूर्ति, राजशेखरन, समभाह और सूर्य नारायण शर्मा तथा राजकुमार व शंकर प्रसाद जैसे कई फिल्मी जगत से जुड़े चेहरे दक्षिण की राजनीति में मोर्चाबंदी संभाले हुए हैं। भले ही इन राजनेताओं को इच्छित सफलताएं न मिल पाई हों लेकिन राजनीति की धारा को मोड़ देने की क्षमता ये फिल्मी कलाकार व नेता तो रखते ही हैं। इस तरह चिरंजीवी के लिए राजनीति की डगर उतनी आसान नहीं होगी क्योंकि पहले से जमे जमाए एक्टर टर्न पोलिटिशियनों को राजनीति की बिसात पर मात देना चिरंजीवी के लिए आसान न होगा। ऐसे में क्या चिरंजीवी के असल जिंदगी का नायकत्व भी जनता के बीच कोई गुल खिलाने में कामयाब हो सकेगा? चिरंजीवी की पार्टी के लिए यही वह इम्तिहान की घड़ी है जहां उन्हें खरा उतरना होगा।

 

– कैलाश सिंह

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