जम्मू-कश्मीर के संबंध में जरूरत एक कठोर निर्णय की

जम्मू-कश्मीर के ताजा हालात इसी बात के संकेत दे रहे हैं कि अमरनाथ श्राइन बोर्ड को जमीन आवंटन के मुद्दे पर राज्य और केन्द्र सरकार पूरी तरह उलझ गई है। उसकी स्थिति कोई दो टूक फैसला करने की नहीं रह गई है। इस मुद्दे पर जिस तरह जम्मू और कश्मीर का सांप्रदायिक विभाजन हुआ है और जिस तरह अपने अलग-अलग आंदोलनों के तहत दोनों पक्षों ने दबाव बनाया है, उससे कोई सर्वमान्य हल निकाल पाना असंभव हो गया है। लेकिन हल अगर नहीं निकाला गया, वह भी समय रहते, तो हालात इस कदर बेकाबू हो जाएंगे कि उसे संभाल पाना मुश्किल हो जाएगा। इसकी भयावहता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि आवंटित भूमि की श्राइन बोर्ड को पुनर्वापसी की मॉंग के साथ जो आंदोलन जम्मू और उसके आसपास के इलाके में फैला, वह दो महीना बीत जाने के बाद भी अपने उसी रफ्तार में रवां है, जिस रफ्तार के साथ वह शुरू हुआ था, बल्कि उसकी गति उत्तरोत्तर बढ़ती ही गई है। खुद जम्मू शहर लगभग एक महीने से ज्यादा दिनों से कर्फ्यू की आग में झुलस रहा है। कमोबेश यही हालत पूरे जम्मू संभाग की है। लेकिन सबसे खतरनाक बात यह देखने में आ रही है कि लोग इस कदर ज़ज्बाती हो गये हैं कि किसी तरह की बंदिश अथवा बल प्रयोग उन्हें नियंत्रण में नहीं ले पा रहा। जम्मू का यह आंदोलन हनुमान की पूंछ की तरह बढ़ता ही जा रहा है। मांग एक ही है कि जो जमीन राज्य सरकार ने श्राइन बोर्ड को आवंटित की थी और उसके बाद घाटी के अलगाववादी सांप्रदायिक आंदोलन से डर कर इसे रद्द कर दिया था, उसे पुनः उसी रूप में श्राइन बोर्ड को वापस किया जाय। आंदोलनकारियों की संघर्ष समिति इससे कम पर अपना आंदोलन वापस लेने का तैयार नहीं है।

जम्मू से बेहतर हालत कश्मीर घाटी की नहीं है। बल्कि एक मायने में उससे बदतर ही कही जा सकती है। क्योंकि इस मुद्दे का पूरा-पूरा राजनीतिक फायदा अलगाववादियों ने उठाया है। उन्होंने भारत समर्थक राजनीतिक दलों को हाशिये पर डालकर आंदोलन की कमान अपने हाथ में ले ली है। देर से जागी सरकार ने भले ही उनके “मुजफ्फराबाद चलो’ अभियान को विफल कर दिया हो, लेकिन उनके आठान पर हजारों-लाखों की संख्या में जुटने वाली भीड़ इस बात की गवाही देती है कि घाटी में राज सिर्फ और सिर्फ अलगाववादियों का है। इस हालात को अपने पक्ष में खड़ा करने का रणकौशल भी इन्होंने बखूबी प्रदर्शित किया है। देखा जाय तो जिस मसले पर इन्होंने घाटी के लोगों को उत्तेजित कर सरकार के भूमि आवंटन के फैसले के खिलाफ खड़ा किया, वह कोई मसला था ही नहीं। भूमि का आवंटन श्राइन बोर्ड के ह़क में सिर्फ दो महीने के लिए अस्थायी तौर पर अमरनाथ यात्रियों को रिहाइशी सुविधा देने के लिए हुआ था। उस जमीन पर न तो कोई स्थायी निर्माण हो सकता था और न ही उस जमीन की प्रकृति बदली जा सकती थी। लेकिन घाटी के लोगों को यह कह कर बरगलाया गया कि केन्द्र सरकार घाटी में हिन्दुओं को बसाकर घाटी का इस्लामिक स्वरूप बदलना चहती है। आंदोलन इस कदर अराजक और हिंसक हो गया कि सरकार को जमीन का आवंटन रद्द करना पड़ा। घबराहट में लिये गये इस निर्णय ने सबसे ज्यादा फायदा अलगाववादियों को पहुँचाया। क्योंकि इसके जरिये उन्हें भारत सरकार की ताकत को तौलने का मौका मिल गया। अगर इससे उनके भीतर यह धारणा मजबूत हुई हो कि अब वे थोड़ी और ताकत लगाकर कश्मीर की तथाकथित आजादी के सपने को पूरा कर सकते हैं, तो इसे ़खाम़खयाली कह कर खारिज नहीं किया जा सकता।

परिणामतः जम्मू भी जल रहा है और कश्मीर भी जल रहा है। लपटें फैलती ही जा रही हैं। सरकार के पास या किसी के पास कोई ऐसा फार्मूला नहीं है कि वह बीच का कोई रास्ता निकालकर समाधान तलाश कर सके। जम्मू के ह़क में अगर फैसला होता है तो घाटी में अलगाववाद के आंदोलन की उग्रता को रोका नहीं जा सकेगा। अगर फैसला घाटी के हक में होता है तो जो सांप्रदायिक विभाजन अभी जम्मू-कश्मीर राज्य में देखने को मिल रहा है उसका विस्तार राष्टीय स्तर पर हो सकता है। ़खतरा इस बात का बढ़ने लगा है कि अगर समय रहते किसी समाधान-बिन्दु तक नहीं पहुँचा गया तो जो जम्मू-कश्मीर में दिखाई दे रहा है, वह पूरे देश में हर कहीं दिखाई पड़ने लगेगा। समाधान बिन्दु तक पहुँचने का अब एक ही रास्ता बचा है कि राजनीतिक हानि-लाभ से बाहर आकर कठोर से कठोर निर्णय लिया जाय। ऐसा निर्णय जो न्याययुक्त तो हो ही, साथ में हमारी राष्टीय एकता को अखंड और अक्षुण्ण रखने वाला भी हो। प्रश्र्न्न यह है कि क्या सरकार ऐसे निर्णय से गुजरने का साहस और हिम्मत जुटा सकेगी?

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