ज्ञान यज्ञ में चाहिए समर्पण की आहुति

भारत सनातनी संस्कृति का अनुपालक और आस्थावादी राष्ट है। यहां भूमि, जल, नदियां, वृक्ष, आकाश तथा सूर्य और चंद्र पूजे जाते हैं। यहां आस्था की पराकाष्ठा मूर्तिपूजा में देखने को मिलती है। वैसे तो सनातनी संस्कृति में 36 करोड़ देवता हैं, जिन्हें नित्य पूजा जाता है, बावजूद इसके भी यहां दो प्रमुख अवतार हुए हैं, जिन्हें राम और कृष्ण के रूप में जाना जाता है। राम और कृष्ण के अवतारों का वर्णन क्रमशः रामचरित मानस तथा श्रीमद्भागवत में वर्णित है।

महाभारत के युद्घ में श्रेष्ठ धनुर्धर अर्जुन के सारथी के रूप में कृष्ण की भूमिका सदियों से भटके लोगों का पथ-प्रदर्शन करती है। अर्जुन के सारथी के रूप में कृष्ण का होना कोई साधारण घटना नहीं है। अर्जुन बुद्घि और कर्म का द्योतक है। वह श्रेष्ठ है, परंतु समर्पण के बिना जीत असंभव लगती है। यही कारण है कि अर्जुन मन, बुद्घि, कर्म तथा समस्त शक्तियों को कृष्ण में समर्पित करके आग्रही बन जाता है कि उसे आप ही दिशा दें। अर्जुन का यही समर्पण उसे धन्य बनाता है और जीत सुनिश्र्चित करता है। यही गीता का महात्म्य है। वास्तव में महाभारत में वर्णित गीता जीव को कर्मयोग तथा अकर्मयोग, फल रहित काम की साधना करना सिखाती है।

गीता के अध्ययन से ऐसा लगता है जैसे परमात्मा को जीवसत्ता के स्वभाव का पता था कि वह कर्म के फल की चेष्ठा जरूर करेगी। कर्म करना श्रेयस्कर है, परन्तु उससे पूर्व फल प्राप्ति की कामना ही दुःख को जन्म देती है।

– डॉ. आनन्द प्रकाश शुक्ल

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