धर्मांतरण : अर्थ और अनर्थ

असल में धर्म का संबंध अंतरात्मा से है और अंतरात्मा जो भी कहे, वही करना धर्म है। इसलिए यदि कोई व्यक्ति स्वेच्छापूर्वक धर्म-परिवर्तन करता है तो वह एक नैसर्गिक क्रिया है। इसके विपरीत प्रलोभन प्रताड़ना और प्रवंचना से प्रेरित धर्मांतरण मानवता के प्रति विश्र्वासघात है। अतः धर्म-परिवर्तन के केंद्र में हृदय-परिवर्तन और विचार-परिवर्तन का होना जरूरी है।

सुप्रसिद्घ दार्शनिक विलियम जेम्स ने हृदय-परिवर्तन के मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक तथ्यों को स्वीकार करते हुए उसे उदात्त धार्मिक अनुभूति माना है। महात्मा गांधी ने हृदय-परिवर्तन के आधार पर ही समाज-परिवर्तन की कल्पना की थी। संत विनोबा ने हृदय-परिवर्तन के ़जरिये भूदान आंदोलन चलाया और लोकनायक जयप्रकाश ने हृदय-परिवर्तन के जरिये चंबल के डाकुओं को समाज की मुख्यधारा से जोड़ा। इतना ही नहीं, हृदय-परिवर्तन से डाकू रत्नाकर महाकवि वाल्मीकि बने और अंगुलीमाल जैसे दुर्दांत हत्यारे ने भगवान बुद्घ की शरणागति पायी।

इसी तरह विचार परिवर्तन भी कोई कपोल कल्पना नहीं वरन् मनोविज्ञान का एक दुर्लभ सत्य है। हम देखते हैं कि घोर नास्तिक भी आस्तिक हो जाते हैं और कट्टर हिंसावादी भी अहिंसा की विचारधारा के प्रचारक बन जाते हैं। अतः स्पष्ट है कि हृदय-परिवर्तन और विचार-परिवर्तन कोई अलौकिक क्रिया नहीं वरन् एक स्वाभाविक मनोवैज्ञानिक क्रिया है।

अब प्रश्र्न्न उठता है कि आज धर्मांतरण एक विकट समस्या क्यों बन गया है? इसका कारण यह है कि आज, कुछ अपवादों को छोड़ कर, धर्मांतरण स्वेच्छापूर्वक और शुद्घ अन्तःकरण से नहीं होता है बल्कि यह राजनीतिक साम्राज्यवाद की तरह धार्मिक साम्राज्यवाद का एक उपकरण बन गया है। इसलिए जैसे राजनीतिक साम्राज्य विस्तार के लिए साम, दाम, दंड और भेद का सहारा लिया जाता है, वैसे ही धर्मांतरण के लिए भी हर तरह के हथकंडे अपनाये जाते हैं। यही कारण है कि धर्म के नाम पर मानवता के इतिहास में लगभग 65 सौ युद्घ हुए हैं और धर्म की रक्षा के लिए तरह-तरह के अमानवीय दंडों का विधान किया गया है।

दरअसल, जब कोई धर्मावलंबी यह समझ लेता है कि उसका धर्म संसार में सबसे उत्तम एवं श्रेष्ठ है और अन्य धर्म निकृष्ट हैं, तो इससे धार्मिक टकराव बढ़ता ही चला जाता है। यही कारण है कि धर्म – जिसका अर्थ है कि वह हमको एक सूत्र में बांधे- वही आज परस्पर कलह और अलगाव का सबसे बड़ा कारण बन गया है।

इस धार्मिक कलह के कारण धर्म आज कलंकित हो गया है और मार्क्स आदि विचारक, जो कि धर्म को अफीम का नशा मानते हैं, के अनुयायी धर्मविहीन अराजक समाज की बात करने लगे हैं। ऐसे में धर्म की बुराइयों को दूर कर उसके मूल रूप को लोगों के सामने लाने की ़जरूरत है।

हम जानते हैं कि मूल रूप से सभी धर्म प्रेम, भाईचारा, शांति एवं सहिष्णुता का संदेश देते हैं। वेद में कहा गया है कि “सत्य’ एक ही है, ज्ञानीजन उसे अलग-अलग तरह से व्यक्त करते हैं। इसलिए स्वामी विवेकानंद ने 1893 में शिकागो (अमेरिका) में आयोजित विश्र्व धर्म-संसद में यह घोषणा की थी कि अब सांप्रदायिक धर्मों के दिन लद चुके हैं और एक विश्र्व-धर्म की ़जरूरत है। उनके अनुसार विश्र्व धर्म कोई स्वतंत्र धर्म नहीं है बल्कि प्रत्येक धर्म की अच्छाइयों का समुच्चय है।

हम इस्लाम के भ्रातृत्व एवं समानता, ईसाईयत की सेवा एवं सहिष्णुता और हिन्दुत्व की आध्यात्मिकता एवं शुचिता आदि को मिलाकर विश्र्व-धर्म का रेखांकन कर सकते हैं। ऐसे में धार्मिक साम्राज्य विस्तार के लिए धर्मांतरण का सहारा लेना, धर्मों की मूल भावनाओं और विश्र्व-धर्म की कल्पनाओं के भी विपरीत जान पड़ता है।

भारतीय संविधान में सभी नागरिकों को धर्म-पालन एवं धर्म-प्रचार की स्वतंत्रता का अधिकार प्राप्त है। लेकिन मुम्बई उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय ने भी स्पष्ट कर दिया है कि धर्म-प्रचार का अर्थ धर्मांतरण नहीं है। इधर मध्यप्रदेश, गुजरात, उड़ीसा एवं तमिलनाडु में धोखा, प्रलोभन या दबाव में किये गये धर्मांतरण को दण्डनीय अपराध घोषित किया गया है। इन चारों राज्यों में यह प्रावधान है कि धर्म-परिवर्तन के पूर्व उसकी सूचना जिला समाहर्ता को दें, ताकि वे यह सुनिश्र्चित करें कि धर्मांतरण में भय, लोभ एवं धूर्तता का कोई स्थान नहीं है।

अतः आज, जबकि विश्र्व स्तर पर सभ्यताओं के संघर्ष और विचारधाराओं के अंत की घोषणा की जा रही है, दुनियाभर में ईसाईयत बनाम इस्लाम का संघर्ष खड़ा हो रहा है और अन्य धर्मों के बीच भी वैमनस्य बढ़ते चले जा रहे हैं। ऐसे में भारत में ईसाई मिशनरियों, इस्लाम तथा हिन्दुओं के कट्टरपंथी संगठनों की समाज विरोधी गतिविधियों को सख्ती से रोकने की जरूत है।

 

– डॉ. रामजी सिंह

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