न्यायमूर्ति हाज़िर हों…

न्याय और अन्याय के बीच अधिक अंतर नहीं होता। जिसे न्याय मिलता है, उसका प्रतिद्वंद्वी यही मानता है कि उसके साथ अन्याय हुआ है। न्यायाधीश का निर्णय कभी निष्पक्ष नहीं कहा जा सकता। जिसे न्याय मिला वह भी एक पक्ष है और जिसके खिलाफ न्याय हुआ वह भी एक पक्ष है। फिर यह निर्णय निष्पक्ष कैसे हुआ? जितना अंतर न्याय और अन्याय के बीच है, उतना ही अंतर कामयाब और नाकामयाब के बीच है। अन्याय को लेकर हमेशा बड़ों पर उंगली उठती है। पर हमारे देश में न्याय को लेकर भी उंगलियां उठने लगी हैं। अब पंच परमेश्र्वर वाली बात केवल कहानियों तक ही सिमट गयी है। हाल ही में देश के कुछ न्यायाधीशों की गलत हरकतों से साफ हो गया कि अब वे अन्याय को न्याय में बदलने के लिए अपने को भी बदलने के लिए तैयार हैं।

आज देश के समग्र न्यायतंत्र पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप की काली छाया मंडराने लगी है। सामान्य मनुष्य का अपराध एक बार माफ किया जा सकता है, किंतु सरकार ने जिन्हें न्यायाधीश की कुर्सी पर बिठाया है, वे यदि अपराध करते हैं तो उन्हें किस तरह माफ किया जाये? इन दिनों देश की अदालतों में न्यायमूर्तियों पर भ्रष्टाचार के एक नहीं, बल्कि तीन गंभीर मामलों की जमकर चर्चा है। इन तीन मामलों के कारण देश की न्यायतंत्र की प्रतिष्ठा दांव पर लग गयी है।

पहला मामला कोलकाता हाईकोर्ट के जज सौमित्र सेन द्वारा 32 लाख रुपये हड़प लेने का है। इस मामले में जज ने अपना इस्तीफा नहीं देने का निर्णय लिया है। किंतु उन्हें बर्खास्त करने के लिए सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस ने केंद्र सरकार को संसद में महाभियोग लाने का अनुरोध किया है। दूसरा मामला पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट की जज निर्मल यादव का है, जिन पर 15 लाख रुपये की रिश्र्वत लेने के आरोप के तहत पूछताछ करने की अनुमति सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस ने दे दी है। तीसरा मामला तो और भी गंभीर है, जो गाजियाबाद का है। यहां की अदालत में चतुर्थ वर्ग के कर्मचारियों के प्रॉविडेंट फंड के खातों में से 23 करोड़ रुपये फर्जी वाउचरों के माध्यम से निकाल लिये गये। इस धनराशि का उपयोग तत्कालीन 36 जुडिशियल अफसरों के लिये विविध ऐश्र्वर्य वाली वस्तुएं खरीदने में किया गया। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के 11 जजों को लिखित रूप से आरोपों का जवाब देने के लिए कहा गया है। यह काम उत्तर प्रदेश पुलिस को सौंपा गया है।

गाजियाबाद की कोर्ट की तिजोरी से जिस तरह से 23 करोड़ रुपये निकाले गये और उसका दुरुपयोग जजों के घरों के सामान खरीदने के लिये किया गया, उसने देवतास्वरूप न्यायमूर्तियों के आचरण को लेकर कुछ सोचने के लिये विवश कर दिया। गाजियाबाद की एडीशनल सेशन जज श्रीमती रमा जैन को ख्याल आया कि इस वर्ष फरवरी माह में अदालत की तिजोरी से फर्जी वाउचरों के माध्यम से 23 करोड़ रुपये निकाले गये हैं। उन्होंने तुरंत ही इसकी सूचना गाजियाबाद पुलिस को दी और एफआईआर दर्ज कराई। इसके बाद गाजियाबाद के एसएसपी ने इस मामले की जांच शुरू की।

पुलिस जांच में यह सामने आया कि इस मामले में मुख्य सूत्रधार राजीव अस्थाना है, जिसने विभिन्न डिस्टिक्ट जजों की सूचना से 2001 और 2007 के बीच अदालत की तिजोरी में से 23 करोड़ रुपये हड़प लिये थे। पुलिस के सामने अपने बयान में उसने इस बात को स्वीकार किया था कि इन रुपयों का उपयोग उसने अनेक जजों के लिये उनकी घर-गृहस्थी के सामान खरीदने में किया था, जिसमें सुप्रीम कोर्ट के एक जज और इलाहाबाद हाईकोर्ट के 11 जज भी शामिल थे। अस्थाना ने यह भी दावा किया था कि गाजियाबाद के पूर्व डिस्टिक्ट जज आरएस चौबे के कहने पर उसने सुप्रीम कोर्ट के एक वर्तमान न्यायमूर्ति के घर भी टॉवेल, बेड-शीट, ाॉकरी आदि चीजें पहुंचाई थीं। बाद में अस्थाना ने गाजियाबाद के एडीशनल चीफ जुडिशियल मजिस्टेट के सामने भी इस प्रकार का बयान दिया था। गाजियाबाद कोर्ट में काम करने वाले तृतीय और चतुर्थ वर्ग के कर्मचारियों के वेतन में से जो राशि प्रॉविडेंट फंड और ग्रेच्युटी के रूप में काट ली जाती है, उसे अदालत की तिजोरी में जमा कर लिया जाता है। अस्थाना के अनुसार उसने इन खातों से गलत वाउचर बनाकर 23 करोड़ रुपये हड़प लिये तो इन रुपयों में से कोलकाता हाईकोर्ट के एक वर्तमान जज के घर उसने टीवी, िाज और वॉशिंग मशीन जैसे उपकरण भी खरीद कर पहुँचाये थे। अस्थाना ने ऐसा दावा किया है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के कम से कम सात सीटिंग जजों को भी इन रुपयों में से लाभ मिला है। इनके लिये भी कंप्यूटर, मोबाइल, फोन, फर्नीचर आदि वस्तुएं खरीदी गयी थीं। गाजियाबाद के एसएसपी ने इन जजों से पूछताछ करने की अनुमति सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस से मांगी है। उन्हें इस संबंध में मात्र लिखित प्रश्र्न्न पूछने की ही छूट दी गयी है।

गाजियाबाद के एसएसपी दीपक रतन का कहना है कि इस संबंध में उन्होंने 36 न्यायमूर्तियों को पूछने के लिये प्रश्र्न्नों की सूची तैयार कर राज्य सरकार को भेजी है। इन सवालों की एक बार सुप्रीम कोर्ट भी जांच करेगा, उसके बाद ही सवालों को संबंधित न्यायाधीशों को भेजा जायेगा। इस मामले में अब तक राजीव अस्थाना समेत 83 लोगों के खिलाफ फौजदारी मामला फाइल किया गया। इनमें से 64 की धरपकड़ की गयी है। अस्थाना ने यह स्वीकार किया है कि इस मामले में 36 न्यायमूर्ति भी शामिल हैं। इस मामले को एक तरफ राज्य सरकार रफा-दफा करने की कोशिश कर रही है, दूसरी तरफ भारत के पूर्व कानून मंत्री शांतिभूषण ने सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर कर इस मामले की निष्पक्षता से जांच की मांग की है। इनका समर्थन गाजियाबाद बार एसोसिएशन और टांसपेरेंसी इंटरनेशनल नाम की संस्थाओं ने भी किया है। इसके पूर्व सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस केजी बालकृष्णन की इच्छा इन याचिकाओं की सुनवाई बंद कमरे में करने की थी, पर शांतिभूषण ने यह आरोप लगाया कि सरकार इस मामले को दबाना चाहती है, इसलिए ऐसा किया जा रहा है। इसके मद्देनजर अब इस मामले की सुनवाई खुले कोर्ट में की जा रही है। हमारे देश में हाईकोर्ट या फिर सुप्रीम कोर्ट का कोई भी सीटिंग जज भ्रष्टाचार करे तो उनके खिलाफ जांच करने का कोई कानून ही नहीं है। अभी इस मामले की जांच सुप्रीम कोर्ट जज द्वारा चयन की गयी तीन जजों की समिति कर रही है, पर इनकी कार्रवाई अत्यंत गुप्त रखी जा रही है। इस मामले में सरकार की नीयत भी ठीक दिखाई नहीं दे रही है, क्योंकि जजों के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच के लिये संसद में दिसंबर, 2006 में जजे़ज इंक्वायरी बिल पेश किया गया था, पर सरकार न्यायपालिका के साथ किसी प्रकार का पंगा नहीं लेना चाहती, इसलिए इस प्रस्ताव को ताक पर रख दिया गया।

बहरहाल, इस मामले का जो भी फैसला आये, पर सच तो यह है कि इस मामले ने जजों को भी संदेह के दायरे में खड़ा कर दिया है। देश के न्यायमूर्तियों को स्वच्छ होना ही नहीं बल्कि स्वच्छ दिखना भी चाहिए। आज न्याय को लेकर कानून अपने हाथ में लेने से भी लोग नहीं चूक रहे हैं। कानून हाथ में लेना आम बात हो गयी है। जो दमदार हैं, उन्हें मालूम है कि न्याय को किस तरह से अपने पक्ष में किया जा सकता है। इस मामले में यदि आरोपी न्यायाधीशों पर किसी प्रकार की ठोस कार्रवाई नहीं की गयी, तो निश्र्चित ही लोगों का न्याय पर से विश्र्वास उठ जायेगा और स्थिति बहुत ही भयावह होगी, यह तय है।

 

– डॉ. महेश परिमल

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