प्रयाग का अक्षयवट

प्रयाग (इलाहबाद, उ.प्र.) के अक्षयवट की महिमा बहुत प्राचीन होने के साथ-साथ सर्वविदित है। यह यमुना के किनारे किले की चहारदीवारी के अन्दर स्थित है। अग्निपुराण में कहा गया है कि वटवृक्ष के निकट मरने वाला सीधे विष्णुलोक को जाता है –

वट मूले संग भादौ मृतो विष्णुपुरी ब्रजेत्।

मत्स्यपुराण में कहा गया है कि उस वटवृक्ष की रक्षा भूलपाणि शंकर करते हैं –

तं वटं रक्षति सदा शूल पार्णिर्महेश्र्वरः।

कर्मपुराण एवं मत्स्यपुराण में वर्णित है कि अक्षयवट के पास मृत्यु होने पर व्यक्ति रुद्रलोक को जाता है –

वटमूलं समासाद्य यस्तु प्राणान्विमुत्र्चति।

सर्व लोकानतिाम्य रूद्रलोकं सा गच्छति।।

मत्स्यपुराण में उल्लेखित है कि संपूर्ण संसार के प्रलय हो जाने पर या भस्म हो जाने पर भी वटवृक्ष नष्ट नहीं होता –

निर्दहन्ति जगत्सर्व वटमूलं न दह्यति। इसीलिए कभी क्षय न होने के कारण उसे अक्षयवट की संज्ञा दी गई होगी।

वाल्मीकि रामायण में वर्णन है कि सीता ने वटवृक्ष से याचना की थी कि मेरे पति राम वनवास के व्रत का पालन करने में सफल हों –

न्यग्रोधं समुपागम्य वैदेही वाक्यमव्रवीत।

नमस्तेस्तु महावृक्ष पालयेन्मे व्रतं पतिः।।

कहा जाता है कि मार्कण्डेय ऋषि को प्रलयकाल में इसी वटवृक्ष के पत्ते पर भगवान के बाल मुकुन्द के रूप में दर्शन हुए थे, जिनकी स्तुति करने पर भगवान ने अपनी माया समेट ली थी।

मत्स्यपुराण में अक्षयवट की महिमा बताते हुए कहा गया है कि ईश्र्वर अक्षयवट में साक्षात् विराजमान रहते हैं –

माहेश्र्वरो वटो भूत्वा तिष्ठते परमेश्र्वरः।

पद्मपुराण में अक्षयवट को “श्यामवट’ भी कहा गया है। स्कन्दपुराण में अक्षयवट के बारे में कहा गया है –

सावित्री श्रूयते तत्र अक्षयवट सन्निधौ।

कूर्मपुराण में उल्लेखित है कि शूलपाणि महेश्र्वर उस वटवृक्ष की सदैव रक्षा करते हैं और वह वटवृक्ष सभी पापों को हरने वाला एवं शुभ है –

न्यग्रोधं रक्षते नित्यं शूलपाणिर्महेश्र्वरः।

स्थानं रक्षन्ति वै देवा सर्वपापहरं शुभम्।।

कूर्मपुराण में ही अक्षयवट की महिमा का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि यदि ब्रह्मचारी जितेन्द्रिय एवं पवित्र व्यक्ति रम्य श्यामवट की उपासना करें तो वह ब्रह्मलोक को प्राप्त करता है –

अथ संध्यावटे रम्ये ब्रह्मचारी जितेन्द्रियः।

नरः शुचिरूपासीत ब्रह्मलोक भवाप्नुयात्।।

कल्हण की राजतरंगिणी (तृतीय तरंग) में प्रयाग स्थित अक्षयवट के बारे में कहा गया है –

अशून्यजन्मा भूयासं तथा देव्येतिचिन्तयन्।

प्रयाग वट शाखाग्राद हसीत्स वपुस्ततः।।

इस प्रकार दिव्य जन्म की प्राप्ति के लिए प्रयाग के अक्षयवट की शाखाग्र से शरीर त्याग का तथ्य पुष्ट होता है।

उत्तर रामचरित के प्रथम अंक में लक्ष्मण ने इस रूप में वटवृक्ष का वर्णन किया है –

एष भरद्वाजावेदितश्र्चित्रकूटयायिनि वर्तानि

वनस्पतिः कालिन्दी तटे वटः श्यामो नाम।

चित्रकूट को जाने वाले मार्ग में यमुना के किनारे विद्यमान ऋषि भरद्वाज द्वारा बताया गया कि यह श्याम नामक वटवृक्ष है।

जैन परम्परा के अनुसार अक्षयवट के नीचे आदि तीर्थंकर ऋषभदेव जी ने तप किया था। प्रयागशताध्यायी के अनुसार अक्षयवट के दाहिने भाग में आदि वेणीमाधव का पीठ होना चाहिए।

गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस में अक्षयवट का स्पर्श प्रसन्नता व सुखदायक तो बताया ही है, साथ ही उसे प्रयाग का छत्र भी कहा है –

पूजहि माधव पद जल जाता।

परसि अख्यवट हरषहि गाता।।

संगमु सिंहासनु सुठि सोहा।

छत्रु अखयबटु मुनि मनु मोहा।।

कालिदास कृत “रघुवंश’ के तेरहवें सर्ग में भगवान् राम जनक नन्दिनी सीता से कह रहे हैं कि हे सीते! अब हम प्रयाग आ गये हैं, देखो, यह वही (श्याम) काला-काला बरगद का पेड़ है, जिसकी तुमने मनौती मानी थी, इसमें जो लाल-लाल फल लगे हैं, उनसे यह पेड़ ऐसा लग रहा है, जैसे मरकत मणियों की ढेरी में बहुत से पद्मराग मणि भरे पड़े हों।

त्वया पुरस्ताःदुपयाचितो यः सोऽयं वटः श्याम इति प्रतीतः।

राशिर्मणीनामिव कारूणानां सपद्भरागः फलितो विभाति।।

चीनी यात्री फाठयान 400 ईस्वी में प्रयाग आया था। उसके पश्र्चात् दूसरा चीनी यात्री ठेनसांग 644 ईस्वी में हर्षवर्धन के साथ प्रयाग आया। उसने स्वर्ग में सुख की प्राप्ति के लिए वटवृक्ष से स्वतः शरीर विसर्जन का उल्लेख किया है।

प्रयाग स्थित अक्षयवट से किले की चहारदीवारी पन्द्रह फीट दूरी पर है। इसकी शाखाएँ चहारदीवारी से भूमि पर बाहर भी यमुना नदी में लटकती हैं। सन् 1992 में अक्षयवट के चारों ओर संगमरमर लगा दिया गया है। सन् 1999 में अक्षयवट के पास ही एक छोटा मंदिर बनाया गया है, जिसमें राम, लक्ष्मण व सीता की प्रतिमाएँ स्थापित की गयी हैं। अक्षयवट के मूल भाग पर चारों तरफ वस्त्र लपेटने पर लगभग बाईस मीटर कपड़ा लगता है। इस अक्षयवट के पत्तों का अग्रभाग अन्य बरगद के पत्तों की तुलना में नुकीला न होकर गोलाई लिए होता है। पत्ते औसत रूप में छोटे होते हैं। औरंगजेब ने इस वटवृक्ष को जलाकर नष्ट करने का प्रयास किया था, किन्तु वह सफल नहीं हुआ।

प्रयाग जाने वाला हर व्यक्ति अक्षयवट का दर्शन-पूजन करके मनौती अवश्य मांगता है तथा उसकी शीतल घनेरी छाया में स्वर्गिक आनंद की अनुभूति करता है।

– निर्विकल्प विश्र्वहृदय

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