लोकतंत्र के लिए संकट या संजीवनी

इसी साल 10 अप्रैल को जब माओवादियों ने नेपाल में संविधान सभा के चुनाव में प्रचंड बहुमत हासिल किया था, तब किसी को यह सपने में भी अंदेशा नहीं रहा होगा कि महज कुछ महीनों बाद उन्हें उनकी प्रतिद्वंद्वी राजनीतिक पार्टियां करारी शिकस्त देंगी। संविधान सभा के चुनावों के बाद माओवादियों ने साफ-साफ कहा कि सरकार चलाने में कोई गफलत न हो इसलिए प्रधानमंत्री और राष्टपति उन्हीं का होना चाहिए। लेकिन इस पर सहमति नहीं बनी और चुनाव होना तय हुआ।

जब नेपाल के तीन प्रमुख बड़े राजनीतिक दलों के बीच राष्टपति, उपराष्टपति के उम्मीदवारों पर आम सहमति नहीं बन सकी और 19 जुलाई को मतदान होना तय हुआ, तब माओवादियों को यही लगता था कि चुनाव में वही जीतेंगे। इसलिए उन्होंने इस पर किसी तरह का रोड़ा नहीं अटकाया। हालांकि माओवादियों के पास जीत के लिए मैजिक फिगर नहीं था। अप्रैल में नेपाल संविधान सभा के लिए हुए चुनावों में उन्हें सबसे ज्यादा सीटें तो मिली थीं लेकिन ये सिर्फ 220 थीं और राष्टपति पद का चुनाव जीतने के लिए 298 वोटों की दरकार थी। मगर माओवादियों के पास अगर मैजिक फिगर नहीं था तो नेपाली कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (यूएमएल) के पास भी बहुमत नहीं था। क्योंकि संविधान सभा के चुनावों में नेपाली कांग्रेस को महज 110 और सीपीएन (यूएमएल) को सिर्फ 103 सीटें मिली थीं। कुल मिलाकर नेपाली कांग्रेस और सीपीएन (यूएमएल) की सीटें एक साथ जुड़कर भी माओवादियों से कम थीं इसीलिए उन्हें भरोसा था कि वह किसी भी कीमत पर चुनाव जीत जाएंगे।

लेकिन लोकतंत्र का यही रोमांच है। माओवादियों से मतभेद होने के कारण सीपीएन (यूएमएल) ने नेपाली कांग्रेस से हाथ मिला लिया, साथ ही इनके साथ मधेसी जनाधिकार फोरम भी आ गया। इन तीनों के बीच एक सहमति बनी कि नेपाली कांग्रेस के उम्मीदवार की राष्टपति पद के लिए, फोरम के उम्मीदवार की उपराष्टपति पद के लिए और सीपीएन (यूएमएल) के उम्मीदवार की संविधान सभा के अध्यक्ष पद के लिए, ये तीनों दल आपस में समर्थन करेंगे। माओवादी राजशाही से तो चातुरी से लड़कर जीत गये लेकिन लोकतंत्र में इस आपसी सहमति से पासा पलटने वाली राजनीति को नहीं समझ पाये। नतीजा उनके राष्टपति उम्मीदवार रामराजा प्रसाद सिंह की 26 वोटों से पराजय हो गयी। नेपाली कांग्रेस के उम्मीदवार डॉ. रामबरन यादव 20 मतों से जीत गये।

हालांकि पहले चरण में न तो नेपाली कांग्रेस, यूएमएल और मधेसी मोर्चा के साझा उम्मीदवार डॉ. रामबरन यादव और न ही माओवादियों के उम्मीदवार रामराजा प्रसाद सिंह को, किसी को भी स्पष्ट बहुमत नहीं मिला। पहले चरण के मतदान में नेपाली कांग्रेस साझा उम्मीदवार को 283 और माओवादियों के उम्मीदवार रामराजा प्रसाद सिंह को 270 मत मिले। जबकि स्पष्ट बहुमत के लिए 298 मतों की आवश्यकता थी। हालांकि इसी दौरान उपराष्टपति पद के मधेसी जनाधिकार फोरम के नेता परमानंद झा को चुन लिया गया। लेकिन राष्टपति चुनाव में किसी भी उम्मीदवार को जरूरी मत न मिलने के कारण 20 जुलाई को एक बार फिर मतदान हुआ और इस बार के मतदान में नेपाली कांग्रेस के वरिष्ठ नेता 61 वर्षीय डॉ. रामबरन यादव नेपाल के पहले राष्टपति चुन लिये गये। उन्हें 594 सदस्यीय संविधान सभा में 308 मत प्राप्त हुए जबकि रामराजा प्रसाद सिंह को उनसे 20 वोट कम हासिल हुए। 20 जुलाई को सुबह 8 बजे जब मतदान शुरू हुआ तो इस दूसरे चरण के मतदान में सिर्फ 590 सदस्यों ने ही हिस्सा लिया, 4 अनुपस्थित रहे।

नेपाल में महज 3 महीनों के अंदर राजनीतिक परिदृश्य में हुआ यह वैचारिक मत-विभाजन काफी निर्णायक साबित हो सकता है। इससे या तो वास्तव में नेपाल में एक मजबूत लोकतांत्रिक संस्कृति की शुरुआत होगी या फिर कुछ दिनों में ही माओवादियों और दूसरी राजनीतिक पार्टियों के बीच मतभेद तीखे हो जाएंगे तथा लोकतंत्र का भविष्य अधर में पड़ जायेगा। इसके आसार दिख भी रहे हैं और नहीं भी दिख रहे। दिख इसलिए रहे हैं क्योंकि पूरे एक दशक के सशस्त्र संघर्ष में माओवादी हमेशा ही राजतंत्र के बाद नेपाल की बागडोर को अपने हाथों में लेने की बात करते रहे हैं क्योंकि नेपाल में वास्तविक समाजवादी, लोकतांत्रिक प्रिाया शुरू की जा सके, इसके लिए वह हर स्तर पर काफी दृढ़ता से डटे रहे हैं। यहां तक कि नेपाल नरेश के राजमहल छोड़ने के सवाल पर भी उन्होंने बहुत तीखा स्टैंड ले रखा था। अगर नेपाल नरेश जरा भी आनाकानी करते तो शायद खून-खराबा भी हो सकता था।

यही नहीं, 10 अप्रैल को संविधान सभा के लिए हुए चुनाव में जब माओवादियों को जबरदस्त समर्थन मिला तो माओवादी नेताओं ने बिल्कुल साफ-साफ कह दिया था कि वह नहीं चाहते कि सरकार और राष्टपति के बीच किसी तरह का मतभेद हो इसलिए प्रधानमंत्री और राष्टपति दोनों ही उन्हीं के होने चाहिए। शायद इसके पीछे महज सैद्घांतिक और भविष्य में होने वाली तकरार ही वजह नहीं थी बल्कि माओवादियों की योजना में उन हजारों माओवादी सशस्त्र कार्यकर्ताओं को सेना में फिट करने की योजना में आने वाली दिक्कतों का भी पूर्वाभास था। इस वजह से माओवादी दोनों ही पद चाहते थे। लेकिन अब जबकि वह लड़कर हार चुके हैं और सार्वजनिक रूप से अपनी हार को स्वीकार करते हुए यह भी कहा है कि वह सत्ता नहीं संभालेंगे क्योंकि राष्टपति के चुनाव में उनकी नैतिक हार हुई है।

क्या ऐसे में यह माना जा सकता है कि माओवादी बेहद लोकतांत्रिक हो चुके हैं और उन्होंने लोकतंत्र की मजबूती के लिए बड़ी सहजता से अपनी हार स्वीकार की है। ऐसा लगता नहीं है और अगर ऐसा वास्तव में नहीं हुआ तो आने वाले दिनों में एक बार फिर से नेपाल राजनीतिक आस्थरता का शिकार हो सकता है। क्योंकि नई संविधान सभा के गठन में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। 240 साल पुरानी राजशाही को खत्म करने में माओवादियों की निर्णायक भूमिका रही है। लगभग डांट-दुत्कार कर माओवादियों ने नेपाल के पूर्व नरेश ज्ञानेन्द्र को राजमहल छोड़ने के लिए बाध्य किया। इस सब के बाद क्या उनसे इतनी आसानी से अपने उन मंसूबों को हनन होते देखा जायेगा जो अब पूरे नहीं हो सकते? शायद तात्कालिक तौर पर भले माओवादियों ने सहनशीलता दिखायी हो लेकिन आने वाले दिनों में उनका रवैया उग्र हो सकता है।

मगर दूसरी तरफ यदि बड़े और उदार दिल से माओवादियों ने अपनी इस हार को स्वीकार किया, जैसा कि अखबारों में माओवादी नेता प्रचंड को नवनिर्वाचित राष्टपति डॉ. रामबरन यादव को गले लगाते हुए दिखाया गया है, तो यह नेपाल की राजनीति में वह ऐतिहासिक बदलाव होगा जो हमेशा-हमेशा के लिए नेपाल में लोकतंत्र की जड़ों को मजबूत करेगा। जहां तक डॉ. रामबरन यादव के जीतने और उनके राष्टपति बनने के बाद भारत और नेपाल के सम्बंधों का सवाल है तो निश्र्चित रूप से वे तमाम आशंकाएं अब धुंधली पड़ेंगी जो माओवादियों के उभार की वजह से भारत-नेपाल रिश्तों के बीच उभर आयी थीं। इसकी दो वजहें हैं- एक तो डॉ. रामबरन यादव नेपाली कांग्रेस से हैं जिसका भारत के साथ गहरा और पुराना रिश्ता है वहीं दूसरी तरफ डॉ. रामबरन यादव खुद लम्बे समय तक भारत में रहे हैं। उनकी अधिकांश पढ़ाई भारत में हुई है जिसमें कोलकाता से की गयी एमबीबीएस की पढ़ाई और पीजीआई, चंडीगढ़ से की गयी एमडी की पढ़ाई शामिल है। इस वजह से वह भारत को अच्छी तरह से जानते हैं और अपने पहले प्रेस संबोधन में कहा भी है कि वह भारत से दोस्ती चाहते हैं। लेकिन किसी देश का रिश्ता दूसरे देश के साथ होता है, किसी एक नेता के साथ नहीं। इसलिए अगर माओवादी भी सत्ता में रहेंगे, तो उम्मीद यही है कि भारत के साथ नेपाल के रिश्ते बेहतर और व्यावहारिक ही होंगे।

 

– डॉ. एम. सी. छाबड़ा

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