लोकमन पर अंकित सीता की मानवीय छवि

चर्चित लेखिका मृदुला सिन्हा किसी परिचय की मोहताज नहीं। अपने लेखन के माध्यम से जहाँ सम-सामयिक विषयों को यथास्थान उठाती रही हैं, वहीं उनकी कहानियों, उपन्यासों में यत्र-तत्र-सर्वत्र लोकमानस की एक सोंधी, देसी खुशबू महकती रहती है।

जब इनकी नयी कृति ‘सीता पुनि बोली’ हाथ में आई, तो एकबारगी संपूर्ण पुस्तक पढ़ लेने का लोभ संवरण नहीं कर पाई। सीता… वह लोकपूज्या पतिव्रता नारी- जिनकी स्मृति-सलिला आदि काल से सतत प्रवाहित होती हुई त्रेतायुग से अधुनातन समय के जन-जन के हृदय में रची-बसी है। वह भारतीय लोकमन में तो बसी ही हैं, सात समुद्र पार भी उनके सत ने अपनी सुगंधि बिखेरी है और प्रतिमान बनाये हैं।

सीता… जिन्हें हर भारतीय नारी कहीं-न-कहीं अपने आदर्श के रूप में देखती रही है। सीता… जिन्हें महाशक्ति, जगतजननी के रूप में पूजा जाता है। सीता… जो क्षमा की देवी कहलाती हैं, अपरिमेय सहनशीलता की मूर्ति हैं, जिन्हें हमारा समाज हजारों-हजार वर्षों से पूजता आ रहा है। सच पूछें तो हर नारी के अंतस में बसी है यह सीता। हर नारी को आशीर्वाद मिलता है कि सीता जैसी सहनशील बनो, क्षमा की देवी बनो…।

वह सीता क्या मानवीय गुण-दोषों में परे होंगी? उनके साथ घटी तमाम घटनाओं की असंख्य झंझावाती लहरें क्या उनके अंतस् को आंदोलित नहीं करती होंगी। सीता भी एक नारी थीं। उनकी भी अपनी भावनाएँ रही होंगी, उन्हें भी अपने मान-अपमान, आग्नपरीक्षा व परित्याग का दर्द सालता होगा- ऐसा क्यों नहीं सोचा जाता हमारे समाज में? क्या नारी होने का यथार्थ सिर्फ और सिर्फ यही है कि वह हर हाल में क्षमा की मूर्ति बनी रहे? सदैव सहनशीलता के आवरण में लिपटी रहे? अनुगामिनी का धर्म निभाती रहे? निःसंदेह वह अनुगामिनी है, लेकिन किन्हीं भी कारणों से ही सही, उसे ही परित्याग की पीड़ा क्यों भोगनी पड़ती है? वह सीता- जो नारी देह से जन्म लेने की बजाय पृथ्वी की कोख से पैदा होती है, क्या उसका बालपन उसकी अन्य बहनों की तरह सहज-सरल रहा होगा? वह सीता- जिसके विवाह के लिए उनके पिता महाराज जनक ने बड़ी कठिन प्रतिज्ञा ठान ली, शिवधनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाने वाले वीर-पुरुष से ब्याहने की प्रतिज्ञा… वह ऊहापोह की किन परिस्थितियों से गुजरी होगी? वह सीता- जो सास-ससुर की आज्ञा शिरोधार्य कर सहर्ष राम की अनुगामिनी बन वनवास भोगने को उद्यत हो जाती हैं और जीवन भर अपने पति श्रीराम की सेवा में अपना संपूर्ण अस्तित्व न्योछावर कर देती हैं। वह सीता- जिनका अपहरण हो जाने के बाद श्रीराम ‘हे खग-मृग हे मधुकर श्रेनी….’ कहते हुए जंगल के चप्पे-चप्पे से अपनी प्राणप्रिया का पता पूछ रहे हैं कि क्या तुमने उस जनकदुलारी को कहीं देखा है, उसी प्राणप्रिया के लिए लंका पर चढ़ाई कर रावण का संहार करते हैं और विभीषण को राजा बनाते हैं,

लेकिन उसी प्राणप्रिया सीता को अपनाने से पहले उनकी अग्निपरीक्षा लेते हैं? क्यों? प्रश्‍न उठना स्वाभाविक है। इतना ही नहीं, अंत में अपनी गर्भवती पत्नी को एक बार फिर निर्वासित कर जंगल में भेज देते हैं… लोकमानस पर रामराज्य में जन-जन की समानता की कसौटी पर मानो फिर चढ़ा दी गई एक नारी।

अगर ये सारी बातें एक भगवान श्रीराम और माता सीता के लिए हैं तो आस्थाओं पर सवाल उठाना बेमानी है चूँकि आस्थाएँ तर्क-वितर्क से परे होती हैं। लेकिन लेखिका ने सवाल उठाया है एक नारी के अंतस के आलोड़न का, एक नारी की भावनाओं के उद्वेलन का और एक सहज-सरल अनुगामिनी नारी के कदम-कदम पर विराट होते स्वरूप का, जो पति-अनुगामिनी होते हुए कब इतने विराट व्यक्तित्व की मालिक बन गई, उसे स्वयं पता नहीं चला।

लेखिका अपनी भूमिका में बड़े स्पष्ट शब्दों में कहती हैं, ‘‘बहुत से प्रश्‍न अनुत्तरित समझे जाकर भी अनुत्तरित नहीं हैं। लोकमन ने इन प्रश्‍नों का हल ढूंढा है। सीता के अन्तर्मन में लाख-लाख नर-नारियों ने प्रवेश किया है। अपने बड़े से बड़े दुःख को सीता के दुख के आगे छोटा समझकर धैर्य धारण किया है। राजा की दुलारी, राजा की बहू और राजा की पत्नी के हृदय की पीड़ा को सदियों से भारतीय जनमानस ने आत्मसात् किया है। वे स्वयं सीता की पीड़ा में डुबकी लगाते रहते हैं। इसलिए सीता का ‘आत्म’ मात्र एक व्यक्ति का ‘आत्म’ नहीं रहा, समाज का आत्म बना है।’’

वह फिर कहती हैं, ‘‘सीता की आत्मकथा लिखना कठिन तो था, असाध्य नहीं। अनधिकार चेष्टा भी नहीं। यह व्यक्ति से समष्टि की ओर ले जाने का प्रयत्न ही था।’’ वह आगे कहती हैं, ‘‘मेरी लेखनी भयभीत अवश्य थी। शून्य भित्ति पर चित्र नहीं उकेरना था। चित्र तो हर भित्ति पर उकेरा हुआ है। अपनी लेखनी द्वारा उकेरे चित्र को विचित्र भी नहीं बनाना था।’’

लेखिका ने स्वाभाविक तौर पर रचना का प्रारंभ सीता के बालपन से किया है, जहाँ जनकदुलारी के अनेक बाल-रूपों को वर्णित करते हुए कुछ असहज से मगर बाल सुलभ सवालों से जूझते हुए भी उन्हें दिखाया गया है। बचपन, वयःसंधि की किशोर उम्र और युवा होते मन में राम-प्रेम का अंकुर फूटना तथा अत्यंत शीघ्र ही यथार्थ के कठोर धरातल पर सीता का आ जाना- सब कुछ बड़े सहज ढंग से रचा गया है। बीच-बीच में लेखिका ने कुछ ऐसे सवाल भी उठाये हैं जो सदियोेंं से नारी मन को मथते रहे हैं। यथा, जब वह श्रीराम से पूछती हैं कि आप मेरे पिताजी को पिताजी क्यों नहीं कहते? मैं तो अपने ससुर जी को प्रारंभ से ही ‘पिताजी’ कहती हूँ।

परित्याग का असह्य दुःख सहते हुए भी सीता नहीं भूलीं कि वह एक जिम्मेदार माँ हैं। अपने पति के साथ न रहते हुए भी उन्होंने अपने पुत्रों की परवरिश राजकुमार सदृश ही की और उनमें उचित गुणों का बीज डाला। फिर उनके पिता को सौंपकर अपना महती पत्नीधर्म पूरा किया। और अंततः सीता धरती में समा जाती हैं –

‘‘फाटहु धरती हो फाटहु, अपना में लेहु ना समाय

ई निर्मोहिया के मुँहवां ना देखब, गरभे दिहले बनवास।’’

जब सीता लव-कुश के जन्म पर कहती हैं-

‘‘कहाँ गइल नउआ रे भइया, लोचन लेई जाहहु हे,

लक्ष्मण से कहिह समुझाय, राम नाहिं जानय हे।’’

और यही है सीता के रूप में एक नारी और उसके नारीत्व की विजय, जहाँ वह अपनी त्याग, तपस्या और क्षमाशीलता और सहनशीलता से सबसे महान बन जाती है।

रचना की भाषा सहज प्रवाहित-सी है। बीच-बीच में लोकगीतों की पंक्तियाँ बहुत कुछ कह जाती हैं और अनुत्तरित प्रश्‍नों को एक हद तक अनुत्तरित रखते हुए भी अंतिम एक पंक्ति में लेखिका बहुत कुछ कह जाती हैं –

सीता धरती में गइली समाय मुखहुँ नाहिं बोलेली हे…’’

पुस्तक का आवरण पृष्ठ दर्शनीय है।

 

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