वास्तविकता

हमारे बदन में तब सिहरन नहीं होती

जब हम आपस में मिल बैठ कर

अपने पुऱखों की जमीन बॉंटते हैं

तब भी हमें सिहरन का आभास नहीं होता

जब अपनी सुविधाओं के लिए

हरे भरे जंगलों को निर्दयता से काटते हैं

मगर जब हम इन बांटने और काटने के

दूरगामी दुष्परिणामों पर एकांत में बैठकर

यदि आत्मचिंतन करेंगे, तब

मानो या न मानो पतझड़ में हवा के तेज झोंकों से

पत्तों की तरह हमारे मन थरथरा कर कॉंपते हैं

 

– नारायण दास हेड़ा ‘शतदल’

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