संसद में सरकार की जीत

छत्रपति शिवाजी के सेनापति तानजी ने मुगल सेना के साथ भयानक युद्घ करते हुए सिंहगढ़ जीत लिया था। लेकिन इस युद्घ में वह खेत रहे थे। जब शिवाजी को गढ़ जीतने और सेनापति तानजी के मारे जाने का समाचार मिला तो उन्होंने दुखी होकर कहा, “गढ़ आला पन सिंह गेला’ अर्थात् किला तो जीत लिया पर सिंह मारा गया।

कुछ ऐसा ही 22 जुलाई को संसद में मनमोहन सिंह की सरकार के विरूद्घ पेश विश्र्वास मत के साथ भी हुआ। यह आर-पार की लड़ाई तो डॉ. मनमोहन सिंह जीत गए मगर अब वह पहले की तरह मिस्टर क्लीन नहीं रहे जैसी कि उनकी छवि इस अविश्र्वास मत के पहले थी। पिछले 4 सालों में यूपीए सरकार के विरूद्घ भले कई तरह के लांछन लगते रहे हों लेकिन मीडिया और आम जनों के बीच प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की छवि हमेशा एक बेदाग नेता की थी। एक पाक-साफ सियासतदां की थी। उन्हें कीचड़ में कमल की तरह माना जाता था। लेकिन इस विश्र्वास मत हासिल करने की प्रिाया के दौरान डॉ. मनमोहन सिंह भी बेनकाब हो गए।

जिस शिबू सोरेन से वह लगभग सवा साल से मिलना तो क्या बातचीत भी नहीं कर रहे थे, उस शिबू सोरेन से डॉ. मनमोहन सिंह न सिर्फ मिले बल्कि संसद में अविश्र्वास प्रस्ताव जीतने के बाद तुरंत मंत्री बनाने का वायदा भी किया। अगर शिबू सोरेन की मानें तो उन्हें न सिर्फ कोयला मंत्रालय देने की बात कही गई है बल्कि उनके उस सुझाव को भी मान लिया गया है जो सुझाव ग्रेटर झारखण्ड के संबंध में है और जिसमें कई दूसरे प्रांतों के 5 से 6 जिले झारखण्ड में और जोड़ने हैं। विश्र्वास मत पेश होने के एक-डेढ़ हफ्ते पहले से लेकर अंतिम घड़ी तक जोड़-तोड़, रिश्र्वत, आरोप-प्रत्यारोप की जो ऐतिहासिक गतिविधियां हुईं, उन सबसे भी प्रधानमंत्री यह कहकर अपना पल्ला नहीं झाड़ सकते कि यह सब उनकी पार्टी ने किया। उनका इस सबसे कुछ लेना-देना नहीं था। अविश्र्वास प्रस्ताव आने के पहले तक अकसर मीडिया एक जुमला इस्तेमाल किया करती थी, “बेदाग प्रधानमंत्री, दागदार बहुमत’। लेकिन विश्र्वास मत हासिल करने की प्रिाया और जिस तरह से यह हासिल हुआ, उसके बाद अब मीडिया यह जुमला इस्तेमाल नहीं कर सकती। संसद में इसके पहले भी कई बार अविश्र्वास प्रस्ताव पेश हुए हैं और उनमें सरकारें गिरी भी हैं, बची भी हैं। लेकिन इसके पहले कभी भी देश और दुनिया ने भारतीय संसद को इस कदर पतित होते नहीं देखा था।

आखिर क्या नहीं हुआ इस बार। लगभग एक-डेढ़ हफ्ते तक समूची भारतीय सियासत घोड़ा-मंडी में तब्दील हो गई। आरोपों-प्रत्योरोपों के दौर इतने निम्न स्तर पर जा पहुंचे जैसा गली-कूचों में आम लोगों के लड़ते समय होता है। तमाम राजनीतिक और वैचारिक दुहाइयों व पाखंडों के बीच ऐसी कोई पार्टी नहीं रही, सिवाय कम्युनिस्टों के, इस अविश्र्वास प्रस्ताव के दौरान टूट-फूट न हुई हो या इन पार्टियों के नेताओं ने खरीद-फरोख्त की एक-दूसरे पर आरोप न मढ़े हों। “पार्टी विद डिफरेंस’ और शुचिता का नारा देने वाली भाजपा ने भले संसद में नोटों की गड्डियां उछालकर यूपीए पर कालिख पोतने की कोशिश की हो लेकिन इतिहास गवाह रहेगा कि इस प्रस्ताव के दौरान भाजपा को अपने ही सांसदों को एकजुट करना कितना मुश्किल हो गया था।

तमाम कोशिशों के बावजूद भाजपा इस अविश्र्वास प्रस्ताव के पहले अपनी कुछ सांसदों को पार्टी छोड़कर जाने या ऐन मौके पर ाॉस वोटिंग करने से रोक नहीं पाई। जबकि संसद में हुए मतदान के महज कुछ ही घंटे पहले सदन में एक ऐसा शर्मनाक वाकया संपन्न हुआ था जिसकी कभी कल्पना भी नहीं की गई थी। भाजपा के 3 सांसद फग्गन सिंह कुलस्ते, अशोक अर्गल और महावीर भगोरा ने संसद में अध्यक्ष की कुर्सी के पास पहुंचकर नोटों की गड्डियां लहराईं और कांग्रेस के अहमद पटेल तथा सपा के अमर सिंह पर आरोप लगाया कि यह नकदी उन्होंने संसद में अनुपस्थित रहने के लिए बतौर पेशकश दी थी। यह एक करोड़ रुपये थे जबकि इन सांसदों के मुताबिक उन्हें 3-3 करोड़ रुपये देने का वायदा किया गया था। शेष राशि सदन में मतदान के बाद मिलना था।

भारतीय राजनीति में संभवतः आरोप-प्रत्यारोप और भ्रष्टाचार का इतना निम्न स्तरीय आरोप पहले कभी नहीं लगा था। लेकिन हैरानी है कि इतने आरोपों-प्रत्यारोपों, भ्रष्टाचार के दावों-प्रतिदावों और संसद में रिश्र्वत के नोटों की गड्डियों को लहराने के बावजूद जब 22 जुलाई को शाम 6:45 बजे सदन में मतदान शुरू हुआ तो साफ जाहिर हो गया कि सांसद और राजनीतिक पार्टियां एक-दूसरे पर कीचड़ भले पूरी ताकत से फेंक रहीं थीं, चीख-चिल्ला भले रहीं थीं, लेकिन मैच का नतीजा फिक्स था। लगभग नूरा कुश्ती की तरह सब कुछ संपन्न हुआ। इतनी गर्मा-गर्मी और ईमानदारी व बेईमानी के भयानक गोलाबारी के बीच भी ऐन वोटिंग के दौरान ाॉस वोटिंग हुई। भाजपा, बीजू जनता दल, तेलुगू देशम पार्टी, जेडीएस, जेडीयू, एमडीएमके, टीआरएस और एनपीएफ व एनएलपी जैसी पार्टियों के सांसदों ने सारे शोर-शराबे, खरीदे-बेचे जाने के आरोपों के बीच अपनी पार्टियों के साथ विश्र्वासघात किया और सरकार के पक्ष में मतदान किया।

इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि कई दिनों से उठा-पटक और एक-दूसरे को बेनकाब करने की तमाम चालें किस कदर अभिनय मात्र थीं। यही नहीं, सदन में अगर यूपीए सरकार 256 के विरूद्घ 275 वोटों से जीती तो इसका एक बड़ा कारण संसद में बड़े पैमाने पर उन विपक्षी दलों के राजनेताओं की अनुपस्थिति भी थी जो ऐन मौके पर सरकार को गच्चा देने की बात कहते-कहते उसके फायदे के लिए वोटिंग के दौरान सदन में उपस्थित ही नहीं रहे। 10 सांसद जिसमें भाजपा के 4, शिव सेना का 1, जनता दल यूनाइटेड का 1, तेलुगू देशम पार्टी का 1, अकाली दल का 1, तृणमूल कांग्रेस का 1 और मिजो नेशनल फ्रंट का 1 सांसद शामिल था, अनुपस्थित रहे। यह भी सरकार को जीतने की सुविधा देने का ही तरीका था। कुल मिलाकर यह अविश्र्वास प्रस्ताव नपुंसक ललकार से ज्यादा कुछ साबित नहीं हुआ या यूं कहें कि सरकार को लाल-पीली आंखें दिखाने वाले राजनेता वास्तव में कारोबार कर रहे थे और सरकार को गिराने या उसके विरोध की तमाम बातें तो महज अपना भाव बढ़ाने व अपने मतदाताओं की आंखों में धूल झोंकने का जरिया भर था।

ऐसे में भला यह कैसे विश्र्वास हो कि जब सरकार गिराने का हंगामा मचाने वाले ऐन मौके पर गिराने की बजाय सरकार को बचाने में जुट गए तो फिर यूपीए के नेताओं पर लगने वाले वो आरोप निराधार हैं कि इनका मन और मंशा बदलने के लिए मनी का सहारा लिया गया है। भले राजनेता चीख-चीखकर यह जताने की कोशिश कर रहे हों कि उन्होंने ऐसा कुछ नहीं किया लेकिन अगर कुछ नहीं किया तो जो शिबू सोरेन इस अविश्र्वास प्रस्ताव के पहले तक अछूत थे, जिनके साथ प्रधानमंत्री अपनी फोटो भी नहीं खिंचवाना चाहते थे, वह आखिर अचानक प्रधानमंत्री को इतने प्रिय कैसे हो गए कि न सिर्फ उन्होंने शिबू सोरेन से काफी देर लंबी मुलाकात की बल्कि अब वह भारत सरकार के काबीना के हिस्से भी होंगे।

अविश्र्वास प्रस्ताव यूपीए सरकार ने भले जीत लिया हो लेकिन इस पूरी प्रिाया में संसद शर्मसार हुई। भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में अब के पहले कभी भी इस तरह नोटों के बंडल सदन में नहीं लहराए थे। लेकिन 22 जुलाई को यह सब कुछ हुआ और उसे सिर्फ भारत के लोगों ने ही नहीं बल्कि लाइव प्रसारण होने के कारण पूरी दुनिया ने देखा। दुनिया के सबसे बड़े और सबसे गतिमान समझे जाने वाले लोकतंत्र की इससे बड़ी कलंकित छवि और क्या हो सकती है? हमारे सांसदों को संसद की गरिमा और लोकतंत्र के सम्मान से कुछ लेनादेना ही नहीं है। अगर जरा भी इस मामले में वह संवेदनशील होते तो संसद को वह सब नहीं देखना पड़ता जो उसने देखा। अगर विपक्ष के बुजुर्ग नेता लालकृष्ण आडवाणी को जरा भी संसद के सम्मान का ख्याल होता तो वह इस पूरे प्रकरण को अध्यक्ष के केबिन तक सीमित कर देते। उन्हें संसद की गरिमा का ख्याल करना चाहिए था। अगर उनके सांसदों को इस रिश्र्वत कांड का खुलासा ही करना था तो इसके लिए वह प्रेस कांफ्रेंस का रास्ता भी चुन सकते थे। लेकिन उन्होंने अपनी कुटिल रणनीति के लिए संसद के पटल को चुना और पूरी दुनिया को दिखाया कि किस तरह भारत का लोकतंत्र बीमार और मानसिक दिवालिएपन से ग्रस्त है।

यूं तो सरकार ने सदन में बहुमत हासिल कर लिया है और अब उसकी मर्जी है कि वह इस मामले में किस रफ्तार से आगे बढ़ती है। लेकिन अगर यह सरकार वास्तव में परमाणु डील को इतना ही जरूरी समझ रही थी तो उसे इस डील को न्यूनतम साझा कार्याम में ही रखना चाहिए था। साथ ही यह बात कहने में भी गुरेज नहीं की जानी चाहिए कि यूपीए सरकार ने डील को लेकर जो हड़बड़ी और जुनून दिखाया है, वह सब भी कई तरह के सवाल खड़े करता है। देश की आम जनता को यूपीए ने विश्र्वास में नहीं लिया। शायद वह यह समझती रही हो कि आखिर देश के लोगों से इसका क्या लेना-देना? यही नहीं, सरकार अपने सहयोगी वामपंथियों से भी इस संबंध में तमाम बातें छिपाती रही है।

बहरहाल, परमाणु करार को लेकर पिछले कुछ महीनों से पूरा देश जिस राजनीतिक डामे से मुखातिब था, उसका फिलहाल पटाक्षेप हो गया है। सरकार अपनी राह आगे बढ़ने को आजाद हो चुकी है और विपक्ष तमाम कलाबाजियां दिखाने के बावजूद अपने तमाम स्टैंड को सियासी जोड़-तोड़ और नफे-नुकसान से आगे नहीं ले जा सका है। कुल मिलाकर एक नूरा कुश्ती थी जो अपने-अपने हितों के हिसाब से लड़ी जा रही थी। अब यह नूरा कुश्ती खत्म हो चुकी है। देश की जनता पहले भी कुछ नहीं जानती थी और अब भी कुछ नहीं जानती। वह तो बस अभिशप्त है अपने मंझे हुए राजनीतिक कलाकारों का नाटक देखने को।

 

न भूतो…

22 जुलाई को संसद में मनमोहन सिंह सरकार के विरूद्घ अविश्र्वास प्रस्ताव पेश होने के पहले जिस तरह सदन में नोटों की गड्डियां उछाली गईं और सदन में सांसदों की खरीद-फरोख्त के आरोप-प्रत्यारोप लगे, वैसा अब के पहले कभी नहीं हुआ था।

भारत में राजनीतिक भ्रष्टाचार कोई पहली बार सुना गया अटपटा शब्द नहीं है। लेकिन अब से पहले कभी भी संसद में इस तरह से लोकतंत्र की गरिमा की खाल नहीं उधेड़ी गई थी। तमाम कानूनी विशेषज्ञों और राजनीतिक अनुभव से संपन्न लोगों को यह सब देखकर धक्का लगा है। ऐसा नहीं है कि इस सबको छिपाया जाना चाहिए था मगर यह जरूरी था कि इस पर्दाफाश के पहले संसदीय गरिमा और लोकतंत्र के भविष्य का भी ध्यान रखा जाना चाहिए था। मान लीजिए, कल को यह साबित होता है कि यह सब झूठ था तब क्या होगा? क्या इस राजनीतिक स्टंट से संसद की गरिमा को जो ठेस पहुंची है वह फिर से बहाल हो सकती है? कभी नहीं।

भारत का लोकतंत्र ही वह यूएसपी है जिसे पूरी दुनिया गंभीरता और सम्मान से देखती है। लेकिन हमारे राजनेता इस एक खूबी को भी बचाकर नहीं रखना जानते। जिस तरह से संसद के पटल पर नोटों की गड्डियां उछाली गईं उससे हमारे लोकतंत्र का सिर शर्म से झुक गया है।

दरअसल, भाजपा शायद इस निष्कर्ष पर पहुंच चुकी थी कि सरकार के गिरने का उसे कोई फायदा नहीं हासिल होने वाला। इसलिए वह सरकार गिराने की बजाय सरकार को ज्यादा से ज्यादा बदनाम करने पर उतर आई ताकि आगामी चुनाव में उसका फायदा लिया जा सके। इसीलिए संसद में वह सब हुआ जो अब के पहले कभी नहीं हुआ था। मगर हम यह दावे के साथ नहीं कह सकते कि आगे भी कभी नहीं होगा।

–     शाहिद ए. चौधरी

– लोकमित्र

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