सद्गुरु की महिमा

गुरु वह है, जो शिष्य के जीवन में व्याप्त अंधकार को ज्ञान से दूर करता है। अतः सद्गुरु चन्द्रमा की भांति हो जाता है। मनुष्य चिंताओं के बोझ से काफी लदा हुआ है। अतः चिन्ता-मुक्त होने के लिए उसे भक्ति के मार्ग की ओर बढ़ना होगा।

गुरु में इतना विवेक अवश्य होना चाहिए कि वह सही एवं गलत की परख कर सके और कोई गलत कार्य करे तो उसे वैसा करने से रोके। सम्पूर्ण व्यावहारिक जगत ही कपट धर्म है। मनुष्य को व्यवहार में प्रेम करते हुए भी कपट करना पड़ता है। कपट धर्म के बिना किसी का भी काम नहीं चलता। विशुद्घ धर्म तो भगवत प्रेम व श्रीमद्भागवत में है। श्रीमद् भागवत कथा पाठ मनुष्य को तब तक करना चाहिए, जब तक कि शरीर पंचतत्व में विलीन न हो जाए। मनुष्य के साथ धर्म नहीं है तो वह ईश्र्वर के निकट नहीं पहुंच सकता। मनुष्य का प्रथम कर्त्तव्य “भगवान के प्रति प्रेम’ होना चाहिए।

जीवन में अगर कोई धर्म महत्वपूर्ण है तो वह है- मानव-धर्म, न कि जाति या सम्प्रदाय का धर्म। आज लोग जिस तरह से धर्म एवं जाति के नाम पर लड़ रहे हैं, वह हमारे देश को ले डूबेगा। इसलिए सभी को चाहिए कि कट्टर धार्मिकता से ऊपर उठकर मानव-धर्म का पालन करें। सभी को सांसारिक मोहमाया के जाल से दूर रहकर भगवान की भक्ति में मन लगाना चाहिए, क्योंकि भक्ति में ही शक्ति है एवं शक्ति से ही इस सांसारिक दुनिया से मुक्ति पाई जा सकती है। आज के दौर में हमारे देश में पाश्र्चात्य संस्कृति हावी हो रही है, जिसके कारण हमारी परम्पराएं एवं संस्कार गायब होते जा रहे हैं। यह हमारे लिए खतरे की घण्टी है। पाश्र्चात्यीकरण के इस कुप्रभाव को खत्म करने के लिए हमें टी.वी. पर आने वाले ऐसे कार्यामों का बहिष्कार करना चाहिए, जिससे हमारे बच्चे प्रभावित हो रहे हैं। वहीं घर में पुरानी परम्पराओं व संस्कारों का पालन कर बच्चों को सीख देनी चाहिए, ताकि बच्चे इन संस्कारों को ग्रहण कर देश को फिर से विश्र्व गुरु के सिंहासन पर आरूढ़ कर सकें।

भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीमद् भागवत गीता में जो उपदेश दिये हैं, उनको अगर अपने जीवन में अपना लिया जाए तो किसी भी तरह का कोई झगड़ा ही नहीं होगा, लेकिन ऐसा नहीं हो पा रहा है। जो लोग पैसे वाले हैं, वह अधिक पैसे की चाह में दिन-रात संस्कारों, रिश्तों, धर्म को ताक पर रखकर काम कर रहे हैं, इससे उन्हें पैसा तो मिल जाता है, लेकिन देश के संस्कार धूमिल हो रहे हैं। जीवन में मानव-धर्म ही श्रेष्ठ है। इसे कभी भी नहीं भूलना चाहिए।

अगर सही जीवन जीना है, सुखी जीवन जीना है तो ईश्र्वर भक्ति परम आवश्यक है। भक्ति बिना हम कुछ भी हासिल नहीं कर सकते। ईश्र्वर तो सुख के सागर हैं। जो सच्चे मन से ईश्र्वर का ध्यान लगाता है, प्रभु उसके दुःखों का निस्तारण अवश्य ही करते हैं। सुख में मनुष्य इठलाता है, घमण्ड करता है, अहंकार करता है। वह सुख को अपना दास समझने लगता है। मनुष्य का यह अहंकार, घमण्ड व सुख को दास समझना उसकी भूल है, मूर्खता है। चूंकि सुख-दुःख तो धूप-छांव की भांति आते-जाते रहते हैं। अतः हमें सभी से मुस्कुराहट के साथ ही मिलना चाहिए व मिलने वाले को ईश्र्वर का ही रूप समझना चाहिए।

– सुनील कुमार माथुर

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