सिमी यानी आतंकवाद का ईंधन

सिमी के समर्थक तथाकथित लाल बुद्घिजीवियों, पत्रकारों और राजनीतिक दलों को सिमी प्रमुख सफदर नागौरी का इंडिया टुडे के 2 अप्रैल, 2003 के अंक में छपा साक्षात्कार ़जरूर पढ़ना चाहिए। सफदर नागौरी ने अपने साक्षात्कार में साफ तौर पर कहा था कि हिन्दुस्तान को सबक सिखाने के लिए आज मोहम्मद गजनवी की आवश्यकता है। मुसलमानों के रहने के लिए यह मुल्क तभी लायक होगा जब यहॉं पर इस्लाम का शासन होगा। सिमी ने अफगानिस्तान में तालिबानी व्यवस्था और अलकायदा सरगना ओसामा बिन लादेन का भी समर्थन किया था। अमेरिकी वर्ल्ड टेड सेंटर पर हुआ अल-कायदा का हमला और कारगिल में पाकिस्तानी सैनिकों की घुसपैठ का भी वह समर्थन कर चुका है। सिमी खुलेआम अलग कश्मीर का समर्थन करता है, ताकि कश्मीर में इस्लाम का शासन लागू किया जा सके। सिमी के कार्यकर्ता आतंकवाद का प्रशिक्षण लेने पाकिस्तान और अफगानिस्तान आते-जाते रहे हैं। सिमी की राष्ट विरोधी गतिविधियों के कारण देश की आंतरिक चुनौतियां बढ़ी हैं। हाल ही में गुजरात और कर्नाटक में हुए विस्फोट कांड इसके उदाहरण हैं। इन विस्फोटों में सिमी की संलिप्तता साफ तौर पर ़जाहिर हुई है। इसके पहले इंदौर में सिमी के प्रमुख सफदर नागौरी को गिरफ्तार किया गया था। लेकिन यूपीए सरकार और उसके समर्थक दलों की वोट की राजनीति की खातिर सिमी की राष्ट विरोधी गतिविधियों पर उदासीनता खतरनाक है। दिल्ली हाईकोर्ट के टिब्यूनल द्वारा सिमी पर लगे प्रतिबंध को हटाने से राष्ट के सामने आतंकवाद की चुनौतियां खतरनाक रूप से बढ़ गयी थीं। सुप्रीम कोर्ट ने सिमी से हटे प्रतिबंध पर रोक लगाकर तात्कालिक तौर पर राहत ़जरूर प्रदान की है। पर यह बात भी स्पष्ट हो गयी है कि यूपीए की सरकार आतंकवाद की चुनौतियों को किस प्रकार लेती है जबकि राजग शासनकाल के दौरान जिन आधारों पर सिमी पर प्रतिबंध लगे थे, वे सभी आधार आज भी मौजूद हैं। सिमी की राष्ट विरोधी गतिविधियां और खतरनाक हुई हैं।

सिमी की आतंकवादी और राष्ट विरोधी गतिविधियों की सूची बहुत लम्बी और पुरानी है। सबसे पहले हमें सिमी के इतिहास और उसकी विचारधारा को जानना होगा। सिमी का गठन 1972 में जमात-ए-इस्लामी के युवा संगठन के तौर पर किया गया था। प्रारंभ में सिमी ने जमात-ए-इस्लामी के साथ मिलकर मुसलमानों को संगठित करने और सांप्रदायिक उन्माद फैलाने की कोशिश की, पर इसमें सिमी को कोई खास सफलता नहीं मिली। जमात-ए-इस्लामी के साथ सिमी के मतभेद गहरे हो गये क्योंकि जमात-ए-इस्लामी के लोग जहॉं उदार रुख के समर्थक थे वहीं सिमी के युवा कट्टर और उग्र रुख पर चलने को लेकर अडिग थे। दोनों के बीच मतभेद इतने गहरे हो गये कि सिमी ने अलग राह पकड़ ली। जमात-ए-इस्लामी से अलग होने के बाद सिमी ने उत्तर प्रदेश को अपना केन्द्र बना लिया। वैसे उनकी गतिविधियां दिल्ली, मध्यप्रदेश, गुजरात, राजस्थान, आंध्रप्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु और पूर्वोत्तर राज्यों में पहले से ही जारी थीं। सिमी ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्र्वविद्यालय और जामिया विश्र्वविद्यालय के सैकड़ों छात्रों को अपने संगठन में शामिल किया और उन लोगों को आतंकवाद फैलाने का प्रशिक्षण भी दिया। सिमी ने अपने सैकड़ों समर्थकों को आतंकवाद के प्रशिक्षण के लिए पाकिस्तान और अफगानिस्तान स्थित आतंकवादी प्रशिक्षण केंद्रों में भेजा। सिमी के सदस्यों ने 2002 में गुप्तचर ब्यूरो के अधिकारी राजन शर्मा का अपहरण कर अलीगढ़ मुस्लिम विश्र्वविद्यालय के हबीब हॉल में ले जाकर बंद कर दिया और नंगा करके उनकी जमकर पिटाई की गयी। सिमी ने कानपुर में कुरान जलाने की गलत खबर फैला दी थी, जिसके कारण कानपुर कई दिनों तक दंगों में जलता रहा था। कई निर्दोष ़िंजदगियां दंगों में मारी गयीं। अरबों रुपयों की क्षति हुई। हाल ही में अहमदाबाद और कर्नाटक में हुए बम विस्फोटों में सिमी का हाथ स्पष्ट हुआ है। इसके पहले सिमी के प्रमुख सफदर नागौरी और उसके कई साथियों की इंदौर में उस समय गिरफ्तारी हुई जब ये आतंकवादी गतिविधियों को बढ़ाने के लिए बैठक कर रहे थे।

सिमी देश के संविधान को नहीं मानता। तिरंगे को भी नहीं मानता है। वह भारत में इस्लामिक शरियत लागू कराना चाहता है। इसके लिए उसे एक और मोहम्मद गजनवी की आवश्यकता है। वही मोहम्मद गजनवी जिसने भारत को 17 बार रौंदा था। वह भारत में लोकतांत्रिक व्यवस्था की जगह पैगम्बर हजरत मोहम्मद साहब और कुरान के सिद्घांतों के आधार पर व्यवस्था चाहता है। इसीलिए उनका आदर्श ओसामा बिन लादेन और तालिबानी व्यवस्था है। मदरसों में सिमी की घुसपैठ बढ़ी है। सिमी का मानना है कि मदरसों में इस्लाम और कट्टरता की शिक्षा से उनका काम आसान होगा। मदरसों को चलाने के लिए सिमी को अरब देशों से काफी धन मिल रहा है। इधर ईरान और सीरिया सहित अन्य अरब देशों की दिलचस्पी मुस्लिम कट्टरपंथी सदस्यों में बढ़ी है। ये मुस्लिम देश भारत में अपने पक्ष में जनमत तैयार करना चाहते थे। खासकर अमेरिका विरोधी मुहिम में सीरिया, ईरान और क्यूबा आदि देशों की भूमिका से देश की गुप्तचर एजेंसियां भी चिंतित हैं। पिछले साल मुस्लिम समुदाय द्वारा आयोजित कई अमेरिका विरोधी प्रदर्शनों में सिमी जैसे कट्टरपंथी संगठन प्रत्यक्ष तौर पर शामिल थे और ऐसे प्रदर्शनों के लिए अरब देशों से धन मिले थे। इस प्रकार की जानकारियां भारतीय गुप्तचर एजेंसियों के पास हैं।

सिमी के पक्ष में संप्रग की सहयोगी पार्टियों के कुछ लोगों और वामपंथी पार्टियों का खड़ा होना सिर्फ और सिर्फ तुष्टीकरण है। वोट की राजनीति के लिए सिमी जैसे देश-तोड़क संगठन का समर्थन किया जा रहा है। मुस्लिमों का वोट प्राप्त करने के लिए पहले यह खेल कांग्रेस खेला करती थी। लेकिन अब क्षेत्रीय राजनीतिक दल भी इस खेल में पारंगत हो गये हैं। बिहार और उत्तर प्रदेश में मुसलमानों के समर्थन से इन पर्टियों ने लम्बे समय तक सत्ता सुख भोगा है। इधर परमाणु करार का समर्थन करने के कारण इनके मुस्लिम जनाधार पर प्रश्र्न्नचिह्न खड़ा हुआ है। बिहार में नीतीश कुमार जातीय और धार्मिक संतुलन को बनाकर चल रहे हैं। वहीं उत्तर प्रदेश में मायावती ने मुलायम के मुस्लिम जनाधार में मट्ठा डाल दिया है। यह जहॉं तक वामपंथी पार्टियों की बात है, तो ये भी मुस्लिम तुष्टीकरण में पीछे कहॉं हैं? पश्र्चिम बंगाल में सत्ता के लिए बांग्लादेशी घुसपैठियों का समर्थन देना जगजाहिर है। पिछले केरल विधानसभा चुनाव में वामपंथी पार्टियों ने मुस्लिम कार्ड खेला था।

सिमी जैसे आतंकवादी संगठन कभी भी मुसलमानों का हितचिंतक नहीं हो सकते हैं। सिमी जेहाद के नाम पर इस्लाम को बदनाम कर रहा है। सिमी मुस्लिम युवकों को गुमराह कर उन्हें आतंकवादी बना रहा है। सिमी के कारण ही आज देश के हजारों मुस्लिम युवक जेलों में बंद हैं। सिमी मुसलमानों का विकास नहीं बल्कि दंगे और फसाद कराकर मुसलमानों को मरवाना चाहती है। उसने कुरान जलाने की अफवाह फैलाकर कानपुर में जो दंगे कराये थे उसमें मुसलमान ही अधिक मारे गये थे और उनका ही सर्वाधिक नुकसान हुआ था। खुद मुस्लिम समुदाय को सिमी जैसे संगठन से दूर रहने या विरोध करने के लिए सोचना चाहिए।

यूपीए सरकार की मुस्लिम-परस्त राजनीति के कारण आतंकवाद के खिलाफ हमारी लड़ाई कमजोर हुई है। राजग शासनकाल के दौरान सिमी पर जिन आधारों पर प्रतिबंध लगे थे वे सभी आधार अब भी हैं। इतना ही नहीं बल्कि सिमी की राष्ट विरोधी गतिविधियां और अधिक खतरनाक हुई हैं। इसके बावजूद यूपीए सरकार ने दिल्ली हाईकोर्ट की टिब्यूनल के सामने सभी तथ्य नहीं रखे जिसके कारण टिब्यूनल ने सिमी पर लगा प्रतिबंध हटा दिया। सुप्रीम कोर्ट ने टिब्यूनल के फैसले पर रोक लगाकर राष्ट के सामने खतरे को टाल कर अपना फर्ज निभा दिया है। अतः तमाम दलों और वामपंथी पार्टियों को अब मुस्लिम-परस्त राजनीति को छोड़ कर राष्टहित में सोचना चाहिए। इस तरह के रुख और राजनीतिक सोच से आतंकवाद जैसी बुराई क्या समाप्त हो सकती है?

 

– विष्णु गुप्त

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