सैम अंकल ने पढ़ाया समय का पाठ

दोस्तों, हमारे देश ने एक महान योद्घा खो दिया है। जी हॉं, आप सबके सैम अंकल और मेरे प्रिय मित्र मानेकशॉ नहीं रहे। लेकिन उनकी यादों का चिराग हमेशा हमारे दिलों में जलता रहेगा। उनसे मेरे जीवन की बहुत महत्वपूर्ण घटनाएं जुड़ी हुई हैं। बात ठीक 38 साल पुरानी है। अपनी प्रथम पुस्तक “कैंटोनमेंट्स ऑफ शिमला हिल़्ज’ जो हिमाचल की छावनियों का ऐतिहासिक दस्तावे़ज है, उसे फील्ड मार्शल मानेकशॉ को भेंट करने के लिए 10 अप्रैल, 1970 को सायं चार बजकर 40 मिनट से पॉंच बजे तक का समय तय था। सिक्योरिटी चैक के बाद जब उनसे मिलना हुआ तो 4.50 बज चुके थे। यह विलंब उनके स्टाफ के कारण हो गया था। उन्होंने बड़ी आत्मीयता से पुस्तक को स्वीकार किया। देखा, थोड़ा-सा पढ़ा और शुभकामनाएं दीं। कॅरियर के बारे में पूछा। पुस्तक में दी गयी सामग्री के विषय में जानकारी ली। चूंकि वे गोरखा रेजीमेंट में रह चुके थे, इसलिए सेना के इस पक्ष को वे मेरी पुस्तक में देखना चाहते थे, जिसे देख कर वे बहुत प्रसन्न हुए।

वे घड़ी देख कर बोले, “”जैंटलमैन, आप 10 मिनट लेट पहुँचे। हमने अपनी मीटिंग के बेशकीमती समय में से 10 मिनट गंवा दिये हैं। हाउ विल वी विन द वार?” हालांकि गलती मेरी नहीं थी, पर देश के 10 मिनट तो जाया हो ही चुके थे।

उनकी समय को पहचानने की इस आदत से ही 1971 में भारत ने बांग्लादेश को मुक्त करवाया था। वे प्रधानमंत्री से भी अधिक लोकप्रिय हो गये थे।

मेरे गृहनगर सपाटू में सेना का 14-गोरखा प्रशिक्षण केंद्र है। उन्हें इस स्थान से काफी लगाव रहा और व्यस्तता के बावजूद यहॉं आते रहे।

दूसरी बार जब इस पुस्तक के सिलसिले में आर्मी हेडक्वार्टर, दिल्ली में उनसे भेंट हुई तो वे तपाक से गोरखाली में बोले, “”कस्तो छा?” मैंने भी नेपाली भाषा में उत्तर दिया, “”सॉब! राम रो छा! तभी रामरो हनु?” (कैसे हो? अच्छे हैं। आप भी ठीक हैं?)

गोरखा सैनिकों के वे चहेते थे। इसलिए वे प्यार से उन्हें सैम बहादुर कहते थे। आज मेरे गृहनगर सपाटू में भी शोक है। उनका चित्र मेरे सामने है। उनकी प्रेरणा से आज तक मैं कभी लेट नहीं हुआ। जीवन की घड़ी की सुइयों के साथ चला और टाइम मैनेजमेंट सैम बहादुर से सीखा। आज कम से कम समय में अधिक काम करने की प्रवृत्ति मैंने मानेकशॉ जी से ही सीखी है जिसका जीवन में बहुत लाभ मिला।

– मदन गुप्ता “सपाटू’

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