हे हमारे नियंताओं! यह आपके परीक्षा की घड़ी है

किसी देश के नेतृत्व का असली परीक्षण घोर संकट के समय ही होता है। संसदीय लोकतंत्र में राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप, विरोध-प्रतिरोध आदि आवश्यक बुराई के रूप में स्वीकृत हो चुके हैं। किन्तु देश का संकट हर प्रकार के राजनीतिक संकोच से परे होना चाहिए। चाहे सत्तापक्ष हो या विपक्ष, देश बचेगा तभी न राजनीति होगी। आप पूछ सकते हैं कि इस समय ऐसा कौन-सा आपात संकट आ गया, जिससे देश को बचाने की नौबत उत्पन्न हो गई? संकट कई बार सीधा दिखता भी है और नहीं भी दिखता। लेकिन नेतृत्व को इतना दूरदर्शी होना चाहिए कि आसपास के संकट का उसको आभास हो एवं उससे अपने देश को बचाने के लिए वह तत्पर हो जाए। विश्र्व इस समय जिस प्रकार के भयावह आर्थिक एवं वित्तीय संकट की आग में झुलस रहा है, उसकी लपटें जब धीरे-धीरे अन्य देशों को अपनी चपेट में ले रही हैं तो फिर भारत उससे पूरी तरह बच पाएगा, ऐसा मान लेने का कोई कारण नहीं है। यानी यह संकट हमें भी बुरी तरह झुलसा सकता है। अगर हमारे नियंताओं ने थोड़ी भी ईमानदारी से विचार करने की कोशिश की तो इसमें भविष्य के लिए साफ संकेत निहित है। आतंकवाद का खतरा सीधा दिखता है, लेकिन आर्थिक संकट एकदम उसी रूप में सीधा न दिखते हुए भी अत्यंत ही गंभीर विपत्ति का संकेत है। लेकिन सरकार एवं विपक्ष दोनों का रवैया देखिए तो देश को उबारने के पूर्वोपाय करने का कोई उद्यम ही नहीं है।

यह स्थिति देश के भविष्य की चिंता करने वालों के लिए निश्र्चय ही भयभीत करने वाली है। यद्यपि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने मंत्रिमंडल की बैठक में इस गहराते संकट पर विचार-विमर्श किया, लेकिन इसका एजेंडा काफी विस्तृत था। अर्थात् यह आर्थिक संकट पर केंद्रित बैठक नहीं थी। बैठक के बाद सरकार की ओर से आए बयान का लुब्वोलुवाब यही था कि हमें घबराने की आवश्यकता नहीं है, हमारे मूल आर्थिक मानक मजबूत हैं। हालॉंकि यह तो माना गया कि अमेरिका एवं अन्य देशों की मंदी का असर पड़ रहा है, लेकिन यह कहा गया कि इसकी छाया देशवासियों पर पड़ने नहीं दी जाएगी। वित्त-मंत्री पी. चिदंबरम का ऐलान है कि हम वैश्र्विक मंदी को भारत आने से रोकने में पूरी तरह सक्षम हैं। कैसे सक्षम हैं? ये तो बताएं। अंतर्राष्टीय मुद्राकोष ने विश्र्व आर्थिक परिदृश्य रिपोर्ट में साफ कहा है कि 1930 की आर्थिक महामंदी के बाद आए इस सबसे बड़े आर्थिक संकट से अगले साल तक कोई राहत नहीं मिलेगी। ऐसी और भी रिपोर्टें आ रही हैं, जिनमें विश्र्व का अत्यंत ही धुंधला आर्थिक परिदृश्य बताया जा रहा है। मुद्राकोष ने इसका सबसे घातक असर अमेरिका एवं यूरोप पर पड़ने की बात तो कही है लेकिन यह स्वीकार किया है कि भारत भी इससे अछूता नहीं रहेगा। अगर कोई संगठन नहीं ऐलान करे तो भी जारी भूमंडलीकरण के दौर में जब पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था एक-दूसरे से जुड़ रही है तो कोई देश कैसे अपने को बिल्कुल इस आग से सुरक्षित रख सकता है। और भारत तो विश्र्व की अर्थव्यवस्था के साथ स्वयं को जोड़ने की दिशा में द्रुत गति से चलने वाला देश है। हमारे उद्योग संघ एसोचैम ने सरकार से मंदी से निपटने के लिए तुरंत एक लाख करोड़ रुपया उपलब्ध कराने का अनुरोध किया है। यह तो शुरुआत है। आगे और भी बड़ी मांगें सामने आएँगी।

हम यहॉं दुनिया भर के देशों ने इस मंदी की मार का सामना करने या अपने डूबते बैंकों या वित्तीय संस्थाओं को बचाने के लिए जो भारी-भरकम रकम डाले हैं या अन्य कदम उठा रहे हैं, उनकी सूची नहीं दे रहे। वस्तुतः हमारे नियंताओं के सामने वे सारे तथ्य हैं। अगर वे ठीक से विचार करें तो उनकी आँखें खुल सकती हैं। बताया जा रहा है कि हमारे बैंकों की स्थिति मजबूत है और ग्राहकों का जमा धन पूरी तरह सुरक्षित है। ईश्र्वर करें ऐसा ही हो। किन्तु हमारे देश का ऐसा कौन-सा बैंक है, जिसने अमेरिका या अन्य देशों की तरह अपनी राशि का बड़ा हिस्सा आवास एवं अन्य विनिर्माण क्षेत्र में कर्ज के रूप में नहीं लगाया हुआ है? भवन निर्माण का व्यवसाय करने वाली कंपनियों ने जिस प्रकार जमीन एवं मकान के दामों को विश्र्व बाजार के अनुकूल बनाने के लिए आसमान चढ़ाए उनसे बैंकों की कर्ज राशि भी उछल गई। यह स्थिति आज भी जारी है। कोई यह सोचने के लिए तैयार ही नहीं है कि आखिर एक सामान्य मध्यमवर्ग परिवार दो-तीन-चार कमरों का घर यदि 50 लाख से एक-डेढ़ करोड़ में लेता है, तो वह कर्ज की किस्त पूरी तरह कहॉं से चुकता कर पाएगा? जिस तरह अमेरिका एवं यूरोप के देशों में आवास कर्ज डूबने से बैंकों का दिवाला निकल रहा है, कल वैसा ही भारत में भी हो सकता है। यह हमारे लिए आसन्न खतरा है। इसमें आम आदमी की बैंक में जमा गाढ़ी कमाई डूब सकती है। ऐसे समय सरकार के कोरे आश्र्वासन काम नहीं आएँगे। क्या सरकार ने भारत के बैंकों के आवास कर्जों की समीक्षा की कोई योजना बनाई है? नहीं। तो फिर उनके आश्र्वासनों का कोई अर्थ नहीं है। जरा सोचिए, ब्रिटेन जैसे देश को अपने बैंकों को उबारने के लिए 500 अरब पौंड यानी करीब 42 हजार 500 अरब रुपया लगाना पड़ रहा है। ऐसी बड़ी राशि हमारे बूते की बात नहीं है।

आवास कर्ज तो एक पहलू है। सच यह है कि सरकार या विपक्ष कोई इस संकट को उसके वास्तविक स्वरूप में देखने की जहमत ही उठाने को तैयार नहीं और इस कारण भावी महासंकट दिख नहीं रहा है। यह कोई सतही संकट नहीं है। यह पूरी आर्थिक प्रणाली का संकट है। यह उस प्रणाली का संकट है, जिसका प्रगति चा कर्ज, उत्पादन और खरीद के भोगोन्मुखी संतुलन पर निर्भर है। यह अस्वाभाविक प्रणाली है, जिसके बीच लंबे समय का संतुलन कायम रह ही नहीं सकता। इसमें शेयर बाजार की अति संवेदनशीलता एवं प्रमुख भूमिका ने समस्या और बढ़ाई है। दुर्भाग्यवश हमने उसी को आदर्श मानकर सदियों के अनुभवों से स्वयं कायम हुए अपने परंपरागत आर्थिक ढॉंचों को धीरे-धीरे कमजोर कर दिया। प्रमुख विपक्षी पार्टी भाजपा भी इसी अर्थव्यवस्था की समर्थक है, इसलिए सरकार के सामने नयी दिशा में विचार करने का कोई दबाव नहीं है। सच तो यही है कि भूमि एवं मकानों के दाम में अकल्पनीय छलांग भाजपा नेतृत्व वाली राजग सरकार के दौरान ही आरंभ हो चुकी थी। इसे ही विकास का पैमाना मान लिया गया और इस कारण रोकने की कभी कोशिश नहीं हुई। यह साधारण चिंता का विषय नहीं है कि दुनिया के प्रमुख देशों की दुर्दशा से हमारा राजनीतिक नेतृत्व एवं उनको सलाह देने वाले नौकरशाह कोई सबक लेने को तैयार नहीं। देश को मिल रहा है कोरा आश्र्वासन और उपायों के तौर पर बैंकों की आवश्यक जमा में से आधा प्रतिशत की कमी कर बाजार में रुपया बढ़ाने का कदम उठाया गया है। शेयर बाजार में थोड़ी रौनक लाने के लिए यह उपाय एक अंश तक ठीक हो सकता है, लेकिन देश शेयर बाजार से नहीं चलता। आम आदमी की जिंदगी शेयर बाजार पर निर्भर नहीं है और न आर्थिक संकट का कारण और समाधान शेयर बाजार में निहित है। अब समय आ गया है, जब हमारा नेतृत्व इस अर्थव्यवस्था की सीमाओं में विचार करने की जगह दिमाग खोलकर विचार-विमर्श करे। अगर उसकी समझ में यह आता है कि समस्या इस प्रणाली में निहित है, तो फिर जिस तरह प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने 1991 में पूरी अर्थव्यवस्था को परिवर्तित करने का ाांतिकारी कदम उठाया था, उसी तरह वे इस व्यवस्था को भी परिणत करने की शुरुआत कर दें। यह भारत को बचाने का प्रश्र्न्न है। भारत के आम आदमी की आर्थिक स्वायत्तता एवं सुरक्षा का मामला है। ऐसा न करने का अर्थ है कि हमारे नियंता संकट को समझने की ईमानदार कोशिश नहीं कर रहे। जाहिर है, परीक्षण की इस घड़ी में वे विफल हो रहे हैं।

 

– अवधेश कुमार

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