कुछ आत्मा के लिए भी खायें

खाना हम पेट भरने के लिए खाते हैं, लेकिन हमेशा सिर्फ पेट के लिए ही नहीं खाना चाहिए। कभी कुछ आत्मा के लिए भी खाना चाहिए। अपनी रसोई में ऐसा मेन्यू बनायें, जो पेट के साथ-साथ आत्मा का भी भोजन हो। मनोवैज्ञानिक भी कहते हैं कि खाने में सिर्फ पेट भरना जरूरी नहीं होता। पेट तो कैसे भी भरा जा सकता है। खाने का असली आनंद है कि हम जब खायें तो उससे खुशी महसूस हो, उससे पूरी तरह से तृप्ति हो।

मीता विश्र्वास लगभग हर दिन जले-भुने मूड के साथ ऑफिस पहुंचती थी, क्योंकि सुबह देर होने के कारण वह हर दिन अपना मनपसंद नाश्ता मिस कर देती थी या फिर उसे वह खाना पड़ता था, जिसे वह बिल्कुल भी पसंद नहीं करती थी। मगर ऑफिस से इस सबका क्या मतलब, इसलिए वह इसका जिा ऑफिस में नहीं करती थी। मगर सुबह-सुबह तनाव में रहने के कारण उसके काम में फर्क पड़ने लगा। उसकी परफॉर्मेंस प्रभावित होने लगी और अंत में नौबत यहां तक आ गयी कि उसे काउंसलर के पास जाना पड़ा। काउंसलर ने कई सिटिंग ली और समझा कि शायद मीता के गुस्से का कारण स्वाभाविक रूप से उसका गुस्सैल होना है। इसी दिशा के चलते वह हल निकालने की कोशिश में जुट गया। लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। मीता का मूड हमेशा की तरह अब भी गुस्से और तनाव से दो-चार रहता था। अंत में मीता ने काउंसलर की मदद बंद कर दी और परेशान रहने लगी।

एक दिन मीता की मां ने अचानक महसूस किया कि हो न हो, यह मीता को मनपसंद खाना न मिल पाने और लाइफस्टाइल में व्यस्तता बढ़ जाने का नतीजा हो। शायद नीता की मां ने मनोविद के मुकाबले बेहतर जगह पर अंगुली रखी थी। जैसे ही वे अपने इस निष्कर्ष के तहत कोशिश में जुटीं कि मीता को सुबह उसका मनपसंद नाश्ता मुहैया कराया जाए और उसके लौटने पर उसके काम में मदद करवाकर उसे व्यस्तता के बोझ व तनाव से मुक्त किया जाए। मीता की मां इसमें सफल हुईं और असर दिखने लगा। मीता का गुस्सा धीरे-धीरे ठंडा पड़ने लगा। हर दिन तनाव से चढ़ा रहने वाला चेहरा धीरे-धीरे रिलैक्स दिखने लगा। फिर इस सबका इतना असर हुआ कि मीता दफ्तर की सबसे हंसमुख और कूल प्रोफाइल बन गयी। वास्तव में यह सब पेट भरने की जगह आत्मा तृप्त करने वाली भोजन की चाहत को पूरा करने से हुआ।

हम में से ज्यादातर लोग खाने की अपनी निजी चाहतें और ख्वाहिशें रखते हैं, लेकिन सार्वजनिक बातचीत के दौरान वह बड़े दार्शनिक अंदाज में कहते हैं, “”जो भी मिलेगा खा लेंगे। क्या फर्क पड़ता है।” उन्हें शायद यह पता नहीं कि यह सही नहीं है। फर्क पड़ता है। अगर आप हमेशा दूसरों के मन का खाते हैं, समय और सुविधा का ध्यान रखकर खाते हैं तो यह खाना खाना नहीं है, बल्कि पेट भरना है और इससे आपको जरूरी कैलोरी भले मिलती रहे, न तो आप की आत्मा इस तरह के भोजनों से संतुष्ट होगी और न ही आप इससे रिलैक्स महसूस करेंगे। दरअसल तमाम दूसरी आदतों की तरह खाना भी एक आदत है। उसके भावनात्मक संबंध भी होते हैं। जीवन-शैली में जब बदलाव आता है या कहें अचानक जब कोई बड़ा बदलाव होता है तो सबसे बड़ा असर खानपान की आदतों पर पड़ता है। इस दौरान अक्सर खाने का समय बिल्कुल उलट-पलट जाता है या संगति बदलने के कारण आपकी फूड हैबिट और खाये जाने वाले खाने में बदलाव आ जाता है या आप अचानक ऐसे भौगोलिक क्षेत्र में पहुंच जाते हैं जहां अपरिचित और जीभ को अच्छा न लगने वाले खाना खाने लगते हैं या इस कदर व्यस्त हो जाते हैं कि सब कुछ अस्तव्यस्त हो जाता है।

इसमें कोई दो राय नहीं है कि खाना महज खाने के लिए नहीं खाया जाता। खाना महज तात्कालिक ऊर्जा हासिल करने के लिए भी नहीं खाया जाता। खाना शरीर के उचित व संपूर्ण विकास के लिए खाया जाता है। खाने का भावनात्मक प्रभाव पड़ता है। इसलिए यह सही है कि खाने कई तरह के होते हैं। कुछ दिमाग के लिए, कुछ दिल के लिए और कुछ बस जिंदगी चलती रहने के लिए। अगर आप महज जिंदगी चलते रहने के लिए खाना खाते हैं तो इसके कई सांकेतिक अर्थ होते हैं। आप महत्वाकांक्षी नहीं हैं। आपका कोई बड़ा सपना नहीं है। आप इंज्वाय करना नहीं जानते। आप कल्पनाशील नहीं हैं। आप विविधता भरी प्रकृति से रोमांचित नहीं हैं। जी हां, आपको भले लगे कि इन तमाम बातों का भला सिर्फ खाने से क्या रिश्ता है? नहीं, है। रामकृष्ण परमहंस अक्सर उपदेश देते-देते रसोई पहुंच जाते थे और जो कुछ बन रहा होता था, उसे थोड़ा-सा निकाल कर खा लेते थे। उनकी पत्नी उनकी इस आदत से परेशान रहती थी। एक दिन उन्होंने कहा, “”इतने बड़े हो गये अब तो ये बच्चों जैसी हरकतें छोड़ो।” रामकृष्ण परमहंस ने कहा, “”जिस दिन मैं यह हरकत छोड़ दूंगा, जिस दिन खाने से मेरा दिल भर जायेगा, उस दिन के बाद मेरी जिंदगी बहुत अल्प हो जायेगी।” ऐसा ही हुआ। एक दिन अचानक रामकृष्ण परमहंस की पत्नी ने महसूस किया कि परमहंस कुछ दिनों से रसोई में नहीं आ रहे। बस, इसके दो-चार दिन बाद ही उनकी मृत्यु हो गयी।

हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि अगर आपको मनपसंद खाना नहीं मिला तो आप मर जाएंगे। पर इसका एक संकेत है कि खाने का आपकी कल्पनाशीलता, बौद्घिकता, महत्वाकांक्षा और सपने देखने की प्रिाया से गहरा ताल्लुक है। स्वादिष्ट खाने का मतलब है कि आप अपने काम में परफेक्शनिस्ट हैं। स्वादिष्ट भोजन के शौकीन का मतलब है कि आप में रंग और बहार को महसूस करने की सलाहियत है। अच्छे भोजन के प्रेमी का मतलब है कि आप अच्छे सामाजिक सरोकार रखने वाले व्यक्ति भी हैं। इसलिए सिर्फ पेट भरने के लिए न खायें। तन, मन की तृप्ति के लिए भी खायें। हां, दिमाग के लिए भी भोजन जरूरी है। दिमाग के लिए अनुकूल भोजन वह है, जिसे आयुर्वेद में राजसिक भोजन कहा गया है। यह बहुत गरिष्ठ, मसालेदार, लजीज, खुशबूदार, भरपूर नमक और चीनी वाला तथा भारी-भरकम होता है। इसकी खासियत यह होती है कि इसके खाने के बाद लगातार ऊर्जा की अबाध आपूर्ति बनी रहती है। ज्यादातर समय में तो ऊर्जा का स्तर ओवरफ्लो करता रहता है। राजसिक भोजन करने वाले आमतौर पर लोग आाामक होते हैं। जबकि तामसिक भोजन करने वाले गुस्सा, तनाव, निराशा और अवसाद से घिरे रहते हैं। मन और आत्मा को प्रसन्न करने वाले तथा स्वास्थ्य को बेहतर ढंग से मेंटेन रखने वाले भोजन को सात्विक भोजन कहते हैं। सात्विक भोजन में ऊर्जा और सात्विकता का अनूठा संगम होता है। जो युवा अक्सर तनावग्रस्त रहते हों, दफ्तर में आये दिन उनकी लड़ाइयां होती रहती हों या उनसे लोग कटते हों, क्योंकि वे हमेशा फट पड़ने वाली मुद्रा में रहते हैं, तो उन्हें सात्विक भोजन पर ध्यान देना चाहिए। सात्विक भोजन बहुत आसान है, मसलन इसमें-

  • मौसमी ताजे फल, सलाद और दही की भरपूर मात्रा होनी चाहिए
  • वसा का कम से कम इस्तेमाल होना चाहिए
  • दूध कम ाीम वाला इस्तेमाल होना चाहिए
  • प्रिजर्व चीजों की बजाए ता़जी चीजों पर जोर देना चाहिए
  • ठंडा और बिल्कुल साफ पानी पीना चाहिए, साथ ही खाना खाने के पहले दिल-दिमाग से बिल्कुल शांतचित्त और प्रसन्न होना चाहिए।

– मधु सिंह

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