प्रताड़ित लोकतंत्र और उदासीन मतदाता

कहते हैं, किसी का नाम दो कारणों से होता है- उसके कुकर्म से या सुकर्म से। यदि ऐसा ही होता है तो 22 जुलाई, 2008 के दिन भारत की संसद में सवा अरब की जनसंख्या के प्रतिनिधियों का बहुत नाम भी हुआ और इसे बदनाम भी कह सकते हैं। संसद के जिस पटल पर अरबों लोगों को सुशासन, अनुशासन, कानून, सामाजिक सहभागिता एवं दायित्व व कर्त्तव्य का बोध कराने हेतु नियम बनाए जाते हैं, उस पटल पर सरेआम नोटों की गड्डियां उछाली गईं।

ये गड्डियां इसलिए नहीं उछाली गई थीं कि यकायक भारत के पास कोई कुबेर का खजाना लग गया, न ही किसी नशे के मद में चूर व्यक्ति का भोंडा प्रदर्शन था। यह पैसा तथाकथित रूप से घूस की अग्रिम राशि का भुगतान था। पिछले कुछ वर्षों में राजनीतिक दलों और राजनीतिज्ञों के निम्नतम स्तर पर पहुँच चुके चरित्र और व्यवहार के कारण अब ये तथा ऐसी ही अन्य घटनाएं भारतीय जनमानस को इतना नहीं झकझोरतीं कि वे हतप्रभ रह जाएं बल्कि हकीकत तो ठीक उलट है। अब तो नियमित अंतराल पर राजनीतिज्ञों से जुड़ी घटनाओं और समाचारों की जनता अभ्यस्त हो चुकी है।

पिछले वर्ष स्वतंत्रता की 60वीं वर्षगांठ पर हुए विशेष आयोजनों के अवसर पर बीबीसी विश्र्व सेवा ने अपनी तरह का एक अनोखा सर्वेक्षण करवाते हुए भारतीयों से पूछा कि कितने प्रतिशत लोगों को अपने प्रतिनिधियों पर विश्र्वास है। अपेक्षा के अनुरूप सिर्फ 23 प्रतिशत लोगों ने इसमें सहमति जताई। आ़जादी के महज पचास-साठ वर्षों में ही आम लोगों का अपने प्रतिनिधियों पर से इस तरह विश्र्वास उठ जाना किसी भी लोकतांत्रिक प्रणाली के लिए दुःखदायी बात है। लेकिन इसमें आम आदमी का कोई दोष नहीं है। यह सब लगातार गिरते राजनीतिक मूल्यों का परिणाम है।

राजनीतिक मूल्यों और पूरे राजनीतिक परिदृश्य में निरंतर हो रहे ह्रास के कई सारे कारण हैं। कभी समाजसेवा का पर्याय और साधन मानी जाने वाली राजनीति का इस उद्देश्य से अब दूर-दूर तक कोई सरोकार नहीं रह गया है। किसी गांव, मोहल्ले, कस्बे की किसी समस्या, आम जनों की सेवा तथा राष्टीयता को समर्पित किसी भावना से शुरू होने वाली राजनीति, वर्षों की कड़ी तपस्या और संघर्ष के बाद भी निःस्वार्थ भावना से चलने वाली राजनीति अब बीते वक्त की बात हो गई जो किसी पद, किसी लाभ के निहितार्थ प्रेरित नहीं होती थी।

मिट्टी की गहराई से जड़ें शुरू करने वाले राजनेता शक्ति के शीर्ष पर पहुँचने के बाद भी न तो अपनी वास्तविकता को भूलते हैं, न ही उस उद्देश्य को जिसके लिए वे राजनीति में आए। लेकिन बड़े अफसोस के साथ कहना पड़ता है कि आज ऐसे राजनेताओं का अकाल-सा पड़ गया है। सबसे बड़ी विडम्बना तो यही है कि कोई भी राजनीतिक दल आज ऐसा नहीं है जिसका कोई निश्र्चित संविधान हो, कोई स्पष्ट नीति हो, कोई दूरगामी उद्देश्य हो, कोई कल्याणकारी योजना हो। सभी दल समय के अनुसार मुद्दे बदल-बदल कर छिछली राजनीति करने में लगे हैं जिसका एकमात्र उद्देश्य है सत्ता प्राप्ति। यही वजह है कि आज एक आम मतदाता अपने राजनीतिक दल और प्रतिनिधि के चयन को लेकर भ्रमित रहता है कि पता नहीं गठबंधन के जोड़-तोड़ में कौन, कब, किसका दामन थाम ले, किसका छोड़ दे।

भारतीय लोकतंत्र के निरंतर पतनग्रस्त होते जाने का एक प्रमुख कारण है, इसमें धन की बढ़ती भागीदारी और प्रभाव। अब यह एक सर्वविदित मान्यता-सी बन गई है कि किसानों-मजदूरों वाले इस देश में छोटे से पंचायती चुनाव से लेकर बड़े संसदीय चुनाव तक के लिए बहुत सारा धन चाहिए। लोगों का मत और विश्र्वास हासिल करने में धन की क्या और कैसी भूमिका होती है, इसकी विवेचना के लिए सिर्फ इतना ही समझना काफी होगा कि चुनाव में प्रत्याशियों व राजनीतिक दलों द्वारा किए जा रहे व्यय को नियंत्रित करने के लिए बाकायदा कानून बनाना पड़ा।

सीधे-सीधे शब्दों में कहें तो राजनीति ने एक व्यवसाय का रूप ले लिया है। कोई भी प्रत्याशी चुनाव की तैयारियों में चुनाव के दौरान तथा अपना राजनीतिक कॅरियर चलाने व चमकाने के लिए पहले धन लगाकर निवेश करता है। चुनावोपरंात पद और शक्ति के बल पर निवेश किए गए धन से दस-बीस गुना अधिक कमाने की जुगत में सभी घपले-घोटाले, भ्रष्टाचार में लिप्त हो जाता है।

इसे नियंत्रित करने के लिए ही प्रत्येक प्रत्याशी से नामांकन भरवाते समय उसे उसकी चल- अचल संपत्ति की घोषणा शपथपूर्वक करने का प्रावधान किया गया किंतु इन सबके बावजूद धन के प्रभाव से राजनीति मुक्त नहीं हो पाई। इतना ही नहीं, इतिहास उठा कर देखें तो सत्ता के सर्वोच्च पद पर बैठे व्यक्ति से लेकर अदने से समाजसेवक तक को गंभीरतम आर्थिक अपराध के लिए स़जा नहीं दी जा सकी है। यह विश्र्व का शायद अकेला ऐसा दुर्भाग्यशाली लोकतंत्र है जहॉं जन प्रतिनिधि कभी संसद पटल पर प्रश्र्न्न पूछने के लिए तो कभी विश्र्वास मत देने या नहीं देने के लिए खुलेआम रिश्र्वत लेने-देने के बावजूद पूरी बेशर्मी से लाखों-करोड़ों लोगों का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं।

एक दिलचस्प सर्वेक्षण में यह जानने की कोशिश की गई कि भारतीय जनप्रतिनिधियों में गुनी लोगों, विद्वानों का तथा आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों का कुल प्रतिशत कितना है। इसका परिणाम भी बिल्कुल अपेक्षा के अनुकूल ही रहा और आपराधिक पृष्ठभूमि वाले जनप्रतिनिधियों का प्रतिशत विद्वान जनप्रतिनिधियों से लगभग ढाई गुना अधिक निकला। इस आंकड़े के बाद सवा अरब के इन सवा पॉंच सौ प्रतिनिधियों के किसी भी कुकृत्य, कुआचरण और कदाचार पर लेशमात्र भी आश्र्चर्य नहीं होना चाहिए।

आज का पढ़ा-लिखा, संभ्रात व्यक्ति राजनीति और चुनाव के प्रति घोर उदासीन हो चुका है। विभिन्न क्षेत्रों के शक्तिशाली और प्रभावशाली लोग चाहे किसी भी क्षेत्र में चले जाएं मगर राजनीति में अपनी भागीदारी और नेतृत्व देने से परहेज करते हैं। इसका सबसे बड़ा दुष्परिणाम यह हुआ है कि वंशवाद, आपराधिक घालमेल तथा आर्थिक भ्रष्टाचार के घालमेल से एक ऐसा दुष्चा बन गया है जिसमें फंस कर यह बरसों पुराना लोकतंत्र निरंतर प्रताड़ित और प्रदूषित होता जा रहा है। यदि स्वतंत्रता प्राप्ति के महज आधी शताब्दी के बाद विरासत में मिले इस लोकतंत्र का हमने ऐसा हश्र किया है तो भविष्य में इसके मरणासन्न हो जाने की पूरी संभावना से इनकार नहीं कर सकते। अब समय आ गया है कि हम स्वयं से और देश के नीति-नियंताओं से कहें कि इसे यूं ही धीरे-धीरे मरने के लिए न छोड़ें बल्कि इसे रोगमुक्त करने का सामूहिक प्राणपण से प्रयास करें।

 

– अजय कुमार झा

You must be logged in to post a comment Login