साउथ ओसेशिया पर जॉर्जिया का हमला

इराक संकट की तरह ही पूर्व सोवियत संघ के काकस क्षेत्र में मौजूदा संकट को भी तेल से अलग करके देखा नहीं जा सकता। काकस क्षेत्र से जो पाइपलाइनें गुजरती हैं उनके जरिए कैस्पियन सागर से यूरोप और अमेरिका तक तेल और गैस सप्लाई होती है। इन पाइपलाइनों की सुरक्षा की जिम्मेदारी मुख्य रूप से रूस की है, लेकिन इस क्षेत्र पर अमेरिका ब़जरिए जॉर्जिया अपना कब्जा करना चाहता है। शायद यही वजह है कि जब सारी दुनिया बीजिंग ओलंपिक्स के भव्य उद्घाटन समारोह को देखने में व्यस्त थी तो उसी दिन यानी 08/08/08 को जॉर्जिया ने साउथ ओसेशिया पर हमला बोल दिया जिसमें 13 रूसी फौजी मारे गए और 2000 से अधिक नागरिक जिनमें अधिकतर रूसी थे, भी अपनी जान गंवा बैठे। साउथ ओसेशिया की राजधानी शिनवली को नष्ट कर दिया गया और 30,000 से अधिक शरणार्थियों को रूस में शरण लेनी पड़ी।

सन् 1992 के एक समझौते के तहत साउथ ओसेशिया में शांति स्थापना की ़िजम्मेदारी रूस पर है और अंतर्राष्टीय कानून व संयुक्त राष्ट प्रस्तावों के तहत रूस की शांति सेना साउथ ओसेशिया में मौजूद है। इसलिए यह कहना गलत न होगा कि साउथ ओसेशिया पर जॉर्जिया का हमला दरअसल रूस पर हमला करने जैसा था। इस बात की पुष्टि इस तथ्य से भी होती है कि काकस क्षेत्र, जिसमें साउथ ओसेशिया भी आता है, रूसी मन-मस्तिष्क में पूरी तरह से रचा-बसा हुआ है। साउथ ओसेशिया की कुल आबादी का 80 फीसद हिस्सा रूसी मूल के लोगों का है। रूसियों का इतिहास व संस्कृति और मूल रूस की सुरक्षा काकस क्षेत्र से अटूट रिश्ते की तरह जुड़ी हुई है। यही वजह है कि साउथ ओसेशिया पर हमले के फौरन बाद रूस ने अपनी ़जमीनी फौज, लड़ाकू हवाई जहाज और युद्घपोत बड़े पैमाने पर जॉर्जिया पर हमला करने के लिए भेज दिए और सिर्फ 3 दिन के भीतर ही जॉर्जिया ने कहा कि “मानव महाविपत्ति’ से बचने के लिए वह अपनी फौज साउथ ओसेशिया से वापस बुला रहा है।

जॉर्जिया की इस घोषणा के बावजूद रूस को इस बात का यकीन नहीं है और उसने अबखा़िजया की तरफ से एक और मोर्चा जॉर्जिया के खिलाफ खोल दिया है। साथ ही रूस ने कहा है कि वह जॉर्जिया के राष्टपति मिखाइल साकाशविलि को युद्घ अपराधी मानता है और उनके खिलाफ टाइब्यूनल का गठन करेगा। जबकि दूसरी ओर पश्र्चिमी देश इस सिलसिले में दोहरी चाल चल रहे हैं। जहां एक तरफ अमेरिका ने अपने सैन्य एयरााफ्ट से इराक में सेवा कर रहे जॉर्जिया के 800 फौजियों को 11 टन रसद के साथ वापस जॉर्जिया पहुंचाया है ताकि रूस का मुकाबला किया जा सके, वहीं दूसरी ओर फ्रांस के नेतृत्व में 7 बड़े औद्योगिक देशों ने रूस और जॉर्जिया के बीच फौरन युद्घ विराम की अपील करते हुए मध्यस्थ की भूमिका निभाने का प्रस्ताव रखा है।

लेकिन जिस तरह जॉर्जिया के राष्टपति साकाशविलि अमेरिका की ़जबान बोल रहे हैं और पूर्व सोवियत संघ से टूटा एक अन्य देश यूोन भी अमेरिका के इशारे पर रूस के विरोध में खड़ा हुआ है, उससे यही लगता है कि यह सारी शरारत अमेरिका के इशारे पर ही हो रही है और अमेरिका काकस क्षेत्र पर प्रॉक्सी नियंत्रण चाहता है। यह निष्कर्ष इसलिए भी सही प्रतीत होता है क्योंकि सैन्य दृष्टि से देखा जाए तो रूस और जॉर्जिया का कोई मुकाबला है ही नहीं। यह ऐसा है जैसे कोई चूहा हाथी से टक्कर ले। गौरतलब है कि जॉर्जिया के पास जहां 26,900 फौजी हैं वहीं रूस के पास 641,000 फौजी हैं। जॉर्जिया के पास 82 टैंक हैं तो रूस के पास 6,717। जॉर्जिया के पास 139 हथियार युक्त वाहन हैं तो रूस के पास 6,388। जॉर्जिया के पास 7 लड़ाकू विमान हैं और रूस के पास 1206। ़जाहिर है, इतनी कम सैन्य ताकत होने के बावजूद रूस को चुनौती देने का अर्थ यह है कि यह काम अमेरिका के इशारे पर और उसके समर्थन से किया जा रहा है।

ऐसा लगता है कि काकस में अमेरिका रूस को फंसाने के लिए जाल बिछा रहा है। इसकी एक वजह तो यह है कि काकस क्षेत्र की तेल पाइपलाइनों पर अमेरिका का प्रॉक्सी कब़्जा हो और दूसरी वजह यह है कि ईरान के परमाणु मामले में रूस ईरान का साथ दे रहा है जो बात अमेरिका को पसंद नहीं है। गौर से देखा जाए तो यह शीत युद्घ का फिर से आरंभ होना है क्योंकि अमेरिका और रूस एक-दूसरे के “स्टेटेजिक पार्टनर’ होने के बावजूद दूसरों के कंधों पर बंदूक रखकर एक-दूसरे के खिलाफ वार करने से भी चूक नहीं रहे हैं। गौरतलब है कि अमेरिकी राष्टपति जॉर्ज डब्ल्यू. बुश और रूसी प्रधानमंत्री ब्लादिमीर पुतिन ने इस वर्ष अप्रैल में सोशी के ब्लैक सी रिसॉर्ट पर “स्टेटेजिक फ्रेमवर्क’ समझौते पर दस्तखत किए थे।

यहां यह बताना भी आवश्यक है कि जॉर्जिया 1922 में सोवियत यूनियन का हिस्सा बना था और 1991 में जब सोवियत संघ टूटा तो जॉर्जिया ने अपनी स्वतंत्रता का ऐलान कर दिया। लेकिन बाद में जॉर्जिया से विद्रोह करके 3 क्षेत्र अजारिया, अबखा़िजया और साउथ ओसेशिया अलग हो गए। अब जॉर्जिया के राष्टपति साकाशविलि का राजनीतिक एजेंडा है कि इन क्षेत्रों को वे अपने नियंत्रण में रखें। लेकिन रूस को यह मंजूर नहीं है क्योंकि काकस क्षेत्र तेल सप्लाई का मुख्य क्षेत्र है। गौरतलब है कि इस क्षेत्र में 4 मुख्य पाइपलाइन हैं- बाकू-तिब्लिसी-सीहान पाइपलाइन जिसकी क्षमता 12 लाख बैरल प्रतिदिन है। दूसरी है-साउथ काकस गैस पाइपलाइन जिसकी क्षमता 20 बिलियन क्यूबिक मीटर प्रतिवर्ष है। तीसरी है, बाकू-सुखसा ऑयल पाइपलाइन जिसकी क्षमता है 145,000 बैरल प्रतिदिन और चौथी है, बाकू-नोवोरोसोलायक ऑयल पाइपलाइन जिसकी क्षमता 1 लाख बैरल प्रतिदिन है।

लेकिन तेल के चक्कर में इस क्षेत्र पर जो नियंत्रण करने का प्रयास रूस और जॉर्जिया (पढ़ें अमेरिका) द्वारा किया जा रहा है, उससे न सिर्फ यूरोप और अमेरिका को तेल की सप्लाई पर खतरा मंडरा गया है जिससे महंगाई बढ़ने की आशंका बढ़ गई है, बल्कि रूस और पश्र्चिम के बीच संबंध खराब होने का भी जबरदस्त खतरा उत्पन्न हो गया है।

हालांकि नाटो की सदस्यता ग्रहण करने के चक्कर में जॉर्जिया अमेरिका के इशारे पर रूस को ठेंगा दिखाने का दुस्साहस कर रहा है, लेकिन इससे जो काकस क्षेत्र में हिंसा व अशांति की नींव रखी जा रही है उसकी गूंज वर्षों तक सुनाई देती रहेगी जो न सिर्फ काकस क्षेत्र बल्कि विश्र्व शांति के लिए भी घातक है। हालांकि संयुक्त राष्ट सुरक्षा परिषद इस संदर्भ में अभी तक कोई सकारात्मक सुझाव प्रस्तुत नहीं कर सकी है, लेकिन अगर जल्द ही काकस क्षेत्र में तोपों की गरज खामोश न हुई तो शीत युद्घ की चुभन विश्र्व के अन्य क्षेत्रों में भी महसूस की जाएगी।

 

– डॉ. एम.सी. छाबड़ा

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