सत्य की खोज में

satya-ki-khog-meनगर की खुली चौड़ी सड़क पर एक रथ चला जा रहा था। एक अत्यन्त तेजस्वी राजकुमार उस रथ की शोभा बढ़ाते हुए, चारों तरफ बड़ी कौतुहलपूर्ण दृष्टि से देख रहा था। बसंत का समय था। चारों तरफ प्रकृति के सौन्दर्य की दिव्य शोभा छायी हुई थी। पुष्पों की सुगन्ध अनायास ही मन को मोह लेती थी। मन-मयूर इस मादक वातावरण में झूम उठता था। कुमार भी इस सौंदर्य का आस्वादन करते जा रहा था।

सहसा सारथी ने रथ रोक दिया। “”क्या हुआ, रथ क्यों रोका?” युवराज ने किंचित रोष भरे स्वर में पूछा। सारथी ने उत्तर न देते हुए सामने की ओर इशारा भर कर दिया।

“”ये कौन लोग हैं और क्या ढोकर ले जा रहे हैं?”

सारथी बोला, “”कुमार, ये किसी की शवयात्रा है और ये लोग शव को कंधे पर उठाकर शमशान की ओर ले जा रहे हैं।” “”शवयात्रा से मतलब?” कुमार ने परेशान होकर पूछा।

“”कुमार शवयात्रा मृत्यु का प्रतीक है। जब प्राणी मर जाता है तो उसे अंतिम संस्कार के लिये शमशान ले जाया जाता है और वहां उसे अग्नि के हवाले कर देते हैं। ये प्रकृति का नियम है।”

“”तो क्या सभी को मरना पड़ता है?”

“”हां, मृत्यु तो सभी का अंतिम विश्राम स्थल है। जो जन्म लेता है, वह अवश्य मरता है। बालक से युवा, युवा से अधेड़ और फिर बुढ़ापा आता है। शरीर का क्षय होते-होते अन्ततः वह मृत्यु को प्राप्त हो जाता है।”

“”बस”, कुमार से इससे अधिक न सुना गया। शवयात्रा समीप से निकली। रोते-पीटते लोग, रुदन करती माता, रोती-चिल्लाती पत्नी। बिलखते हुए परिवार के लोग। कुमार से अधिक न देखा गया। वह वहीं से राजमहल वापस आ गये।

उस रात नींद भी नहीं आयी। राजकुमार की आँखों के सामने से उस शवयात्रा का दृश्य हटने का नाम ही नहीं ले रहा था। मन में विचारों की तरंगें उठ रही थीं, “”अगर मृत्यु अंतिम सत्य है तो फिर जीवन क्या है? हे परमात्मा, कल अगर मेरी मृत्यु हो जाये तो मेरे माता-पिता भी इसी तरह बिलखेंगे। मेरी पत्नी और पुत्र भी शोक में डूबकर भटकते फिरेंगे। फिर इस जीवन का क्या लाभ, जीवन और मृत्यु के मध्य कोई तो मुक्ति का उपाय होगा? निर्वाण की कोई तो राह होगी? उस अंतिम सत्य को पाना ही होगा। केवल शोक जीवन का परिणाम नहीं हो सकता।”

इसी सोच-विचार में रात बीत गयी। अगले दिन भी वही मनःस्थिति रही। रात आयी, सब कुछ चुप, खामोश, ठहरा हुआ था। कहीं कोई स्पन्दन नहीं था। कुमार ने चुपचाप अपनी सोई पत्नी को निहारा, फिर पास सोते हुए पुत्र की ओर देखा। प्रेम और पिता का दुलार उमड़ा, लेकिन भीतर से शब्द गूंजा “नहीं। अब नहीं रुकना, अब सत्य की ओर चलना है, बस, केवल सत्य की ओर।’

निकल पड़ा राजकुमार। राजमहल पीछे छूटता गया। घने अंधकार में उसी पथ पर कदम बढ़ते चले जा रहे थे, जिस पर वह दो दिन पहले रथ पर सवार होकर चला था। सत्य की खोज को मन में लिये, बोधिसत्य की प्राप्ति के लिये माया के बंधनों से छूटकर बिल्कुल अकेला। वह राजकुमार और कोई नहीं महात्मा बुद्ध थे। उनका नाम सिद्धार्थ था, बुद्ध तो महानिर्वाण प्राप्त करके बने थे।

पत्नी यशोधरा और पुत्र राहुल को त्यागकर बुद्ध जिस मुक्ति के सत्य को मानवता के रूप में संसार के सामने लाये वह करुणा, दया, अहिंसा और प्रेम का प्रतीक बन गया, लेकिन इस ज्ञान के लिये उन्होंने अपना सर्वस्व त्याग दिया। इसलिए तो कहा गया है कि सत्य की राह बड़ी कठिन होती है। परंतु जिसे उस सत्य की उपलब्धि हुई, वह अपने होने का अर्थ समझ गया।

इस संसार में जन्म-मरण का अनवरत चक्र चल रहा है। सुबह से शाम, फिर रात और फिर सुबह। जीवन अपनी शांति से चल रहा है। लेकिन क्या कभी आपने दो क्षण के लिये भी बैठकर सोचा है कि जीवन का सत्य क्या है? जीवन का लक्ष्य क्या है? केवल खाना-पीना, सोना, मनोरंजन में लीन रहना तो जीवन नहीं है। परमात्मा ने जो ज्ञान दिया है, विवेक दिया है, उसे नजरअंदाज कर मानव नहीं, पशु के समान जीवन जी रहे हैं। क्या ये उस प्रभु का अपमान नहीं है?

समझते हैं, लेकिन नासमझ बने रहना चाहते हैं। शायद इसीलिए कि मोह से छुटकारा पाना आसान नहीं लगता। लालच पीछा नहीं छोड़ता। काम-क्रोध की प्रवृत्तियां इस राह में आड़े आती हैं। ठीक है, लेकिन प्रयत्न तो कर ही सकते हो। लाख दुश्र्वरियां सही, मगर मंजिल पाने के लिये थोड़ी-सी कुर्बानी तो करनी ही पड़ेगी। थोड़ा मनुष्य तो बनना ही पड़ेगा। एक कदम सत्य की खोज में बढ़ाकर तो देखो, विश्र्व कल्याण और दिव्य आनन्द से हृदय गद्गद् हो उठेगा। उसी क्षण मानवता सार्थक हो उठेगी और परमात्मा की कृपा का अपार सुख बरस पड़ेगा।

– विपुल कृष्ण गोस्वामी

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