बढ़ती उम्र और खराब जीवन शैली का रोग घुटनों का दर्द

knees pain causesजोड़, खासकर घुटने के जोड़, शरीर के वह हिस्से हैं जिनकी देखभाल दिल की तरह करनी पड़ती है। ऑस्टियो आर्थराइटिस एक आम किस्म व जोड़ों का रोग है। बढ़ती उम्र में इसकी वजह से दर्द और अपंगता होती है। बुढ़ापे में हर किसी को किसी हद तक ऑस्टियो आर्थराइटिस हो ही जाती है। अनुमान है कि 60 वर्ष से ऊपर के चार में से तीन लोगों को कम से कम एक जोड़ में आस्टियो आर्थराइटिस होती है और 60 वर्ष के बाद 10 में से एक व्यक्ति को इसी बीमारी के भयंकर रूप का सामना करना पड़ता है।

आस्टियो आर्थराइटिस जीवनशैली से संबंधित बीमारी है। इसमें जबरदस्त दर्द और जिस्मानी बेचैनी होती है। अगर यह गंभीर स्थिति में पहुंच जाये तो रोगी अपाहिज होकर बिस्तर तक सिमट कर रह जाता है। इस किस्म की आर्थराइटिस एक या ज्यादा जोड़ों में कार्टिलेज के टूटने या खत्म होने से होती है। कार्टिलेज प्रोटीन पदार्थ है, जो जोड़ों की हड्डियों के बीच में कुशन का काम करता है। आस्टियो आर्थराइटिस की समस्या बढ़ती उम्र के साथ अधिक होती है। 45-50 वर्ष की आयु से पहले यह पुरुषों में अधिक होती है।

प्राइमरी आस्टियो आर्थराइटिस का अधिक संबंध बढ़ती उम्र से है। उम्र बढ़ने के साथ कार्टिलेज में पानी बढ़ जाता है और कार्टिलेज का प्रोटीन मेक-अप नष्ट होने लगता है। जोड़ों का निरंतर इस्तेमाल कार्टिलेज को बेचैन कर देता है जिससे उसमें जलन होने लगती है और जोड़ों में दर्द होता है व सूजन आ जाती है।

आखिरकार कार्टिलेज नष्ट होने लगता है। अति गंभीर स्थितियों में कार्टिलेज कुशन पूरी तरह से खत्म हो जाता है। इस नुकसान से जोड़ की हड्डियां आपस में रगड़ खाने लगती हैं जिससे दर्द होता है और जोड़ों की मोबिलिटी सीमित हो जाती है।

सेकेंडरी आस्टियो आर्थराइटिस के कारण हैं- मोटापा, बार-बार ट्रॉमा का होना या ज्वाइंट स्ट्रक्चर में सर्जरी, जन्म के समय असामान्य जोड़ (कोन्जिनाइटल एब्नोरमेलिटीज), गाऊट, मधुमेह और अन्य हार्मोन डिसऑर्डर। लेकिन मोटापा मुख्य वजह है। जिस दिन व्यक्ति यह महसूस करे कि वह दूसरे माले पर अपने दफ्तर में सीढ़ियों की बजाय लिफ्ट से जाना पसंद करेगा, तो समझ लो कि इस रोग के लक्षण मौजूद हैं। यह प्राकृतिक संकेत है घुटनों के प्रभावित होने का, बैठने में और खड़े होने में परेशानी होना और इन कामों के लिए किसी की मदद लेना, इस रोग का शुरूआती संकेत है। सीधे खड़े हो जाओ, अपने पंजों को मिला लो। घुटनों का अंदरूनी हिस्सा एक-दूसरे को छूना चाहिए। अगर एक या दो उंगलियों का फासला रह जाता है तो समझ लो कि घुटनों को नुकसान पहुंच चुका है। विशेषज्ञों की राय है कि 95-98 प्रतिशत घुटनों के ऑपरेशनों से बचा जा सकता है। लेकिन इसके लिए जीवनशैली को सुधारना बहुत आवश्यक है, वह भी समय रहते हुए। सबसे पहले तो अपने वजन को नियंत्रण करना आवश्यक है। इसके बाद 5-6 लीटर फ्लूइड रोज़ पी जायें। अधिक सलाद खायें। तेल और एनिमल फैट से सख्ती से बचें।

जॉगिंग, तेज वॉकिंग, गोल्फ घुटनों के लिए अच्छी एक्सरसाइज नहीं हैं, क्योंकि इन शारीरिक गतिविधियों में घुटनों पर बहुत जोर पड़ता है। इनसे बचा जाये तो अच्छा है। स्विमिंग और तैराकी इस सिलसिले में सबसे अच्छी एक्सरसाइज है। क्वाडरिसेप्स और हैमस्ट्रिंग कसरत भी अच्छी है। जिन लोगों को घुटने में दर्द की शिकायत रहती है उन्हें हाई-हील्स नहीं पहननी चाहिए।

अगर रोग ज्यादा नहीं बढ़ा है तो साइनोविएल मेमब्रेन हटाना या जोड़ को आर्थोरोस्कोपी से साफ करना काफी होता है, दर्द से राहत दिलाने के लिए। दूसरी स्टेज में, जहां कार्टिलेज बस थोड़ी-सी ही नष्ट हुई है और घुटने का जोड़ अपनी जगह से थोड़ा-सा हट गया है तो एक छोटा-सा ऑपरेशन कारगर होता है जिसे हाईटाईबिएल आस्टियो टॉमी सीधा करने के लिए किया जाता है। इससे कई साल तक के लिए राहत मिल जाती है। लेकिन अगर आर्थराइटिस की बीमारी बहुत ज्यादा बढ़ गई है तो कृत्रिम घुटना लगाने के लिए सर्जरी की जाती है। अब तो सर्जरी के कई कामयाब आधुनिक तरीके उपलब्ध हैं। मसलन, हाई-फ्लेक्स नी सर्जरी। इस सर्जरी के बाद तो व्यक्ति जमीन पर भी बैठ सकता है। लेकिन प्रभावित लोगों को यह इलाज सिर्फ योग्य सर्जनों से ही कराना चाहिए।

 

– डॉ. माजिद अलीम

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